महाराष्ट्र में महा-उलटफेर की सुगबुगाहट: क्या फिर एक होंगे NCP के दोनों गुट? बैठकों का दौर तेज

परिसीमन का डर या अपनों से ही नाराजगी? सुनेत्रा और पार्थ पवार को साइडलाइन कर शरद-अजित के दोबारा साथ आने की अटकलें तेज!

09 Jul 2026  |  892

 

 

मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। शिवसेना के बाद अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों धड़ों—शरद पवार और अजित पवार गुट—के बीच संभावित विलय की चर्चाओं ने अचानक जोर पकड़ लिया है। राजनीतिक सूत्रों की मानें तो आगामी परिसीमन (डिलिमिटेशन) और भविष्य के चुनावी समीकरणों को देखते हुए दोनों गुटों को फिर से एक मंच पर लाने की कोशिशें पर्दे के पीछे काफी तेज हो चुकी हैं।

वरिष्ठ नेताओं की गुप्त बैठकों से बढ़ी हलचल

पार्टी सूत्रों का दावा है कि पिछले कुछ महीनों में दोनों गुटों के बीच संवाद का स्तर काफी बढ़ा है। खबर है कि अजित पवार गुट के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद सुनील तटकरे ने इस सिलसिले में खुद शरद पवार से मुलाकात की थी। इसके ठीक बाद, वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल के मुंबई स्थित आवास पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें शरद पवार गुट की सुप्रिया सुले और जयंत पाटील भी मौजूद थे। राजनीतिक विश्लेषक इन बैठकों को दोनों गुटों के बीच जमी बर्फ पिघलने और 'घर वापसी' की दिशा में एक बड़ा कदम मान रहे हैं।

सुनेत्रा और पार्थ पवार की भूमिका पर 'कैंची' चलने की तैयारी!

इस संभावित विलय की चर्चाओं के बीच जो सबसे बड़ी बात छनकर सामने आ रही है, वह है पवार परिवार के दो सदस्यों की भूमिका। सूत्रों के अनुसार, अजित पवार गुट के कई वरिष्ठ मंत्रियों, विधायकों और नेताओं में सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार की कार्यशैली को लेकर गहरा असंतोष है।

पार्टी के भीतर नाराजगी की वजह: नेताओं का मानना है कि संगठन और राजनीतिक फैसलों में परिवार के इन सदस्यों के बढ़ते हस्तक्षेप से जमीनी कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों में असहजता है। यही वजह है कि यदि दोनों गुटों का विलय होता है, तो सुनेत्रा और पार्थ पवार को सक्रिय राजनीतिक भूमिकाओं से दूर या सीमित रखा जा सकता है।

विलय की ओर क्यों बढ़ रहे हैं कदम?

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इस संभावित एकजुटता के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

परिसीमन का खतरा: डिलिमिटेशन के बाद महाराष्ट्र की कई लोकसभा और विधानसभा सीटों का भूगोल और गणित बदल जाएगा। ऐसे में अलग-अलग लड़कर नुकसान उठाने से बेहतर एकजुट होना माना जा रहा है।

वोटरों का भ्रम दूर करना: राकांपा में हुए विभाजन के बाद से मतदाताओं के बीच जो असमंजस की स्थिति बनी है, नेता उसे खत्म करना चाहते हैं।

आगामी चुनाव: स्थानीय निकाय और आगामी चुनावों में अपनी ताकत को बनाए रखने के लिए दोनों गुटों के भीतर संगठनात्मक एकता की मांग उठ रही है।

फिलहाल आधिकारिक मुहर का इंतजार

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अभी तक शरद पवार या अजित पवार गुट की ओर से कोई भी आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। पूरी चर्चा अभी सूत्रों और कयासों पर टिकी हुई है। लेकिन महाराष्ट्र की पल-पल बदलती राजनीति को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले दिन राज्य की सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए बेहद निर्णायक होने वाले हैं।

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