शहरों में लग रहे 'ट्रैफिक टैक्स' से मिलेगी मुक्ति: भारत में तेजी से बदल रहा है रहने का ढंग, '15-मिनट सिटी' का बढ़ा क्रेज

घर की चार दीवारों से आगे बढ़कर अब लाइफस्टाइल और वक्त खरीद रहे हैं भारतीय; इंटीग्रेटेड टाउनशिप के लिए भारी बजट लगाने को भी तैयार।

14 Jun 2026  |  151

 

 

नई दिल्ली।

जरा सोचिए, आपको ऑफिस जाने के लिए सुबह-सुबह ट्रैफिक की अंतहीन कतारों से न जूझना पड़े। आपके बच्चे का स्कूल पैदल दूरी पर हो, सोसाइटी के गेट पर ही सुपरमार्केट हो, सड़क पार करते ही जिम और नीचे ही फार्मेसी हो। वीकेंड पर एंटरटेनमेंट के लिए मॉल, सिनेमा और रेस्टोरेंट भी चंद मिनटों की वॉक पर मिल जाएं।

भारत के मेट्रो शहरों में रहने वाले लोगों के लिए यह अब कोई दूर की कल्पना नहीं, बल्कि एक हकीकत बनता जा रहा है। देश के शहरी परिदृश्य में इस समय '15-मिनट सिटी' (15-Minute City) का कॉन्सेप्ट बेहद तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जो रियल एस्टेट और भारतीय जीवनशैली को पूरी तरह से री-शेप (नया आकार) कर रहा है।

क्या है '15-मिनट सिटी' का कॉन्सेप्ट?

इस शहरी मॉडल का मूल सिद्धांत बेहद सरल है—"रोजमर्रा की जिंदगी के लिए जरूरी हर बुनियादी सुविधा (काम, पढ़ाई, हेल्थकेयर, शॉपिंग और मनोरंजन) आपके घर से महज 15 मिनट की दूरी पर होनी चाहिए।" चाहे आप वहां पैदल जाएं, साइकिल से जाएं या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें।

"सच तो यह है कि बात एक ही चीज पर आकर रुकती है जिसे खरीदार अब बर्बाद नहीं कर सकते और वो है समय। रोजाना का सफर चुपचाप शहरी जिंदगी पर लगने वाला सबसे बड़ा टैक्स बन गया है। खरीदार अब सिर्फ यह नहीं पूछते कि फ्लैट कितना बड़ा है, बल्कि यह भी पूछते हैं कि यह पता उन्हें उनकी जिंदगी का कितना हिस्सा वापस देगा?"

पुष्पमित्र दास, चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, JUSTO RealFintech Ltd.

अब सिर्फ घर नहीं, 'लाइफस्टाइल' खरीद रहे हैं लोग

दशकों तक भारत में रियल एस्टेट मार्केट सिर्फ तीन पिलर्स पर टिका रहा—लोकेशन, कीमत और पजेशन (कब्जा)। लेकिन आज के खरीदारों की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। हाइब्रिड वर्क कल्चर (Work from Home) के आने के बाद से घर अब रोजमर्रा की जिंदगी का केंद्र बन गया है। यही वजह है कि खरीदार अब ऐसी इंटीग्रेटेड टाउनशिप की तलाश में हैं जहां सुरक्षा, हरियाली, कम्युनिटी स्पेस और कनेक्टिविटी का एक बेहतरीन इकोसिस्टम हो।

समय बचाने की बड़ी कीमत देने को तैयार खरीदार

आरएमआर ग्रुप की डेवलपमेंट मैनेजर शगुन कालरा के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स में रहने वाले लोग सिर्फ ईंट-पत्थर के घर के लिए पैसे नहीं दे रहे हैं, बल्कि वे उस समय को खरीद रहे हैं जो वे हर दिन बचाते हैं। अगर ग्रॉसरी, बच्चों का स्कूल और मेडिकल सुविधाएं पास हों, तो हर हफ्ते अनगिनत घंटों की बचत होती है और इस बचे हुए समय का एक बड़ा आर्थिक व मानसिक मूल्य है।

क्या हैं इसके मुख्य डिजाइन सिद्धांत?

विशेषज्ञों के मुताबिक, एक सफल '15-मिनट सिटी' प्रोजेक्ट मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर आधारित होता है:

मिक्स्ड-यूज प्लानिंग (Mixed-Use Planning): आवासीय (Residential) और व्यावसायिक (Commercial) स्पेस को अलग-अलग जोन में बांटने के बजाय एक ही इलाके में पास-पास विकसित करना।

सोच-समझकर की गई एमेनिटी प्लानिंग: मास्टर प्लान के तहत ग्रॉसरी स्टोर, फार्मेसी, क्रेच और प्राइमरी स्कूलों को टाउनशिप के अंदर ही सही जगह पर प्लेस करना।

ट्रांसपोर्ट इंटीग्रेशन: रोजमर्रा की जरूरतें पैदल दूरी पर हों और बड़ी जरूरतें (जैसे स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल या यूनिवर्सिटी) मेट्रो या मास ट्रांजिट नेटवर्क से जुड़ी हों, ताकि लंबी दूरी की यात्रा न करनी पड़े।

जेब पर कितना पड़ेगा असर? (कीमतों का गणित)

सुविधाओं और समय की बचत के इस लग्जरी मॉडल के लिए खरीदारों को अच्छी-खासी कीमत चुकानी पड़ रही है। देश के प्रमुख महानगरों में कीमतें कुछ इस प्रकार हैं:

प्रॉपर्टी का प्रकारबड़े शहरों में अनुमानित कीमत (मुंबई, दिल्ली-NCR, बेंगलुरु, पुणे, चेन्नई)
2-BHK अपार्टमेंट₹1.5 करोड़ से ₹3.5 करोड़
प्रीमियम पेंटहाउस₹3.5 करोड़ से शुरू (प्रीमियम प्रोजेक्ट्स में ₹5 करोड़ से अधिक)

 

कंपनियों को भी भा रहा है यह मॉडल

यह बदलाव सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि कॉर्पोरेट जगत भी अब इसी राह पर चल रहा है। ऑनवर्ड वर्कस्पेस के को-फाउंडर और सीईओ सुव्रत जैन बताते हैं कि अब कंपनियां किसी एक सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट में बड़ा हेडक्वार्टर बनाने के पारंपरिक मॉडल से पीछे हट रही हैं।

इसके बजाय, कंपनियां अब ऐसे डिस्ट्रिब्यूटेड ऑफिस नेटवर्क (विकेंद्रीकृत कार्यालयों) को प्राथमिकता दे रही हैं जो उन इलाकों के पास हों जहाँ कर्मचारी रहते हैं। इससे कर्मचारियों का स्ट्रेस कम होता है, और कंपनियों को बेहतर अटेंडेंस, हाई एंगेजमेंट और कम एट्रिशन रेट (कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की कम दर) के रूप में फायदा मिलता है।

देश के किन हिस्सों में आ रहा है बूम?

बेंगलुरु: व्हाइटफील्ड, सरजापुर रोड और एयरपोर्ट कॉरिडोर।

पुणे: खराडी, हिंजवडी, बानेर और वाकड।

हैदराबाद: गाचीबोवली, कोकापेट और फाइनेंशियल डिस्ट्रिक्ट।

मुंबई (MMR): ठाणे, नवी मुंबई और पनवेल (बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर)।

दिल्ली-NCR: द्वारका एक्सप्रेसवे, गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड और जेवर कॉरिडोर।

टियर-2 शहरों में भी दस्तक: यह ट्रेंड अब सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं है। बढ़ती आय और बदलते लाइफस्टाइल के कारण लखनऊ, चंडीगढ़, देहरादून, कोयंबटूर, अहमदाबाद और कोच्चि जैसे तेजी से उभरते शहर भी इस मॉडल को अपना रहे हैं।

राह में चुनौतियां भी कम नहीं

चमकदार पहलुओं के बीच अर्बन प्लानर्स कुछ व्यावहारिक चुनौतियों की ओर भी इशारा करते हैं:

जमीन का अधिग्रहण: '15-मिनट सिटी' के लिए जमीन के बड़े और जुड़े हुए टुकड़े (लैंड पार्सल) इकट्ठा करना बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि भारत में जमीन की मलकियत बिखरी हुई है।

लंबी मंजूरियां: सरकारी विभागों से क्लियरेंस मिलने की प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली है।

किफायती होना (Affordability): फिलहाल यह मॉडल सिर्फ अमीर और प्रीमियम क्लास तक सीमित है। इसे आम और मध्यम आय वर्ग के लोगों तक पहुंचाने के लिए डेवलपर्स, अर्बन प्लानर्स और सरकारों के बीच एक बड़े और नीतिगत सहयोग की आवश्यकता होगी।

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