अरबों का दान, 9 लाख करोड़ की दौलत: जानिएकैसे मैनेज होता है देश के सबसे अमीर मंदिरों का खजाना

बिना जेब वाली ड्रेस से लेकर डिजिटल दान तक; अयोध्या विवाद के बाद देश के रईस धार्मिक स्थलों के सुरक्षा और प्रबंधन मॉडल पर उठी नई बहस।

04 Jul 2026  |  435

 

 

नई दिल्ली।

भारत में आस्था, आध्यात्म और अकूत संपत्ति का नाता सदियों पुराना है। देश के करोड़ों श्रद्धालु हर साल अपने आराध्य के चरणों में अरबों रुपये, सोना और चांदी अर्पित करते हैं। लेकिन हाल ही में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद, इस विशाल धार्मिक खजाने की सुरक्षा और रख-रखाव को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है। हर किसी के मन में यही सवाल है कि आखिर देश के इन बेहद अमीर मंदिरों का प्रबंधन कैसे होता है और भक्तों की गाढ़ी कमाई के चढ़ावे को कैसे सुरक्षित रखा जाता है?

देश में 8 से 10 लाख मंदिर, कई राज्यों के बजट से बड़ी संपत्ति

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में लगभग 8 से 10 लाख मंदिर हैं। इनमें से करीब 4 लाख मंदिर और उनके ट्रस्ट सीधे तौर पर अलग-अलग राज्य सरकारों के विशेष धार्मिक कानूनों या भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के तहत संचालित हो रहे हैं।

चौंकाने वाला आंकड़ा: इन सरकारी और अर्ध-सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पास ₹9 लाख करोड़ से ज्यादा की अनुमानित संपत्ति है, जो देश के कई बड़े राज्यों के सालाना बजट से भी कहीं अधिक है। पिछले दो वर्षों में सोने की कीमतों में आई भारी तेजी और श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड संख्या के कारण इस संपत्ति में जबरदस्त उछाल आया है।

किस राज्य में हैं सबसे ज्यादा पंजीकृत मंदिर?

तमिलनाडु: 79,154 मंदिर (सूची में सबसे ऊपर, पूर्णतः राज्य सरकार के अधीन)

महाराष्ट्र: 77,283 मंदिर

पश्चिम बंगाल: 53,658 मंदिर

उत्तर प्रदेश: 37,500 से ज्यादा मंदिर और धार्मिक ट्रस्ट

यूपी के 'बिग-थ्री': काशी, अयोध्या और मथुरा का मैनेजमेंट

उत्तर प्रदेश के तीन सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्रों में व्यवस्था का ढांचा अलग-अलग है:

काशी विश्वनाथ (वाराणसी): यह मंदिर पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है। यहाँ की व्यवस्था का जिम्मा वाराणसी के कमिश्नर की अध्यक्षता वाले 'बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज' के पास है।

राम मंदिर (अयोध्या): सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद केंद्र सरकार द्वारा 15 सदस्यीय ट्रस्ट का गठन किया गया था। हालांकि, जानकारों का मानना है कि पारंपरिक पुजारियों की कमी और अनुभवहीनता के कारण यहाँ हाल ही में सुरक्षा चूक देखने को मिली।

बांके बिहारी (मथुरा): इस मंदिर के बैंक खातों में ₹250 करोड़ से ज्यादा जमा हैं। गोसाइयों के आपसी विवाद के चलते यहाँ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज को बतौर पर्यवेक्षक नियुक्त किया है।

तिरुपति और वैष्णो देवी: सुरक्षा और पारदर्शिता के दो अनूठे मॉडल

देश के दो सबसे बड़े मंदिरों ने दान प्रबंधन के लिए बेहद कड़े और आधुनिक नियम अपनाए हैं:

1. तिरुमाला तिरुपति (आंध्र प्रदेश) — सबसे ज्यादा चढ़ावा

सालाना करीब ₹1,880 करोड़ का नकद चढ़ावा प्राप्त करने वाले इस मंदिर को ऑनलाइन टिकट और प्रसादम से ₹1,000 करोड़ की अतिरिक्त आमदनी होती है।

डिजिटल डोनेशन: गड़बड़ी रोकने के लिए यहाँ UPI आधारित डिजिटल दान प्रणाली को मजबूत किया गया है।

सोना-चांदी: यदि कोई भक्त कीमती धातु दान करता है, तो उसे सीधे प्रशासनिक कार्यालय जाकर रसीद लेनी होती है। बैंकों में मंदिर का 10 टन से ज्यादा सोना जमा है।

2. माता वैष्णो देवी (जम्मू-कश्मीर) — नो-पॉकेट ड्रेस कोड

पिछले 20 साल में यहाँ 1,000 किलो से ज्यादा सोना और सालाना ₹250 करोड़ का नकद चढ़ावा आया है। इसका संचालन श्राइन बोर्ड करता है जिसके अध्यक्ष खुद जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल (LG) होते हैं। यहाँ चोरी रोकने का एक फुलप्रूफ मॉडल है:

बिना जेब की पोशाक: दान के नोटों और सिक्कों की गिनती एक खुले हॉल में होती है। इस काम में लगे कर्मचारी विशेष बिना जेब (No-Pocket) वाली ड्रेस पहनते हैं ताकि कोई सिक्का या नोट छिपा न सके।

कड़ी निगरानी: पूरी गिनती अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी और 24 घंटे सीसीटीवी कैमरों की कड़े पहरे में होती है। सोने-चांदी को पिघलाने का काम भी MMTC और बैंक अधिकारियों की देखरेख में होता है।

सालाना दान के मामले में देश के शीर्ष मंदिर

मंदिर का नामसालाना अनुमानित दान (करोड़ रुपये में)
तिरुपति बालाजी₹1,880 करोड़
माता वैष्णो देवी₹250 करोड़
अयोध्या राम मंदिर₹150 करोड़
सिद्धिविनायक (मुंबई)₹100 करोड़
काशी विश्वनाथ₹80 करोड़
जगन्नाथ पुरी₹18 करोड़

क्या है स्थायी समाधान?

राम मंदिर और बांके बिहारी मंदिर के मामलों को देखते हुए विशेषज्ञ अब यह सुझाव दे रहे हैं कि मंदिरों के रोजमर्रा के कामों में सरकारों को दखल नहीं देना चाहिए। स्थायी समाधान के रूप में वित्तीय लेनदेन को पूरी तरह से डिजिटल (बैंकों के जरिए) किया जाना चाहिए और प्रबंधन में उन पारंपरिक परिवारों को शामिल किया जाना चाहिए जो सदियों से इस व्यवस्था को समझते हैं। इससे व्यवस्था में पारदर्शिता भी बनी रहेगी और भक्तों का भरोसा भी अटूट रहेगा।

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