वॉशिंगटन। क्या दुनिया को घुटनों पर लाने वाले और करोड़ों लोगों की जान लेने वाले कोरोना वायरस का सच जानबूझकर दुनिया से छिपाया गया? इस सवाल ने एक बार फिर पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है। अमेरिका की निवर्तमान खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन कुछ ऐसे बेहद गोपनीय और सनसनीखेज दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं, जिन्होंने अमेरिकी राजनीति के साथ-साथ वैश्विक कूटनीति में भी भूचाल ला दिया है। ये दस्तावेज सीधे तौर पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार रहे डॉ. एंथनी फौसी को कटघरे में खड़ा करते हैं।
तुलसी गबार्ड का सीधा और गंभीर आरोप है कि डॉ. फौसी ने न केवल चीन की विवादित 'वुहान लैब' को अमेरिकी फंड ट्रांसफर कराया, बल्कि कोरोना वायरस के लैब से लीक होने की 'लैब-लीक थ्योरी' को दबाने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को भी पूरी तरह गुमराह किया।
वुहान लैब, अमेरिकी पैसा और 'गैन-ऑफ-फंक्शन' का खतरनाक खेल
तुलसी गबार्ड के कार्यालय द्वारा जारी किए गए बयानों के मुताबिक, डॉ. फौसी ने 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिसीज' (NIAID) के प्रमुख के रूप में अपने 38 साल के कार्यकाल के दौरान अमेरिकी करदाताओं (टैक्सपेयर्स) के लाखों डॉलर चीन के 'वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी' (WIV) को भेजे थे।
खतरनाक रिसर्च का आरोप: दस्तावेजों के हवाले से दावा किया गया है कि इस अमेरिकी पैसे का इस्तेमाल चमगादड़ों के कोरोना वायरस पर बेहद खतरनाक 'गैन-ऑफ-फंक्शन' रिसर्च (वायरस की ताकत और मारक क्षमता बढ़ाने वाले प्रयोग) के लिए किया गया था। कई वैश्विक वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी प्रयोग के दौरान वायरस लीक हुआ और पूरी दुनिया में फैल गया।
फार्मा कंपनियों को फायदा: गबार्ड ने आरोप लगाया कि फौसी ने बड़ी फार्मा कंपनियों के मुनाफे और ट्रिलियन डॉलर के 'यूनिवर्सल वैक्सीन मार्केट' को बढ़ावा देने के लिए इस बेहद जोखिम भरे रिसर्च को बैक किया।
खुफिया रिपोर्टों को मैनिपुलेट करने का 'डीप स्टेट' हथकंडा
खुफिया प्रमुख के दफ्तर द्वारा जारी फाइलों से पता चलता है कि डॉ. फौसी ने पर्दे के पीछे रहकर अमेरिकी खुफिया समुदाय के आकलनों को प्रभावित और मैनिपुलेट किया था।
पसंद के वैज्ञानिकों से बनवाई रिपोर्ट: फौसी ने जानबूझकर अपने वफादार और पसंदीदा वैज्ञानिकों को खुफिया एजेंसियों को सलाह देने के लिए चुना। इन वैज्ञानिकों ने एक ऐसी रिपोर्ट तैयार की, जिसमें दावा किया गया कि कोरोना वायरस प्राकृतिक रूप से फैला है, न कि किसी लैब से।
असहमति की आवाजें दबाई गईं: बाद में इसी रिपोर्ट को 'वैज्ञानिक सहमति' (Scientific Consensus) बताकर दुनिया के सामने पेश किया गया, ताकि फौसी का खुद का बचाव हो सके। जो एक्सपर्ट्स इस सरकारी कहानी से असहमत थे, उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज और सेंसर कर दिया गया।
'संसद में बोला झूठ और व्हिसलब्लोअर्स को दी करियर बर्बाद करने की धमकी'
तुलसी गबार्ड ने डॉ. फौसी पर अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के सामने कसम खाकर झूठ बोलने का सीधा और आधिकारिक आरोप लगाया है। जून 2024 में संसद की सुनवाई के दौरान जब फौसी से पूछा गया था कि क्या उन्होंने कोरोना या वायरस रिसर्च को लेकर कभी एफबीआई (FBI) या सीआईए (CIA) जैसी खुफिया एजेंसियों से बात की थी, तो फौसी ने साफ मुकरते हुए कहा था कि उनकी जानकारी में ऐसी कोई बात नहीं हुई है। हालांकि नए दस्तावेज इस दावे को पूरी तरह झूठा साबित कर रहे हैं।
इसके अलावा, कई व्हिसलब्लोअर्स (भेद खोलने वाले अधिकारियों) ने गवाही दी है कि जिन खुफिया विश्लेषकों ने फौसी की थ्योरी को चुनौती देने की कोशिश की, उन्हें नौकरी से निकालने, साइडलाइन करने और उनका करियर पूरी तरह बर्बाद करने की धमकियां दी गईं।
'अमेरिकी जनता सच जानने की हकदार है'
हाल ही में (अपने बीमार पति की देखभाल के लिए) डोनाल्ड ट्रंप की खुफिया प्रमुख के पद से इस्तीफा देने वाली तुलसी गबार्ड ने कहा कि सच को छिपाने के लिए जो तरीके अपनाए गए, वे सीधे तौर पर 'डीप स्टेट' (परदे के पीछे से सरकार चलाने वाले तंत्र) की साजिश जैसे हैं।
तुलसी गबार्ड का कड़ा बयान: "कोरोना महामारी ने करोड़ों अमेरिकियों और दुनिया भर के लोगों को असहनीय दर्द और नुकसान दिया है। सालों के झूठ, सेंसरशिप और सच को दबाने के बाद, अब अमेरिकी जनता पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही की हकदार है। डॉ. फौसी जैसे नेताओं ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया, संसद से झूठ बोला और देश के राष्ट्रपति तक को जरूरी तथ्यों से दूर रखा।"
फिलहाल मौन हैं डॉ. फौसी: गौरतलब है कि इन बेहद गंभीर, तीखे और कूटनीतिक रूप से संवेदनशील आरोपों पर डॉ. एंथनी फौसी या उनके कानूनी प्रतिनिधियों की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या सफाई सामने नहीं आई है। हालांकि, अमेरिका के राजनीतिक और रक्षा गलियारों में इस खुलासे के बाद एक बड़ा भूचाल आ चुका है।