अमेरिका-ईरान डील में अब फ्रांस ने फंसाया पेच: विदेश मंत्री बोले— 'हमारे बिना UN में पत्ता नहीं हिल सकता, कर देंगे वीटो'

इजरायल के बाद फ्रांस के अड़ंगे से संकट में शांति समझौता; मिसाइल प्रोग्राम और प्रॉक्सी संगठनों पर घेरा, ट्रंप बोले— 'हथियार बनाना ईरान का संप्रभु अधिकार'

19 Jun 2026  |  86

 

 

 

पेरिस/वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक शांति समझौते की राह अब और ज्यादा पथरीली होती जा रही है। इजरायल के बाद अब यूरोपीय महाशक्ति फ्रांस ने भी इस समझौते पर गंभीर सवाल उठाते हुए बड़ा पेच फंसा दिया है। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने दोटूक शब्दों में कहा है कि यह डील तभी मान्य होगी, जब फ्रांस इसकी शर्तों से पूरी तरह संतुष्ट होगा। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि "हमारे बिना संयुक्त राष्ट्र (UN) में पत्ता नहीं हिल सकता है" और इस कूटनीतिक प्रक्रिया में फ्रांस के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

फ्रांस का यह तीखा रुख ऐसे समय में सामने आया है, जब पहले से ही इजरायल के कड़े विरोध और लेबनान पर हो रहे हमलों के कारण स्विट्जरलैंड में होने वाली अमेरिका-ईरान की बेहद महत्वपूर्ण शांति वार्ता रद्द हो चुकी है। अब फ्रांस के इस नए अड़ंगे ने शांति समझौते को पूरी तरह अधर में लटका दिया है।

क्या है फ्रांस की मांग? क्यों है नाराज?

समाचार एजेंसी 'फ्राइंस्को' से विशेष बातचीत करते हुए फ्रांसीसी विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने साफ किया कि मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में स्थायी शांति के लिए एकतरफा नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर व्यापक बातचीत की जरूरत है।

फ्रांस ने इस समझौते के सामने दो मुख्य शर्तें और मांगें रखी हैं:

मिसाइल और प्रॉक्सी पर रोक: फ्रांस का कहना है कि जब तक अमेरिका-ईरान वार्ता में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके द्वारा क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठनों (जैसे हिजबुल्लाह, हमास आदि) को दिए जाने वाले समर्थन के मुद्दे को शामिल नहीं किया जाता, तब तक क्षेत्र में शांति की कल्पना बेमानी है।

फ्रांस की सीधी भागीदारी: बैरोट ने मांग की कि इस पूरी वार्ता में फ्रांस को भी एक मुख्य पक्ष के रूप में शामिल किया जाए, ताकि निष्पक्ष और संतुलित तरीके से बातचीत आगे बढ़ सके।

क्यों अहम है फ्रांस का विरोध? संयुक्त राष्ट्र में अटकेगा प्रस्ताव

इस प्रारंभिक शांति समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान को भरोसा दिया था कि कूटनीतिक सहमति बनते ही संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंधों को हटा लिया जाएगा। प्रतिबंध हटने से ईरान वैश्विक स्तर पर खुलकर व्यापार कर सकेगा और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम से जुड़ सकेगा।

लेकिन, फ्रांस के विरोध ने अमेरिका के इस वादे पर पानी फेर दिया है। फ्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का एक स्थायी सदस्य है, जिसके पास वीटो (Veto) पावर है। विदेश मंत्री बैरोट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर फ्रांस शर्तों से संतुष्ट नहीं हुआ, तो वह ईरान पर से प्रतिबंध हटाने वाले किसी भी प्रस्ताव के खिलाफ सुरक्षा परिषद में 'वीटो' का इस्तेमाल कर देगा। यूएन के नियम के मुताबिक, यदि कोई भी एक स्थायी सदस्य वीटो कर दे, तो प्रस्ताव पूरी तरह खारिज हो जाता है। यही कारण है कि फ्रांस के इस कदम को बेहद निर्णायक माना जा रहा है।

ईरान की मिसाइलों पर डोनाल्ड ट्रंप का चौंकाने वाला रुख

इस पूरे कूटनीतिक विवाद के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बेहद चौंकाने वाला बयान सामने आया है। जब राष्ट्रपति ट्रंप से यह पूछा गया कि इस समझौते में ईरान के मिसाइल निर्माण पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया है, तो उन्होंने फ्रांस और आलोचकों की थ्योरी को खारिज करते हुए कहा:

डोनाल्ड ट्रंप का बयान: “यह ईरान के साथ सरासर अन्याय होगा। ईरान के पड़ोसी देशों, जैसे सऊदी अरब और तुर्की के पास भी आधुनिक हथियार हैं। हम इस समझौते के नाम पर ईरान की सुरक्षा स्थिति को कमजोर नहीं कर सकते। अभी तक ईरान के पास कोई बैलिस्टिक मिसाइल नहीं है; अगर वह भविष्य में उन्हें बनाना चाहता है, तो बनाए, मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है। मैं किसी भी देश की संप्रभुता (Sovereignty) को खतरे में नहीं डाल सकता।”

कूटनीति के चौराहे पर खड़ी दुनिया

राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान से साफ है कि अमेरिका इस मामले में ईरान को ज्यादा दबाने के पक्ष में नहीं है, जबकि फ्रांस और इजरायल सुरक्षा गारंटी को लेकर अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं। अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगी फ्रांस को मनाने में कामयाब होता है, या फिर वैश्विक शक्तियों का यह आपसी टकराव मिडिल ईस्ट को शांति के एक और सुनहरे मौके से महरूम कर देगा।

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