नई दिल्ली:
ईरान युद्ध के दौरान जब दुनिया भर में कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई चेन चरमरा गई थी, तब भारत सहित वैश्विक स्तर पर वैकल्पिक ईंधनों, विशेषकर एथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) पर जोर दिया जाने लगा था। भारत में पेट्रोल में 20% एथेनॉल (E20) मिलाने से लेकर 100% एथेनॉल (E100) और फ्लेक्स फ्यूल इंजन तक की बातें होने लगी थीं। ऐसा लग रहा था कि देश में 'एथेनॉल युग' की शुरुआत बेहद तेजी से होगी।
लेकिन हालिया वैश्विक घटनाक्रमों ने इस बहस को एक बिल्कुल नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या भविष्य में एथेनॉल ब्लेंडिंग की प्रासंगिकता वैसी ही बनी रहेगी या यह पूरी बहस ही बेमानी हो जाएगी?
1. कच्चे तेल के बाजार में 'शॉर्टेज' की जगह 'सरप्लस' का खेल
ईरान युद्ध के समय होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया की 20% तेल सप्लाई रुक गई थी और कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली गई थीं। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं:
कीमतों में भारी गिरावट: कच्चे तेल की कीमतें फिर से $70 प्रति बैरल के पास आ गई हैं और इनके और नीचे ($60 की ओर) जाने का अनुमान है।
OPEC+ में दरार और बढ़ती सप्लाई: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के ओपेक+ संगठन से अलग रुख अपनाने, ईरान द्वारा अमेरिकी प्रतिबंध हटवाने की कोशिशों, रूस द्वारा लगातार तेल बेचने और सऊदी अरब द्वारा दिए जा रहे डिस्काउंट के कारण बाजार में तेल की भारी ओवर-सप्लाई (ज्यादा उपलब्धता) हो गई है।
बड़ा आर्थिक गणित: तेल कंपनियों ने जून में करीब ₹71 प्रति लीटर के हिसाब से एथेनॉल खरीदा है। यदि कच्चा तेल $60 प्रति बैरल की तरफ जाता है, तो पेट्रोल की वास्तविक लागत एथेनॉल से भी कम हो जाएगी। ऐसे में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो सकता है, क्योंकि एथेनॉल मिलाए गए ईंधन से गाड़ी का माइलेज भी कम मिलता है।
2. ईरान युद्ध ने वैश्विक स्तर पर बढ़ाई EV की रफ्तार
कच्चे तेल की अनिश्चितता से तंग आकर दुनिया भर के उपभोक्ताओं और सरकारों ने इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) की तरफ रुख करना शुरू कर दिया है।
भारत में उछाल: भारत में जहां लंबे समय से ईवी की हिस्सेदारी कुल बिक्री में केवल 7-8% थी, वहीं ईरान युद्ध के बाद मई और जून के महीनों में यह आंकड़ा 11% के पार निकल गया है।
दिल्ली सरकार का रुख: दिल्ली जैसी राज्य सरकारों ने भविष्य में थ्री-व्हीलर और टू-व्हीलर को पूरी तरह इलेक्ट्रिक करने की नीतियां लागू कर दी हैं।
'पहले कार, फिर सड़क' वाला फॉर्मूला: भारत में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को लेकर अब जनता रुकने को तैयार नहीं है। जैसे 1980 के दशक में मारुति आने के बाद गाड़ियों की बाढ़ आई और सड़कों का विकास अपने आप हुआ, वैसे ही ईवी आने के बाद चार्जिंग स्टेशन खुद-ब-खुद हर जगह स्थापित हो रहे हैं।
वैश्विक परिदृश्य: पड़ोसी देशों में ईवी की 'सुनामी'
भारत के मुकाबले हमारे पड़ोसी देशों और वैश्विक बाजारों में ईवी अपनाने की रफ्तार चौंकाने वाली है:
| देश / क्षेत्र | ईवी हिस्सेदारी (नयी गाड़ियाँ) | मुख्य कारण |
|---|---|---|
| नेपाल | 76% | प्रचुर जलविद्युत क्षमता, पहाड़ी क्षेत्रों में पेट्रोल पहुंचाने की भारी लागत और चीनी ईवी की आसान उपलब्धता। |
| चीन | 55% | मजबूत सरकारी नीतियां और विशाल विनिर्माण क्षमता। |
| पाकिस्तान | तेजी से बढ़ता रुझान | ईंधन की बढ़ती कीमतों से बचने की कोशिश (हालांकि वहां बिजली संकट एक बाधा है)। |
विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस वैश्विक बदलाव के कारण साल 2027 के बाद दुनिया भर में कच्चे तेल की मांग में गिरावट आनी शुरू हो जाएगी।
निष्कर्ष: क्या एथेनॉल की कहानी लंबी नहीं चलेगी?
पब्लिक कोई भी गाड़ी या बाइक 1-2 साल के लिए नहीं, बल्कि 10 से 15 साल के भविष्य को ध्यान में रखकर खरीदती है। ईरान युद्ध ने जिस एथेनॉल की रफ्तार को बढ़ाया था, उसी युद्ध के बाद बदले वैश्विक समीकरण (सस्ता पेट्रोल और तेजी से बढ़ती ईवी की स्वीकार्यता) अब एथेनॉल की उपयोगिता को कम कर रहे हैं।
अगर भविष्य में पेट्रोल ही एथेनॉल से सस्ता हो जाता है, और अधिकांश जनता इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर शिफ्ट हो जाती है, तो तेल कंपनियों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग का झंझट बेमानी हो जाएगा। इसका एकमात्र फायदा सिर्फ विदेशी मुद्रा (डॉलर) बचाना रह जाएगा, लेकिन जब तेल के दाम खुद ही गिर रहे हों और रूस-ईरान जैसे देशों से 'रुपये' में ट्रेड का विकल्प मौजूद हो, तो वह दलील भी उतनी मजबूत नहीं रह जाती। सौ बात की एक बात— जिस युद्ध ने एथेनॉल को चर्चा में लाया, वही इसके थामने की वजह बनता दिख रहा है।