रॉकी भाई की 'KGF' अब हकीकत: आंध्र प्रदेश के जोन्नागिरी से देश में निजी गोल्ड माइनिंग का शंखनाद, जानें क्या हैं नियम और कहाँ खुलेगी अगली खदान

"42 टन सोने का संभावित भंडार, ₹400 करोड़ का निवेश... भारी-भरकम आयात बिल घटाने और भारत में 'स्वर्ण युग' की वापसी की दिशा में ऐतिहासिक कदम!"

27 Jun 2026  |  140

 

नई दिल्ली/अमरावती:

साल 2018 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म 'KGF' ने बड़े पर्दे पर सोने की खदानों के जिस रोमांच को दिखाया था, वह अब भारत में हकीकत का रूप ले चुका है। दशकों पहले बंद हो चुकी कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) के बाद, अब भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर प्राइवेट गोल्ड माइनिंग (निजी सोना खनन) के नए दौर की शुरुआत हो गई है।

आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले का एक छोटा सा गांव 'जोन्नागिरी' आज देश के नक्शे पर 'स्वर्णगिरी' बनकर चमक रहा है। करीब ₹400 करोड़ की लागत से विकसित यह देश की पहली बड़ी निजी सोने की खदान है, जहां शुरुआती सर्वे में 13 टन और आगे चलकर 42 टन तक सोने का भंडार मिलने की संभावना जताई गई है। आइए जानते हैं कि इस ऐतिहासिक शुरुआत के मायने क्या हैं, इसके कड़े नियम क्या हैं और आने वाले समय में किन राज्यों की किस्मत चमकने वाली है।

कितना सोना निकाल सकेंगी निजी कंपनियां?

यह धारणा पूरी तरह गलत है कि निजी कंपनियां अपनी मर्जी से असीमित सोना निकाल सकती हैं। खनन की मात्रा पूरी तरह से सरकारी नियमों और स्वीकृत योजनाओं के दायरे में होती है:

सरकारी नियंत्रण: खनन की मात्रा केवल उतनी ही होगी जितनी सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रमाणित और स्वीकृत की गई हो।

चरणबद्ध उत्पादन: जोन्नागिरी परियोजना में भले ही 42 टन का संभावित भंडार है, लेकिन पहले साल केवल 400 किलोग्राम सोना निकालने का अनुमान है। आने वाले वर्षों में इसे बढ़ाकर 900 किलोग्राम से 1 टन सालाना तक किया जाएगा।

सीमित अधिकार: कंपनियों को केवल खनन का अधिकार मिलता है, खनिज संसाधनों का असली मालिकाना हक हमेशा राज्य सरकार के पास ही रहता है।

निजी गोल्ड माइनिंग के कड़े नियम

भारत में सोने सहित सभी प्रमुख खनिजों का खनन Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 के तहत होता है। किसी भी कंपनी को माइनिंग शुरू करने के लिए कई कड़े चरणों से गुजरना पड़ता है:

[ब्लॉक की सरकारी नीलामी] ➔ [सफल बोलीदाता को अधिकार] ➔ [वैज्ञानिक आकलन व भंडार की खोज] ➔ [माइनिंग लीज व स्वीकृत उत्पादन योजना] ➔ [पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की मंजूरी]

इसके अलावा कंपनियों को रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET) जैसे भारी-भरकम शुल्क सरकार के पास जमा कराने होते हैं।

केजीएफ (KGF) का स्वर्णिम इतिहास और भारत का पिछड़ना

1970 और 80 के दशक में भारत सालाना 5 टन सोने का उत्पादन करता था, जो उस समय चीन और ऑस्ट्रेलिया के बराबर था। कर्नाटक की मशहूर कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) ने अपने 120 साल के इतिहास में 800 टन से अधिक सोना देश को दिया। लेकिन 2001 में करीब 3,200 मीटर की गहराई पर जाकर अत्यधिक लागत और अयस्क की कमी के कारण इसे बंद करना पड़ा।

इसके बाद सरकारी नीतियों का फोकस कोयला, लोहा और तांबे पर शिफ्ट हो गया और भारत रिसर्च व तकनीकी मंजूरियों के फेर में पड़कर पिछड़ता गया। नतीजा यह हुआ कि आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता होने के बावजूद अपनी जरूरत का 99% सोना विदेशों से आयात करता है।

आंध्र प्रदेश के बाद अब इन राज्यों में खुलेंगी सोने की खदानें

आने वाले समय में देश के कई अन्य राज्यों में भी सोने की खदानें शुरू होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं:

राज्यसंभावित क्षेत्र / बेल्टवर्तमान स्थिति और अनुमान
ओडिशादेवगढ़, क्योंझर और मयूरभंजशुरुआती सर्वे में करीब 1,685 किलोग्राम सोने के अयस्क की संभावना। सरकार ब्लॉक नीलामी की तैयारी में है।
कर्नाटककोप्पल और रायचूरयहां 12 से 14 ग्राम प्रति टन की उच्च वैश्विक ग्रेडिंग मिली है। हालांकि, वन क्षेत्र होने के कारण पर्यावरण मंजूरी मिलना एक बड़ी चुनौती है।
मध्य प्रदेशजबलपुर (महाकौशल बेल्ट)अगस्त 2025 से चर्चा में आई इस बेल्ट में 2 से 5 ग्राम प्रति टन सोना मिलने के संकेत हैं। फिलहाल यह खोज के शुरुआती चरण में है।

 

क्या कम होगी विदेशों पर निर्भरता?

भारत हर साल लगभग 700 से 900 टन सोना आयात करता है। ऐसे में जोन्नागिरी जैसी परियोजनाएं अकेले इस विशाल आयात को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं, लेकिन यह एक रणनीतिक शुरुआत जरूर है।

वैश्विक तनाव और बढ़ते इम्पोर्ट बिल के इस दौर में, अगर आंध्र प्रदेश के बाद ओडिशा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भी निजी निवेश से खनन तेज होता है, तो अगले दशक में भारत का घरेलू सोना उत्पादन कई गुना बढ़ जाएगा। यह न केवल देश के शाही खजाने (Foreign Exchange Reserves) के लिए 'गुड न्यूज' है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास का एक नया सवेरा भी है।

अन्य खबरें