विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी डेस्क:
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज इमेज रिकग्निशन और मेडिकल डेटा एनालिसिस जैसे जटिल मामलों में इंसानी दिमाग को पीछे छोड़ चुका है। लेकिन जब बात इंसानी शरीर के साथ तालमेल बिठाने की आती है, तो आधुनिक तकनीक भी घुटने टेक देती है। इस बड़ी चुनौती को पार करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक अभूतपूर्व खोज की है। शोधकर्ता अब एक ऐसी 'इलेक्ट्रॉनिक स्किन' (E-Skin) विकसित करने में जुटे हैं, जो न सिर्फ रबर की तरह खिंच (स्ट्रैच) सकती है, बल्कि इंसानी दिमाग की तरह ही सूचनाओं को प्रोसेस भी कर सकती है।
मशीन और इंसान के बीच की दीवार होगी ध्वस्त
अब तक की सबसे एडवांस्ड सिलिकॉन चिप्स भी बेहद कठोर और अनम्य (Rigid) होती हैं। इंसानी शरीर के टिश्यू बेहद सॉफ्ट, फ्लेक्सिबल और लगातार मूवमेंट करने वाले होते हैं। ऐसे में कठोर इलेक्ट्रॉनिक्स को किसी अंग या त्वचा के साथ जोड़ना नामुमकिन सा था; इससे इन्फेक्शन या चिप के ढीले होने का खतरा हमेशा बना रहता था। वैज्ञानिकों ने अब इस सोच को ही बदल दिया है—वे इंसानी शरीर को मशीन के हिसाब से ढालने की बजाय, इलेक्ट्रॉनिक्स को इंसानी शरीर के मुताबिक सॉफ्ट बना रहे हैं।
ई-स्किन (E-Skin) की 4 सबसे बड़ी खूबियाँ
असाधारण लचीलापन: यह त्वचा लिविंग टिश्यू (जीवित ऊतकों) के साथ आसानी से एडजस्ट हो सकती है और इसे कितना भी मोड़ा या खींचा जा सकता है।
3-इन-1 क्षमता: इस सिंगल स्किन में सेंसिंग (महसूस करना), मेमोरी (याद रखना) और कंप्यूटिंग (सोचना) तीनों खूबियाँ एक साथ मौजूद हैं।
सुपर एफिशिएंट: इस इलेक्ट्रॉनिक स्किन को काम करने के लिए भारी-भरकम बिजली की जरूरत नहीं है, यह महज 0.5 Volts के न्यूनतम पावर पर भी जटिल टास्क पूरे कर सकती है।
बायोलॉजिकल तालमेल: यह पारंपरिक मेटल सर्किट्स के विपरीत, इंसानी नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) की तरह ही इलेक्ट्रोकेमिकल सिग्नलिंग पर काम करती है।
कैसे काम करता है इसका 'जादुई' मैकेनिज्म?
मिक्स्ड आयोनिक-इलेक्ट्रॉनिक कंडक्शन: पारंपरिक सर्किट में बिजली दौड़ाने के लिए धातु के रास्तों (Metal Pathways) का इस्तेमाल होता है। लेकिन इस इलेक्ट्रॉनिक स्किन में 'पॉलीमर्स' और 'आयनोजेल्स' जैसे बेहद मुलायम जेल-आधारित पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इसके जरिए इलेक्ट्रॉन्स और आयन ठीक उसी तरह मूव करते हैं, जैसे हमारे शरीर में न्यूरॉन्स सिग्नल भेजते हैं।
सफलता के बीच अभी भी एक बड़ी चुनौती
इस तकनीक ने विज्ञान जगत को रोमांचित जरूर किया है, लेकिन इसके कमर्शियल इस्तेमाल में अभी एक बड़ी बाधा बाकी है—मेमोरी रिटेंशन (स्मृति को संजोकर रखना)।
वर्तमान में जो सॉफ्ट मेमोरी डिवाइसेस बनाई गई हैं, उनमें जैसे ही पावर या सिग्नल कट होता है, वैसे ही उनके भीतर स्टोर डेटा और मेमोरी गायब हो जाती है। वैज्ञानिक अब इस समस्या को सुलझाने और इसे 'लॉन्ग-टर्म' (दीर्घकालिक) उपयोग के काबिल बनाने के लिए दिन-रात शोध कर रहे हैं। यदि यह चुनौती पार हो जाती है, तो रोबोटिक्स, प्रोस्थेटिक्स (कृत्रिम अंग) और हेल्थकेयर सेक्टर का भविष्य हमेशा के लिए बदल जाएगा।