क्रूड ऑयल हुआ धड़ाम, फिर क्यों नहीं कम हुए पेट्रोल-डीजल के दाम? जानिए ईंधन की कीमतों का पूरा गणित

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें युद्ध से पहले के स्तर पर आईं, लेकिन ऑयल कंपनियों के घाटे और रिफाइंड ईंधन के खेल ने रोकी राहत की राह।

05 Jul 2026  |  413

 

 

 

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें गिरकर ईरान युद्ध से पहले के स्तर पर आ चुकी हैं। ब्रेंट क्रूड घटकर करीब 72-73 डॉलर प्रति बैरल के आसपास घूम रहा है। इस गिरावट के बाद आम उपभोक्ताओं को उम्मीद थी कि पेट्रोल और डीजल सस्ता होगा, लेकिन घरेलू फ्यूल स्टेशनों पर कीमतें जस की तस बनी हुई हैं। आखिर वैश्विक बाजार में क्रूड सस्ता होने के बाद भी देश में ईंधन की कीमतें कम क्यों नहीं हो रहीं? आइए समझते हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतों का वो गणित, जिसके चलते राहत आप तक नहीं पहुंच पा रही है।

ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) का बड़ा दावा: मुनाफे से सीधे भारी नुकसान में

घरेलू स्तर पर तेल का खेल इस समय पूरी तरह बदल चुका है। जहाँ पिछले दो वित्तीय वर्षों में सरकारी तेल कंपनियों ने मजबूत रिटेल मार्जिन कमाया था, वहीं हालिया तिमाही में कहानी उल्टी हो गई है।

करोड़ों का झटका: केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, तेल कंपनियों (OMCs) को बाजार दरों से कम कीमत पर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और एटीएफ (हवाई ईंधन) बेचने के कारण लगभग ₹75,000 करोड़ का भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

प्रति लीटर नुकसान: ICICI सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस हालिया तिमाही के दौरान कंपनियों को बेचे गए हर लीटर डीजल पर 18.9 रुपये और हर लीटर पेट्रोल पर 6 रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है।

पिछले साल से तुलना: यह स्थिति पिछले साल से बिल्कुल विपरीत है। एक साल पहले इसी तिमाही में कंपनियों ने डीजल पर 8.2 रुपये और पेट्रोल पर 10.3 रुपये प्रति लीटर का मोटा मुनाफा (मार्जिन) कमाया था।

समझिए एक लीटर पेट्रोल-डीजल की कीमत का गणित

उपभोक्ता पेट्रोल पंप पर जो कीमत चुकाते हैं, वह सिर्फ कच्चे तेल की कीमत नहीं होती। इसके पीछे कई कड़ियों का एक लंबा जाल है, जिसे इन मुख्य बिंदुओं में समझा जा सकता है:

रिफाइनरी कीमत: यह सबसे बुनियादी लागत है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में 'रिफाइंड' पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर आधारित होती है (न कि केवल कच्चे तेल पर)।

भाड़ा और रसद (Logistics): डिपो और देश भर के रिटेल आउटलेट्स (पेट्रोल पंपों) तक ईंधन पहुंचाने का परिवहन खर्च।

विपणन और वितरण: तेल कंपनियों (OMCs) के अपने ऑपरेशनल और मार्केटिंग खर्चे।

डीलर कमीशन: पेट्रोल पंप मालिकों को दिया जाने वाला प्रति लीटर कमीशन।

टैक्स (가장 बड़ा हिस्सा): केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाने वाला केंद्रीय उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) और राज्य सरकारों का वैट (VAT)।

रिटेल मार्जिन: फ्यूल बेचने के बाद कंपनियों का होने वाला शुद्ध लाभ या नुकसान।

जब वैश्विक स्तर पर रिफाइंड ईंधन के दाम बढ़ते हैं, लेकिन भारत में उपभोक्ताओं के गुस्से या राजनीतिक कारणों से पंप की कीमतें नहीं बढ़ाई जातीं, तो कंपनियों का मार्जिन 'नेगेटिव' हो जाता है और वे घाटे में आ जाती हैं।

सिर्फ कच्चे तेल की कीमत ही एकमात्र फैक्टर क्यों नहीं?

आम जनता में यह धारणा है कि क्रूड ऑयल सस्ता होते ही पेट्रोल-डीजल के दाम गिर जाने चाहिए। लेकिन एक्सपर्ट्स इसके पीछे दो मुख्य तकनीकी कारण बताते हैं:

1. हम क्रूड नहीं, रिफाइंड प्रोडक्ट की कीमत देखते हैं

भारतीय तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल की कीमतें सिंगापुर और दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बिकने वाले रिफाइंड ईंधन (Processed Fuel) के दामों के आधार पर तय करती हैं। इसमें ढुलाई, बीमा और डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर (Exchange Rate) भी अहम भूमिका निभाती है।

2. हफ्तों पुराना होता है आपका ईंधन

पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, आज जो ईंधन पेट्रोल पंपों पर बेचा जा रहा है, वह हफ्तों पहले खरीदे गए कच्चे तेल से बना है। इसलिए, आज की गिरती हुई कीमतें तुरंत पंप पर नहीं दिखतीं, बल्कि उनमें पुरानी खरीद लागत शामिल होती है।

एनालिस्ट्स की राय में अंतर क्यों?

बाजार विश्लेषकों के बीच मुनाफे और नुकसान को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। जहां ICICI सिक्योरिटीज जैसी एजेंसियां कंपनियों को घाटे में बता रही हैं, वहीं कुछ अन्य विश्लेषकों का मानना है कि ब्रेंट क्रूड के 72-73 डॉलर प्रति बैरल पर आने से मार्जिन में सुधार हुआ है। यह अंतर इस बात पर निर्भर करता है कि कोई विश्लेषक कंपनियों के इन्वेंट्री स्टॉक, कच्चा तेल खरीदने के समय और रिफाइंड ईंधन की तत्कालीन कीमतों को किस नजरिए से जोड़ता है।

निष्कर्ष

आम जनता के लिए सीधी और साफ बात यह है कि पेट्रोल-डीजल की कीमत सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कच्चे तेल का कुआं क्या भाव दे रहा है। यह पूरी तरह से ग्लोबल रिफाइंड ईंधन की कीमतों, भारी-भरकम टैक्स, डॉलर-रुपये के खेल और अंततः पंप पर कीमतें स्थिर रखने या बदलने के सरकारी व कॉरपोरेट फैसलों पर निर्भर करता है। जब तक कंपनियां अपना पुराना घाटा पूरा नहीं कर लेतीं, तब तक कच्चे तेल की गिरावट का सीधा फायदा जेब तक पहुंचना मुश्किल दिख रहा है।

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