इतिहास के जख्मों पर छिड़का नमक, जमैका ने मांगा दास प्रथा का हर्जाना, तो ब्रिटिश नेता ने गिनाई रेलवे और लोकतंत्र की दुहाई; भारत से $45 ट्रिलियन की लूट का सच आया सामने"

औपनिवेशिक लूट पर सुएला ब्रेवरमैन के बयान से छिड़ी रार: कहा—"हर्जाना मांगने के बजाय पूर्व उपनिवेश चुकाएं विकास की कीमत"

08 Jul 2026  |  1146

 

 

लंदन/नई दिल्ली।

ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत सहित दुनिया के 50 से अधिक देशों पर सदियों तक राज किया, उनके संसाधनों का दोहन किया और लाखों लोगों को दासता की बेड़ियों में जकड़ा। अब जब इतिहास के उस दमनकारी दौर और अन्याय के खिलाफ पूर्व उपनिवेशों ने एकजुट होकर हर्जाने  की मांग तेज कर दी है, तब ब्रिटेन की पूर्व गृह मंत्री और भारतीय मूल की रूढ़िवादी नेता सुएला ब्रेवरमैन के एक विवादित बयान ने वैश्विक स्तर पर नई बहस छेड़ दी है।

भारतीय मूल की ब्रेवरमैन ने तर्क दिया है कि पूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों को गुलामी और शोषण का हर्जाना मांगने के बजाय, ब्रिटेन द्वारा उनके देशों में किए गए विकास (जैसे रेलवे, कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाएं) की कीमत चुकानी चाहिए।

जमैका की मांग: दासों को कोड़े, तो मालिकों को मिला था 'हर्जाना'

यह पूरा विवाद तब भड़का जब कैरेबियाई देश जमैका ने ब्रिटिश शासन के दौरान हुए अमानवीय दास व्यापार (Slave Trade) के लिए ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स III से औपचारिक रूप से हर्जाना मांगने की तैयारी पूरी कर ली। जमैका और कैरेबियन देशों (CARICOM) का तर्क बेहद ठोस है:

मालिकों की भरपाई, पीड़ितों को कुछ नहीं: जब ब्रिटेन ने 1833 में दास प्रथा खत्म की, तो संसद से कानून पास कर 2 करोड़ पाउंड (तत्कालीन ब्रिटिश बजट का 40%) का कर्ज लिया। यह पैसा प्रताड़ित गुलामों को नहीं, बल्कि उन 46,000 ब्रिटिश मालिकों को 'नुकसान की भरपाई' के रूप में दिया गया जिनके गुलाम आजाद हुए थे।

2015 तक चुकाया गया कर्ज: ब्रिटिश वित्त मंत्रालय (Treasury) ने खुद माना कि इस कर्ज की आखिरी किश्त साल 2015 में चुकता हुई। यानी कैरेबियाई मूल के जो अश्वेत नागरिक ब्रिटेन में रह रहे थे, वे भी अपने टैक्स से 2015 तक उन्हीं परिवारों की तिजोरियां भर रहे थे जिन्होंने कभी उनके पूर्वजों को गुलाम बनाया था।

$45 ट्रिलियन की खुली लूट: भारत से विकास नहीं, 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' हुआ

सुएला ब्रेवरमैन के 'विकास' वाले दावों की धज्जियां उड़ाते हुए भारत के इतिहास और प्रख्यात अर्थशास्त्रियों की रिसर्च कुछ और ही हकीकत बयां करती हैं:

11 गुना बड़ी लूट: जेएनयू की प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. उत्सा पटनायक की कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक, अंग्रेजों ने 1765 से 1938 के बीच भारत से करीब 45 लाख करोड़ डॉलर ($45 Trilion) की संपत्ति लूटी। यह रकम ब्रिटेन की आज की कुल जीडीपी से भी लगभग 11 गुना ज्यादा है।

लूट का नायाब तरीका: अंग्रेज भारतीयों से ही भारी टैक्स वसूलते थे, और उसी टैक्स के पैसे से भारतीयों का ही सामान (सूती कपड़ा, मसाले) खरीदकर उसे यूरोप में महंगे दामों पर बेचते थे। मुनाफा सीधे लंदन जाता था।

क्या भारत के लिए बनी थी रेलवे और आधुनिक व्यवस्था?

इतिहासकारों के अनुसार, सुएला ब्रेवरमैन का रेलवे को 'ब्रिटेन का तोहफा' बताना पूरी तरह भ्रामक है:

कच्चे माल की ढुलाई: रेलवे का मुख्य उद्देश्य भारत का विकास नहीं, बल्कि गांवों और खदानों से कच्चा माल बंदरगाहों तक पहुंचाना और वहां से उसे ब्रिटेन भेजना था।

वि-औद्योगीकरण (De-industrialization): इसी कालखंड में भारत के समृद्ध स्थानीय कपड़ा उद्योग को सोची-समझी रणनीति के तहत नष्ट कर दिया गया।

लोकतंत्र का दावा बनाम जलियांवाला बाग और बंगाल अकाल

ब्रेवरमैन का दावा है कि ब्रिटेन ने दुनिया को लोकतंत्र दिया, लेकिन भारत ने लोकतंत्र अंग्रेजों से खैरात में नहीं पाया, बल्कि एक लंबी और रक्तरंजित आजादी की लड़ाई के बाद हासिल किया। ब्रिटिश शासन का असली चेहरा 1919 का जलियांवाला बाग नरसंहार था और 1943 का बंगाल अकाल था, जहां चर्चिल सरकार की क्रूर नीतियों के कारण 30 लाख से ज्यादा बेगुनाह भारतीय भूख से तड़पकर मर गए थे।

औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है यह बयान

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुएला ब्रेवरमैन का यह बयान उस औपनिवेशिक मानसिकता का जीता-जागता सुबूत है जो आज भी ब्रिटेन के एक बड़े राजनीतिक संभ्रांत वर्ग के भीतर गहराई तक पैठी है। यह वर्ग इस सच को स्वीकार करने से भागता है कि आज ब्रिटेन की जो चमचमाती इमारतें, आधुनिक संस्थाएं और मजबूत अर्थव्यवस्था खड़ी है, उसकी नींव जमैका के दासों के खून-पसीने और भारत जैसे सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देशों की खुली लूट पर रखी गई है।

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