सड़कों पर मौत का सफ़र: 5 साल में 1.8 लाख पैदल यात्रियों ने गंवाई जान, क्या हमें सुरक्षित चलने का भी हक़ नहीं?

राष्ट्रीय राजमार्गों पर 31% हादसे; सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया—पैदल चलना नागरिकों का 'मौलिक अधिकार', बुनियादी ढांचे में भारी विफलता आई सामने।

20 Jun 2026  |  32

 

 

नई दिल्ली: भारत की सड़कों पर पैदल चलना लगातार जानलेवा साबित हो रहा है। हाल ही में जारी सरकारी आँकड़े देश में सड़क सुरक्षा की एक बेहद डरावनी और चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। साल 2019 से 2024 के बीच देश में सड़क हादसों के दौरान 1.8 लाख से अधिक पैदल यात्रियों की मौत हो चुकी है। इसका सीधा और दर्दनाक मतलब यह है कि देश में औसतन हर साल 30,500 से ज़्यादा लोग सिर्फ इसलिए अपनी जान गंवा देते हैं क्योंकि वे सड़क पर चल रहे थे।

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में पैदल यात्रियों की मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक है। इसका सबसे बड़ा कारण सड़कों पर सुरक्षित फुटपाथ और जेब्रा क्रॉसिंग जैसे उचित बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का न होना है।

राजमार्ग बने 'डेथ ट्रैप', दोपहिया और कारें सबसे बड़ी वजह

सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा साल 2024 के लिए जारी किए गए नवीनतम आँकड़े बताते हैं कि पैदल चलने वालों के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highways) सबसे खतरनाक साबित हो रहे हैं।

कुल मौतों में से 31% दुर्घटनाएं अकेले राष्ट्रीय राजमार्गों पर हुईं।

पैदल यात्रियों की कुल मौतों में से लगभग 54% मौतें दोपहिया वाहनों और कारों की टक्कर के कारण हुईं।

पैदल यात्रियों की मौतों में राज्यों की स्थिति (2024)

राज्यपैदल यात्रियों की मौतें
तमिलनाडु4,712 (सबसे खराब स्थिति)
बिहार4,149
महाराष्ट्र3,344
पश्चिम बंगाल3,241

 

नोट: 10 लाख से अधिक आबादी वाले देश के 53 प्रमुख शहरों में 4,328 पैदल यात्रियों की मौत हुई, जो कुल मौतों का केवल 11.8% है। यानी शहरों से ज़्यादा खतरा बाहरी और ग्रामीण सड़कों पर है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: 'पैदल चलना मौलिक अधिकार'

पैदल यात्रियों की सड़कों पर बढ़ती मौतें नीति निर्माताओं और सड़क निर्माण एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश में नागरिकों के पैदल चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार (Fundamental Right) माना है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि फुटपाथ का उपयोग करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) के तहत गारंटीकृत है। साथ ही, शीर्ष अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए स्पष्ट रूप से सीमांकित (Demarcated) फुटपाथ बनाने के लिए सख्त कानून बनाए।

"यह आँकड़ा दर्शाता है कि सरकारी सड़क एजेंसियों को प्रमुख शहरी क्षेत्रों के बाहर पैदल चलने वालों की मौतों के सटीक कारणों का पता लगाने की सख्त आवश्यकता है। राष्ट्रीय व राज्य राजमार्गों पर इन लोगों के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराया जाना चाहिए।" — अमर श्रीवास्तव (प्रमुख, इंडिया रोड सेफ्टी कैंपेन)

नियम और मानक हैं, बस लागू करने की 'इच्छाशक्ति' नहीं

सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक अन्य मामले में एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) ने सुझाव दिया है कि सरकार को राजमार्गों पर पैदल चलने वालों के लिए विशेष सांकेतिक बोर्ड (Signage) लगाने चाहिए, ताकि उन्हें अलर्ट किया जा सके।

सड़क परिवहन मंत्रालय में संयुक्त सचिव रह चुके सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ अभय दामले ने सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का स्वागत किया है। उन्होंने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा:

"हमारे पास पैदल चलने वालों की सुविधाओं के लिए 'इंडियन रोड्स कांग्रेस' द्वारा निर्धारित बेहतरीन मानक मौजूद हैं। समस्या मानकों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने में हमारी पूरी विफलता है। दुर्भाग्य से, हमारी सड़कों का डिज़ाइन सिर्फ वाहनों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यही वजह है कि बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगों को अपनी जान जोखिम में डालकर मुख्य सड़कों पर चलना पड़ता है।"

समय की मांग: ये आँकड़े महज़ संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों की चीखें हैं जिन्होंने अपने अपनों को खोया है। यदि अब भी हमारी निर्माण एजेंसियों ने केवल 'गाड़ियों की रफ़्तार' के बजाय 'इंसानों की सुरक्षा' को तरजीह नहीं दी, तो ये हाईवे और सड़कें यूं ही बेगुनाहों के खून से लाल होती रहेंगी।

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