शिमला/नई दिल्ली:
भा.कृ.अ.प.-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के निदेशक डॉ. सी. एच. श्रीनिवास राव ने शिमला क्षेत्रीय केंद्र का दो दिवसीय (11-12 जून) विस्तृत दौरा कर वहाँ चल रही अनुसंधान गतिविधियों की उच्च स्तरीय समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने वैज्ञानिकों से पर्वतीय राज्यों के किसानों और बागवानों की अनूठी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न और फल फसलों की उन्नत किस्में विकसित करने का आह्वान किया। डॉ. राव ने विशेष रूप से बदलते मौसम को देखते हुए सेब और अन्य शीतोष्ण (Temperate) फल फसलों की 'कम शीत आवश्यकता' (Low Chilling Requirement) वाली किस्मों के विकास पर सबसे ज्यादा बल दिया।
हरित ऊर्जा और आधुनिक सिंचाई बुनियादी ढांचे की शुरुआत
अपने दौरे के दौरान निदेशक डॉ. श्रीनिवास राव ने केंद्र में दो बड़ी ढांचागत परियोजनाओं की शुरुआत की:
सिंचाई जल भंडारण टैंक: पहाड़ी क्षेत्रों में पानी की किल्लत को दूर करने के उद्देश्य से 50,000 लीटर क्षमता वाले आधुनिक सिंचाई टैंक का उद्घाटन किया गया।
सौर ऊर्जा प्रणाली: परिसर में हरित और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए सौर ऊर्जा उत्पादन प्रणाली का शुभारंभ किया गया।
इसके अलावा, डॉ. राव ने भा.कृ.अ.प.-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) के निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह के साथ हिमाचल प्रदेश सरकार के कृषि एवं बागवानी सचिव से शिष्टाचार भेंट की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य केंद्र द्वारा विकसित आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक उपलब्धियों को राज्य के दूरदराज के किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना था।
हिमालयी राज्यों के लिए 'गेहूं और जौ' की क्रांतिकारी किस्में
वर्ष 1935 में स्थापित यह ऐतिहासिक क्षेत्रीय केंद्र लंबे समय से हिमालयी क्षेत्रों में रोग प्रतिरोधी फसलों के विकास में अग्रणी रहा है। केंद्र के अध्यक्ष डॉ. धर्म पाल ने बताया कि वर्तमान में HS 507, HS 542, HS 562 और HD 3226 जैसी गेहूं की बेहद उन्नत किस्मों का प्रजनक बीज (Breeder Seed) राज्य के किसानों को बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके साथ ही, जनजातीय (Tribal) क्षेत्रों में नग्न जौ की नई और पौष्टिक किस्म BSH 497 को बढ़ावा देने की एक विशेष योजना पर काम चल रहा है।
बागवानी के क्षेत्र में 'पूसा' का कमाल
फल फसलों के क्षेत्र में भी इस केंद्र ने बागवानों की तकदीर बदलने वाले नवाचार किए हैं। केंद्र द्वारा विकसित ‘पूसा गोल्ड’ सेब, कीवी की विभिन्न उन्नत वैरायटी और ‘पूसाखोर’ अखरोट के पौधों को सीधे बागवानों के बगीचों तक पहुंचाया जा रहा है।
इसके साथ ही, फसलों को नुकसान से बचाने के लिए विकसित किया गया 'वूली एफिड ट्रैप' और शीतोष्ण फलों के रोगों की तुरंत पहचान करने वाला 'उन्नत परीक्षण प्रोटोकॉल' स्थानीय किसानों और कृषि शोधार्थियों के लिए बेहद मददगार साबित हो रहे हैं। सामाजिक सरोकारों को निभाते हुए केंद्र द्वारा SCSP और TSP कार्यक्रमों के तहत छोटे और सीमांत किसानों को आधुनिक कृषि उपकरण और उन्नत तकनीकें निशुल्क वितरित की जा रही हैं।
वैज्ञानिकों का बढ़ा मनोबल
डॉ. सी. एच. श्रीनिवास राव के इस दौरे से शिमला केंद्र के वैज्ञानिकों और कर्मचारियों में भारी उत्साह है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरे के बाद पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक और जलवायु चुनौतियों के अनुरूप किसान-केंद्रित नवाचारों और आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों (Agri-Tech) के विकास को एक नई और प्रभावी दिशा मिलेगी।