अदाणी केस पर अमेरिकी जज के कड़े तेवर: न्याय विभाग की 'आरोप हटाने' की अर्जी तुरंत खारिज; 13 जुलाई तक मांगा ठोस जवाब

'ट्रंप प्रशासन और अदाणी के बीच समझौते को अदालत से झटका; जज बोले—सरकार का बेजान बयान केस बंद करने के लिए नाकाफी।'

27 Jun 2026  |  153

 

 

न्यूयॉर्क/नई दिल्ली:

भारतीय अरबपति और अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी के खिलाफ अमेरिका में चल रहे कथित धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी के मामले में एक बड़ा कानूनी पेंच फंस गया है। न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज निकोलस गारौफिस ने गौतम अदाणी के खिलाफ आपराधिक आरोपों को तुरंत खारिज करने से साफ इनकार कर दिया है। ट्रंप प्रशासन के अमेरिकी न्याय विभाग (जस्टिस डिपार्टमेंट) द्वारा केस बंद करने की अपील पर सख्त रुख अपनाते हुए जज ने सरकार से ही सवाल दाग दिए हैं और अपने इस फैसले को सही ठहराने के लिए 13 जुलाई तक और अधिक विस्तृत जानकारी व ठोस आधार पेश करने का आदेश दिया है।

क्या है पूरा मामला और अमेरिकी न्याय विभाग का रुख?

गौरतलब है कि वर्ष 2024 में गौतम अदाणी और उनके करीबियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने भारत में एक बड़े सोलर पावर प्रोजेक्ट की मंजूरी के लिए सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने की सहमति जताई थी। इसके साथ ही उन पर अमेरिकी निवेशकों को कंपनी की भ्रष्टाचार-रोधी नीतियों को लेकर गुमराह करने का भी आरोप था।

हाल ही में, ट्रंप प्रशासन के आने के बाद अदाणी ग्रुप और अमेरिकी न्याय विभाग के बीच एक समझौता हुआ। इसके तहत न्याय विभाग ने जज गारौफिस से आरोपों को खारिज करने की मांग करते हुए दलील दी थी कि वह, "अपने अभियोजन संबंधी विवेक (prosecutorial discretion) के आधार पर, इस मामले में और अधिक संसाधन व समय नहीं लगाना चाहता।"

'सरकार का बयान संक्षिप्त और बेजान' – जज भड़के

अदालत सरकार की इस दलील से बिल्कुल संतुष्ट नहीं नजर आई। मामले को तुरंत रफा-दफा करने के मूड में न दिखते हुए जज निकोलस गारौफिस ने अमेरिकी न्याय विभाग को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा:

"सरकार का यह संक्षिप्त, बेजान और बिना किसी ठोस आधार वाला बयान अदालत को किसी तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त आधार नहीं देता। इस प्रकार के रुख से अदालत सरकार की खारिज करने की अपील का सही तरीके से कानूनी विश्लेषण भी नहीं कर सकती।"

इस अदालती आदेश के मुख्य मायने:

अंतिम चाबी जज के पास: अमेरिकी कानून के तहत न्याय विभाग और आरोपी के बीच समझौता होने के बावजूद, केस को आधिकारिक रूप से बंद करने के लिए जज की अंतिम मंजूरी (Approval) अनिवार्य होती है। जब तक जज गारौफिस इस पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, अदाणी कानूनी रूप से बरी नहीं माने जाएंगे।

ट्रंप प्रशासन की बढ़ी मुश्किलें: ट्रंप प्रशासन द्वारा कॉर्पोरेट जगत और भारत के साथ कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से इस मामले को दबाने की कोशिशों को अमेरिकी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के चलते एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है।

13 जुलाई की समयसीमा अहम: अब अमेरिकी अभियोजकों (प्रॉसिक्यूटर्स) को 13 जुलाई तक हर हाल में कोर्ट को यह समझाना होगा कि सार्वजनिक हित और न्याय के तराजू पर इस हाई-प्रोफाइल मामले को बंद करना क्यों जरूरी है।

इस अदालती मोड़ के बाद गौतम अदाणी के अमेरिकी कानूनी संकट का अंत फिलहाल टल गया है और अब पूरी दुनिया की नजरें 13 जुलाई को अमेरिकी सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले जवाब पर टिकी हैं।

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