नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने एक सरकारी सड़क निर्माण परियोजना में हस्तक्षेप करने और लोक सेवक (सरकारी कर्मचारी) के काम में बाधा डालने के आरोपी आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता राकेश कुमार बहल को अग्रिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। सोमवार, 15 जून को मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने देश में आरटीआई के दुरुपयोग पर बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म आजकल एक नया 'बिजनेस' और 'येलो जर्नलिज्म' (पीत पत्रकारिता) बन गया है।
"केंद्र सरकार ने फंड दिया है, आप कोई नहीं हैं" — सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ (बेंच) ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने कड़े शब्दों में कहा:
"RTI एक्टिविस्ट एक नया बिजनेस बन गया है। केंद्र सरकार ने फंड जारी किया है, वह सड़क निर्माण देख लेगी। आप कोई नहीं हैं... तथाकथित RTI एक्टिविस्ट! येलो जर्नलिज्म।"
वहीं, बेंच के दूसरे सदस्य जस्टिस विजय बिश्नोई ने आरोपी के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए पूछा, "आप कौन होते हैं जो सड़क निर्माण या उसकी प्रगति की निगरानी कर रहे हैं? क्या आप कोई उच्च अधिकारी हैं?"
क्या है पूरा मामला और क्या हैं आरोप?
शिकायत के मुताबिक, आरटीआई कार्यकर्ता राकेश कुमार बहल और उनके एक साथी पर एक निर्माणाधीन सरकारी सड़क के काम को जबरन रोकने का आरोप है। इसके अलावा उन पर निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए गए हैं:
धमकी और मारपीट: काम की निगरानी कर रहे शिकायतकर्ता और वहां मौजूद मजदूरों को धमकाने का आरोप है। बहल पर शिकायतकर्ता के साथ मारपीट करने और सह-आरोपी पर लात मारने का आरोप है।
जातिसूचक टिप्पणी: कार्यस्थल पर मौजूद मजदूरों के खिलाफ जातिसूचक और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने का भी आरोप है।
सरकारी कार्य में बाधा: मुख्य रूप से विकास कार्य में अड़ंगा लगाने और लोक सेवकों को डराने का मामला दर्ज है।
इन गंभीर कानूनी धाराओं के तहत दर्ज है मामला
इस मामले में आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS, 2023) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई है:
BNS, 2023 की धाराएं: 304(2), 132, 221, 121(1), 351(2), 351(3), 3(5), और 121(2)।
SC/ST एक्ट: धारा 3(1)।
हाईकोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट का भी चाबुक
इससे पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इस मामले को बेहद गंभीर माना था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि एफआईआर में लगाए गए आरोप सीधे तौर पर सरकारी काम में बाधा डालने और कानून को हाथ में लेने की संलिप्तता दिखाते हैं। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज की थी, जिस पर अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी अपनी मुहर लगा दी है।