नई दिल्ली:
अमेरिका और ईरान के बीच करीब चार महीने से जारी युद्ध के खात्मे की खबर ने वैश्विक बाजारों को बड़ी राहत दी है। जैसे ही १४ जून को शांति समझौते की घोषणा हुई, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लुढ़क गईं। इसका सीधा और सकारात्मक असर १५ जून को भारतीय अर्थव्यवस्था पर देखने को मिला, जहां रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ और शेयर बाजार झूम उठा।
लेकिन देश के आम आदमी का सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनकी जेब पर इसका असर कब पड़ेगा? पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस (LPG) कब सस्ते होंगे? आइए समझते हैं इस पूरे गणित और राहत के 'टाइमलाइन' को इस विशेष एक्सप्लेनर में:
१५ जून का असर: मजबूत रुपया और शेयर बाजार में बूम
रुपया हुआ दमदार: १५ जून को रुपया डॉलर के मुकाबले 95.11 से शानदार छलांग लगाते हुए 94.65 के स्तर पर बंद हुआ। यह ८ मई के बाद इसका सबसे मजबूत स्तर है। जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह 93−94 के स्तर तक आ सकता है। इससे कच्चे तेल के आयात की लागत कम होगी।
बाजार में रौनक: तेल-गैस शेयरों के साथ-साथ आईटी, बैंकिंग और मेटल सेक्टर में जोरदार खरीदारी देखी गई। १५ जून को सेंसेक्स और निफ्टी करीब २% तक चढ़ गए।
राहत कब मिलेगी? जानिए चरणबद्ध टाइमलाइन (Timeline)
राहत फौरन नहीं मिलेगी, क्योंकि तेल कंपनियों ने जून के पहले हफ्ते (९ जून) में ही पेट्रोल 7.5 से 8 रुपये लीटर और एलपीजी सिलेंडर २९ रुपये महंगा किया था। लेकिन आने वाले हफ्तों में राहत की उम्मीदें इस प्रकार हैं:
चरण १: अगले २ से ४ हफ्ते (जुलाई का पहला हफ्ता)
यह वह दौर होगा जब कीमतों में गिरावट की पहली लहर आ सकती है।
पेट्रोल-डीजल: जुलाई के पहले हफ्ते की समीक्षा में कीमतें ४ से ५ रुपये प्रति लीटर तक घट सकती हैं। कच्चे तेल की लैंडेड कॉस्ट 110 डॉलर प्रति बैरल से घटकर अब 84 डॉलर के आसपास आ चुकी है।
LPG सिलेंडर: दिल्ली में जून में १४.२ किलो का सिलेंडर ९४२ रुपये से बढ़कर १,६०० रुपये के पार हो चुका है (जिस पर सरकार ७०० रुपये सब्सिडी दे रही है)। वैश्विक बाजार में एलपीजी की कीमतें (790 डॉलर प्रति टन से) गिरने के बाद जुलाई की शुरुआत में सिलेंडर ३० से ५० रुपये तक सस्ता हो सकता है।
चरण २: १ से ३ महीने में (जुलाई अंत से सितंबर)
इस अवधि में होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल का आयात-निर्यात पूरी तरह बहाल हो जाएगा और इंश्योरेंस प्रीमियम सामान्य हो जाएगा।
नया 'सामान्य' (New Normal): एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तेल की कीमतें युद्ध से पहले के 70−72 डॉलर के स्तर पर नहीं लौटेंगी। पूरे वित्त वर्ष २०२६-२७ में यह 92−95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर रह सकती हैं।
इसका मतलब है कि फरवरी २०२६ में जो पेट्रोल ९६ रुपये था, वह अब १०२ से १०८ रुपये के नए सामान्य दायरे में रहेगा।
चरण ३: ३ से ६ महीने में (सितंबर से दिसंबर)
यह आम जनता के लिए असली राहत का दौर होगा, जब चौतरफा महंगाई (CPI) कम होगी। मई २०२६ में खुदरा महंगाई ३.९३% (१५ महीने का हाई) और थोक महंगाई (WPI) ९.६८% पर थी।
अगस्त-सितंबर: थोक बाजारों में कच्चा माल सस्ता होने से कंपनियां मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट घटाएंगी।
अक्टूबर-डीसंबर (त्योहारी सीजन): आम उपभोक्ताओं के लिए पैकेज्ड फूड, साबुन, डिटर्जेंट और कपड़ों जैसी रोजमर्रा की चीजें सस्ती होने लगेंगी। CRISIL के मुताबिक, तेल 80−85 पर रहा तो सालाना औसत महंगाई दर ५.१% से घटकर ४.५% - ४.८% पर आ सकती है।
राहत के रास्ते में ४ बड़ी अड़चनें: जिन पर रखनी होगी नजर
१. इजरायल का रुख: समझौते के ठीक पहले इजरायल ने बेरूत में हिजबुल्लाह पर हमला किया। यदि इजरायल का विरोध जारी रहा, तो ईरान दोबारा सप्लाई लाइन बाधित कर सकता है। २. ६० दिनों का 'परमाणु टेस्ट': १९ जून को हस्ताक्षर के बाद ६० दिनों के भीतर ईरान के पास मौजूद ६०% शुद्धता वाले ४४० किलो यूरेनियम के निपटारे पर अंतिम बातचीत होनी है। इसके विफल होने पर डील टूट सकती है। ३. बिखरी हुई सप्लाई चेन: १०७ दिनों के युद्ध के कारण जहाजों के रास्ते बदल चुके थे। इंश्योरेंस और लॉजिस्टिक्स को सामान्य होने में कम से कम २-३ महीने लगेंगे। ४. सरकारी खजाना बनाम राहत: कच्चे तेल की कीमतों में हर १० डॉलर की बढ़ोतरी भारत का आयात बिल १३-१४ अरब डॉलर बढ़ा देती है। सरकार खजाने के घाटे को पाटने और जनता को राहत देने के बीच संतुलन बनाने के लिए एक्साइज ड्यूटी में फेरबदल कर सकती है।
निष्कर्ष:
अमेरिका-ईरान समझौते ने बाजार को एक नई उम्मीद और ऊर्जा जरूर दी है, लेकिन इसका जमीन पर असर दिखने के लिए जनता को कुछ हफ्तों से लेकर कुछ महीनों का सब्र रखना होगा। सब कुछ १९ जून को स्विट्जरलैंड में होने वाले आधिकारिक हस्ताक्षर की सफलता पर टिका है।