ईरान का सबसे पक्का दोस्त 'कतर' हुआ बागी; खाड़ी देशों का बदलेगा भूगोल, दुनिया पर मंडराया ऊर्जा संकट का खतरा

होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमले के बाद टूटा सालों पुराना याराना; खाड़ी देशों की एकजुटता से बैकफुट पर आया तेहरान!

08 Jul 2026  |  1185

 

 

दुबई/दोहा:

मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति (Geopolitics) में एक ऐसा ऐतिहासिक यू-टर्न आया है, जिसने पूरी दुनिया के राजनयिकों को चौंका दिया है। होर्मुज स्ट्रेट में मंगलवार को सऊदी अरब और कतर के कमर्शियल जहाजों पर हुए हमलों के बाद कतर ने अपनी पारंपरिक नीति को छोड़ते हुए सीधे तौर पर ईरान को इन हमलों का जिम्मेदार ठहराया है।

अब तक ईरान का सबसे करीबी सहयोगी और संकटमोचक माने जाने वाले कतर का यह आक्रामक रुख मिडिल ईस्ट में नए समीकरणों को जन्म दे रहा है।

कतर का कड़ा रुख: 'ऊर्जा सप्लाई को खतरे में न डाले ईरान'

कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल-अंसारी ने बेहद सख्त लहजे में ईरान से मांग की है कि वह क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डालने वाली सभी गतिविधियां तुरंत बंद करे। उन्होंने कहा:

"ईरान अपने सीमित हितों के लिए दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और खाड़ी देशों के संसाधनों को खतरे में डालना बंद करे।"

ईरान की सफाई: इस अप्रत्याशित आरोप से बौखलाए ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कतर के दावों को खारिज करते हुए इसे 'अच्छे पड़ोसी के रिश्तों के खिलाफ' बताया है।

क्यों ऐतिहासिक है कतर का यह 'यू-टर्न'?

कतर का ईरान के खिलाफ जाना बेहद अप्रत्याशित है, क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते सालों पुराने और बेहद गहरे रहे हैं। इसके पीछे दो मुख्य वजहें थीं:

मुख्य कारणविवरण
गैस भंडार की साझेदारीकतर और ईरान दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार 'साउथ पार्स/नॉर्थ डोम गैस फील्ड' को आपस में साझा करते हैं।
मुश्किल वक्त का सहारासाल 2017 में जब सऊदी अरब और यूएई सहित खाड़ी देशों ने कतर का पूर्ण बहिष्कार किया था, तब ईरान ने ही अपने हवाई और समुद्री रास्ते खोलकर कतर की अर्थव्यवस्था को बचाया था।

 

इन सबके बावजूद, कतर का ईरान पर सीधा हमला करना यह साबित करता है कि दोहा ने अब अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों को पुरानी दोस्ती से ऊपर रख लिया है।

अब मिडिल ईस्ट में क्या बदलेगा? (3 बड़े राजनीतिक बदलाव)

1. सऊदी अरब और कतर आएंगे और करीब

2021 के अल-उला समझौते के बाद कतर और सऊदी के रिश्तों में बर्फ तो पिघली थी, लेकिन भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं हुआ था। अब दोनों देशों के जहाजों पर एक साथ हुए हमले ने इन्हें ईरान के खिलाफ एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिससे क्षेत्र में रक्षा सहयोग बढ़ेगा।

2. GCC (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) की बढ़ेगी एकजुटता

अब तक ईरान को खाड़ी के छह देशों (बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई) के बीच कतर और ओमान के नरम रुख का फायदा मिलता था। लेकिन कतर के पाला बदलने से अब पूरा GCC ग्रुप ईरान के खिलाफ एकजुट हो गया है।

3. ईरान का पूर्ण कूटनीतिक अलगाव

ईरान पहले से ही अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों तथा गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। अब अपने सबसे भरोसेमंद क्षेत्रीय साझेदार कतर को खोने के बाद ईरान मिडिल ईस्ट में पूरी तरह अलग-थलग पड़ सकता है।

दुनिया पर मंडराया ऊर्जा संकट का खतरा

यह केवल मिडिल ईस्ट की राजनीतिक जंग नहीं है, बल्कि ग्लोबल इकॉनमी के लिए भी खतरे की घंटी है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल और कतर की अधिकांश एलएनजी (LNG) इसी होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते निर्यात होती है। यदि यह तनाव एक पूर्ण युद्ध में तब्दील हुआ, तो वैश्विक स्तर पर पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में आग लग सकती है।

अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कतर के इस ऐतिहासिक कदम पर ईरान का अगला पलटवार क्या होता है।

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