कम बारिश और महंगी खाद की दोहरी मार से जूझेंगे किसान, जैविक तकनीकें बनेंगी अन्नदाताओं का संबल

कम बारिश और महंगी खाद की दोहरी मार से जूझेंगे किसान; 'जायडेक्स जाइटोनिक टेक्नोलॉजी' जैसी आधुनिक जैविक विधियाँ संकट में दिखाएंगी राह | खरीफ 2026 पर एल नीनो और खाद संकट का साया: जैविक तकनीकें बनेंगी अन्नदाताओं का संबल

12 Jun 2026  |  53

 

नई दिल्ली/कृषि डेस्क:

भारत की मानसून-आधारित खेती और करोड़ों किसानों के लिए खरीफ सीजन हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। लेकिन वर्ष 2026 का यह सीजन अपने साथ कई गंभीर चुनौतियाँ लेकर आया है। एक तरफ जहाँ अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के कारण यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है, वहीं दूसरी तरफ मौसम वैज्ञानिकों ने इस साल 'एल नीनो' (El Niño) के सक्रिय होने की गंभीर चेतावनी दी है।

कम बारिश, बढ़ता तापमान और सीमित खाद की इस तिहरी चुनौती के बीच कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अब रासायनिक खेती के बजाय जैविक और जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology) आधारित समाधान ही किसानों की फसल और लागत दोनों को सुरक्षित रख सकते हैं। इस दिशा में 'जायडेक्स' (Zydex) की 'जायटोनिक टेक्नोलॉजी' (Zytonic Technology) जैसी आधुनिक विधियाँ किसानों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो रही हैं।

एल नीनो का खतरा: क्यों बढ़ी है किसानों की चिंता?

एल नीनो प्रशांत महासागर के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की एक प्राकृतिक घटना है, जिसका असर वैश्विक मौसम चक्र पर पड़ता है। भारत में इसके सक्रिय होने का सीधा मतलब है:

कमजोर मानसून और अनियमित वर्षा: बारिश समय पर न होना या फिर बुवाई के बाद लंबा सूखा अंतराल आना।

अत्यधिक तापमान (Heat Stress): अंकुरण, फूल आने और दाना भरने जैसी फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं में पानी की कमी से पौधों का विकास रुक जाना।

उर्वरक संकट: मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर

मौसम की मार के साथ-साथ इस साल किसानों को उर्वरकों की संभावित कमी का भी सामना करना पड़ सकता है। खरीफ सीजन के लिए देश को करीब 18 से 19.4 मिलियन टन यूरिया की जरूरत होती है। वैश्विक ऊर्जा संकट के चलते इसका आयात और उत्पादन दोनों प्रभावित हुए हैं। हालांकि सरकार ने सब्सिडी बढ़ाकर कीमतों को नियंत्रण में रखा है, लेकिन जमीनी स्तर पर समय पर खाद की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

संकट का समाधान: 'जायटोनिक सुरक्षा' और 'मिनी किट' तकनीक

बदलते परिवेश में केवल रसायनों पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। मिट्टी की सेहत सुधारने और पानी बचाने के लिए जैव-आधारित समाधान बेहद कारगर साबित हो रहे हैं।

 जाइटोनिक सुरक्षा (Zytonic Suraksha): सूखे और गर्मी से कवच

यह एक आधुनिक जैविक उत्पाद है जो पौधों की पत्तियों पर एक अदृश्य, सूक्ष्म सुरक्षात्मक परत बना देता है।

नमी का संरक्षण: रात में गिरने वाली ओस को यह पत्तियों पर लंबे समय तक रोक कर रखता है, जिससे सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी पौधों को अतिरिक्त नमी मिलती है।

बेहतर प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): यह तकनीक पौधों को घुलनशील कार्बन डाइऑक्साइड उपलब्ध कराने में मदद करती है, जिससे पौधे तीव्र गर्मी में भी हरे-भरे रहते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

 

टिकाऊ कृषि से किसानों को होने वाले प्रमुख लाभ:

लागत में कमी: रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटने से खेती की कुल लागत कम होती है।

तनाव सहने की क्षमता: फसलों में सूखा और अत्यधिक तापमान (Water & Heat Stress) सहने की शक्ति आती है।

मिट्टी का सुधार: भूमि की दीर्घकालिक उर्वरा शक्ति और जैविक सक्रियता में सुधार होता है।

गुणवत्तापूर्ण उत्पादन: पैदावार की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में संतोषजनक वृद्धि देखी जा सकती है।

निष्कर्ष:

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में पारंपरिक खेती के तौर-तरीकों को अपग्रेड करना समय की मांग है। धान, मक्का, कपास, दलहन और सब्जियों जैसी मुख्य खरीफ फसलों को एल नीनो के प्रभाव से बचाने के लिए 'जायटोनिक सुरक्षा' जैसी पर्यावरण-अनुकूल तकनीकें न केवल देश के अन्नदाताओं की जेब बचाएंगी, बल्कि हमारी खाद्य सुरक्षा को भी सुनिश्चित करेंगी।

 

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