मॉनसून 2026 की 'सुस्त चाल' से बढ़ी चिंता: खरीफ फसलों पर संकट के बादल, आपकी जेब पर गहराएगा महंगाई का साया

कमजोर बारिश से धान, दाल और सब्जियों के उत्पादन पर सीधा असर; चारे की किल्लत से दूध-घी भी हो सकते हैं महंगे, जुलाई की बारिश पर टिकी देश की उम्मीदें।

22 Jun 2026  |  142

 

 

आर्थिक ब्यूरो, नई दिल्ली

नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था और खेती की लाइफलाइन कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की धीमी रफ्तार ने केंद्र सरकार से लेकर आम आदमी तक की चिंता बढ़ा दी है। जून का महीना बीतने को है, लेकिन कमजोर मानसूनी हवाओं और पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) की अत्यधिक सक्रियता के कारण बारिश का ग्राफ सामान्य से काफी नीचे बना हुआ है। यदि अगले कुछ दिनों में मॉनसून ने रफ्तार नहीं पकड़ी, तो आने वाले दिनों में धान, दाल, चीनी, सब्जियों और दूध समेत तमाम जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे खुदरा महंगाई (CPI) पर दबाव बढ़ना तय है।

सामान्य से 32% तक कम बरसे बदरा, यूपी-बिहार में भारी देरी

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 के पहले पखवाड़े में देश के भीतर सामान्य से 25% से 32% तक कम बारिश दर्ज की गई है। उत्तर और मध्य भारत की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। आमतौर पर 20 जून तक उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमाओं में दाखिल होने वाला मॉनसून इस बार 5 से 10 दिन की देरी से चल रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो बारिश की कमी 50% से भी ऊपर निकल चुकी है। प्रशांत महासागर में उभर रही 'एल नीनो' (El Niño) जैसी स्थितियां भी इस बार मॉनसून के पैटर्न को असमान और कमजोर बना रही हैं।

इन प्रमुख सेक्टरों पर दिखेगा मॉनसून की बेरुखी का सबसे बड़ा असर:

1. खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित, चावल हो सकता है महंगा

जून और जुलाई का महीना खरीफ फसलों की बुवाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और गन्ने जैसी फसलों को शुरुआती दौर में भारी पानी की आवश्यकता होती है। पर्याप्त बारिश न होने के कारण किसानों को बुवाई टालनी पड़ रही है। पानी की अत्यधिक खपत वाली धान की फसल अगर समय पर नहीं बोई गई, तो इसके कुल उत्पादन में गिरावट आ सकती है, जिससे बाजार में चावल की कीमतें बढ़ेंगी।

2. दालों और खाद्य तेलों का बिगड़ेगा बजट

भारत अपनी सालाना दालों की जरूरत (लगभग 300 लाख टन) को पूरा करने के लिए पहले से ही घरेलू उत्पादन (240-260 लाख टन) के अलावा विदेशों से आयात पर निर्भर है। अरहर, उड़द और मूंग जैसी मुख्य खरीफ दालों के उत्पादन में कमी आने से देश की विदेशी निर्भरता और बढ़ेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही पिछले साल मटर के अधिक आयात के कारण इस बार 20-25 लाख मीट्रिक टन के इंपोर्ट से काम चल जाता, लेकिन मॉनसून के इस नकारात्मक सेंटीमेंट के कारण बाजार में दालों और खाद्य तेलों (सोयाबीन) की कीमतों में उठापटक शुरू हो गई है।

3. गन्ना उत्पादन घटा तो कड़वी होगी चीनी की मिठास

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे चीनी उत्पादक बेल्ट में बारिश की कमी का सीधा असर गन्ने की फसल पर पड़ेगा। गन्ने की पैदावार कम होने का सीधा मतलब है:

चीनी का उत्पादन घटना और इसके दामों में बढ़ोतरी।

बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक्स, मिठाइयों और पैकेज्ड फूड की इनपुट कॉस्ट (लागत) बढ़ना।

4. थाली से दूर होंगी हरी सब्जियां, दूध-दही भी होंगे महंगे

टमाटर, प्याज और आलू जैसी जल्दी खराब होने वाली फसलों पर कम बारिश और तेज गर्मी की दोहरी मार पड़ रही है, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। इसके अलावा, बारिश की कमी से ग्रामीण इलाकों में पशुओं के लिए हरे चारे का संकट खड़ा हो सकता है। चारा महंगा होने से दूध उत्पादन घटेगा, जिससे घी, दही और मक्खन की कीमतें लंबे समय के लिए बढ़ सकती हैं।

अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार: घटेगी ग्रामीण आय

भारत में खाने-पीने की चीजों का खुदरा महंगाई सूचकांक (CPI) में एक बड़ा हिस्सा है। खाद्य पदार्थों के महंगे होने से न सिर्फ आम शहरी उपभोक्ता की जेब ढीली होगी, बल्कि खेती पर निर्भर ग्रामीण आबादी की आय भी घटेगी। ग्रामीण आय घटने से बाजार में एफएमसीजी (FMCG) और अन्य सेक्टरों की मांग में कमी आएगी, जो पूरी इकोनॉमी के लिए एक चेतावनी है।

संकट या सिर्फ चेतावनी? क्या कहते हैं जानकार

हालांकि, आर्थिक और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति अभी पूरी तरह नियंत्रण से बाहर नहीं गई है। मॉनसून थमा नहीं है, बल्कि सिर्फ इसकी रफ्तार सुस्त हुई है। मौसम विभाग के पूर्वानुमानों के मुताबिक, जुलाई की शुरुआत से मानसूनी हवाएं दोबारा जोर पकड़ सकती हैं। यदि जुलाई में अच्छी और देशव्यापी बारिश हो जाती है, तो खरीफ की फसलें काफी हद तक संभल जाएंगी। इसके अलावा, भारत के पास वर्तमान में सिंचाई के बेहतर साधन और अनाज का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है, जो किसी भी तात्कालिक संकट से निपटने में सक्षम है। फिलहाल यह स्थिति देश के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिसकी असल दिशा आने वाले दो हफ्ते तय करेंगे।

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