NEET री-एग्जाम से पहले टेलीग्राम बैन पर छिड़ा 'डिजिटल वॉर': IIT कानपुर के डायरेक्टर और छात्र सार्थक सिद्धांत के बीच तीखी बहस!

"एडिट फीचर से बन रहे फेक पेपर लीक के सबूत"—डायरेक्टर मणींद्र अग्रवाल का दावा; ओपन-सोर्स कोड का हवाला देकर छात्र ने कहा—"तकनीकी तौर पर गलत है सरकार का तर्क।"

16 Jun 2026  |  183

 

 

नई दिल्ली/कानपुर:

नीट-यूजी (NEET-UG) 2026 की री-परीक्षा से ठीक पहले केंद्र सरकार द्वारा टेलीग्राम को 22 जून तक अस्थायी रूप से ब्लॉक किए जाने के फैसले ने देश में एक नई तकनीकी और राजनीतिक बहस को जन्म दे दे दिया है। इस फैसले के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर आईआईटी कानपुर के डायरेक्टर प्रोफेसर मणींद्र अग्रवाल और देश के जाने-माने 18 वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत (CBSE मूल्यांकन विसंगतियों को उजागर करने वाले) के बीच तीखी बहस छिड़ गई है, जो तेजी से वायरल हो रही है।

 सोशल मीडिया पर 'एक्स' पर आमने-सामने दिग्गज

सार्थक सिद्धांत का सवाल: "व्हाट्सएप और एक्स पर बैन क्यों नहीं?"

बहस की शुरुआत करते हुए छात्र सार्थक सिद्धांत ने सरकार के तर्क को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने लिखा कि अगर गलत जानकारी और अफवाहें फैलना ही किसी प्लेटफॉर्म को बंद करने का आधार है, तो व्हाट्सएप और एक्स (ट्विटर) पर भी रोजाना भ्रामक खबरें चलती हैं, फिर केवल टेलीग्राम को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है? उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि असहमति की हर आवाज को 'गलत जानकारी' कहकर दबाया नहीं जा सकता और लोगों के बीच संवाद को रोकना समस्या का समाधान नहीं है।

प्रो. मणींद्र अग्रवाल का पलटवार: "टेलीग्राम का एडिट फीचर है असली विलेन"

आईआईटी कानपुर के डायरेक्टर प्रो. मणींद्र अग्रवाल ने सार्थक की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए टेलीग्राम के एक बड़े तकनीकी लूपहोल (कमजोरी) की ओर इशारा किया। उन्होंने दावा किया:

टेलीग्राम की समस्या सिर्फ कंटेंट शेयरिंग नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल ऐसे फर्जी दावे और 'क्रोनोलॉजिकल' हेरफेर के लिए किया जा रहा है जिससे छात्रों में भारी भ्रम फैल रहा है।

व्हाट्सएप पर यदि कोई संदेश एडिट किया जाता है, तो वहां साफ तौर पर 'Edited' लिखा हुआ दिखाई देता है।

टेलीग्राम में ऐसी विशेष व्यवस्थाएं हैं जहां पुराने मैसेजेस को एडिट करने के बाद भी कई बार यह साफ तौर पर पकड़ में नहीं आता कि उसमें बदलाव किया गया है। ठग इसी का फायदा उठाकर पुराने टाइमस्टैम्प (समय) पर फर्जी पेपर लीक की पीडीएफ अपलोड कर देते हैं, जिससे लगता है कि पेपर परीक्षा से पहले लीक हो गया था।

सार्थक ने तकनीकी दावे को बताया गलत

सार्थक सिद्धांत ने प्रोफेसर के इस दावे को सीधे तौर पर चुनौती देते हुए इसे तकनीकी रूप से गलत करार दिया। उन्होंने टेलीग्राम के ओपन-सोर्स कोड का हवाला देते हुए तर्क दिया कि टेलीग्राम में भी एडिट किए गए संदेश का स्पष्ट संकेत (समय और तारीख के साथ) दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था को लेकर समाज में गलत जानकारी पेश की जा रही है।

 आखिर सरकार ने क्यों उठाया यह सख्त कदम?

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की सिफारिश पर सरकार ने 21 जून को होने वाले NEET-UG री-एग्जाम की शुचिता बनाए रखने के लिए यह कदम आखिरी विकल्प के रूप में उठाया है।

 NTA की रडार पर आए मुख्य फेक चैनल्स के नाम: 1. "पेपर लीकेड NEET" 2. "री-NEET 2026" 3. "प्राइवेट माफिया"

ये चैनल छात्रों और अभिभावकों से कथित प्रश्नपत्र के बदले लाखों रुपये की मांग कर रहे थे।

 टेलीग्राम बनाम व्हाट्सएप: क्यों कड़ा हुआ शिकंजा?

फीचर्स और नीतियांटेलीग्राम (Telegram)व्हाट्सएप (WhatsApp)
गोपनीयताफोन नंबर छिपाकर सिर्फ यूजरनेम से चैनल चलाना संभव।ग्रुप एडमिन और यूजर्स के नंबर सार्वजनिक रहते हैं।
फाइल और यूजर सीमालाखों सब्सक्राइबर्स और 2GB तक की बड़ी फाइलें शेयरिंग।सीमित ग्रुप मेंबर्स और फाइल साइज पर पाबंदी।
एडिट मैकेनिज्मपुराने मैसेज को एडिट कर बाद में पीडीएफ जोड़ना आसान।मैसेज एडिट करने की समय सीमा बेहद सीमित है।
सरकारी सहयोगसंचालन व्यवस्था के कारण जांच एजेंसियों से कम सहयोग।मेटा AI की मदद से संदिग्ध गतिविधियों पर तुरंत एक्शन।

 

निष्कर्ष

प्रो. मणींद्र अग्रवाल ने माना कि लोकतंत्र में बैन लगाने जैसे कदमों पर बहस होना स्वाभाविक है, लेकिन इस अप्रत्याशित फैसले के पीछे के राष्ट्रीय सुरक्षा और परीक्षा की संवेदनशीलता के संदर्भ को समझना जरूरी है। फिलहाल, 22 जून तक टेलीग्राम के इस प्रतिबंध ने देश के लाखों छात्रों और तकनीकी विशेषज्ञों को दो धड़ों में बांट दिया है।

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