बांग्लादेश में बड़ा राजनीतिक भूचाल: जमात और आवामी लीग को एक साथ बैन करने की तैयारी, खुलेंगी 1971 की फाइलें

तारिक रहमान सरकार का मास्टरस्ट्रोक या विपक्ष को खत्म करने की पुरानी रवायत? जानिए क्यों शेख हसीना की पार्टी के साथ कट्टरपंथी जमात भी आई निशाने पर।

10 Jul 2026  |  1242

 

 

ढाका।

बांग्लादेश की सियासत में एक बार फिर बड़ा भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। देश की मौजूदा तारिक रहमान सरकार ने दो सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों— शेख हसीना की 'आवामी लीग' और कट्टरपंथी 'जमात-ए-इस्लामी' पर एक साथ प्रतिबंध लगाने का कानूनी रास्ता खोज लिया है। सरकार ने इसके लिए सन 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के समय के पुराने मुकदमों और फाइलों को नए सिरे से खोलने का ऐतिहासिक फैसला किया है।

इस बात की आधिकारिक पुष्टि करते हुए बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन चौधरी ने कहा, "हम 1971 की फाइलों को फिर से खोलेंगे और इतिहास में जितने भी बड़े कांड हुए हैं, उन सभी की गहन जांच कराई जाएगी।" सरकार के इस कदम को आवामी लीग और जमात-ए-इस्लामी दोनों को राजनीतिक पटल से पूरी तरह बेदखल करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

इतिहास के पन्नों से तय होगा आवामी लीग का भविष्य

साल 2008 से 2024 तक बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज रही शेख हसीना की पार्टी 'आवामी लीग' इस समय सरकार के मुख्य रडार पर है। अपने शासनकाल के दौरान आवामी लीग ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया था। अब सत्ता परिवर्तन के बाद तारिक रहमान की सरकार भी उसी फॉर्मूले को दोहराकर लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की फिराक में है।

हाल ही में शेख हसीना द्वारा बांग्लादेश लौटने के ऐलान ने भी सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। एक हालिया सर्वे के मुताबिक, बांग्लादेश में आज भी 24 प्रतिशत लोग शेख हसीना में दिलचस्पी रखते हैं। ऐसे में सरकार उन्हें राजनीतिक रूप से रोकने के लिए 1971 के मामलों का सहारा ले रही है।

निशाने पर 'जमात-ए-इस्लामी' भी, जानिए 3 मुख्य कारण

भले ही सरकार का यह फैसला ऊपरी तौर पर आवामी लीग को लक्षित करता दिख रहा हो, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसका असली निशाना जमात-ए-इस्लामी है। इसके पीछे निम्नलिखित राजनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं:

पाकिस्तान परस्त छवि: जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश में हमेशा से पाकिस्तान समर्थक माना जाता रहा है, क्योंकि 1971 में इसके नेताओं ने बांग्लादेश की आजादी का खुलकर विरोध किया था।

BNP के लिए बढ़ता खतरा: बांग्लादेश की राजनीति में इस समय जमात का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। जमात के नेता खुद को 'राष्ट्रवादी' बताकर सक्रिय हैं, जिससे तारिक रहमान की पार्टी (BNP) के मुख्य वोट बैंक में सेंध लगने का खतरा पैदा हो गया है।

विपक्ष को खत्म करने की परंपरा: बांग्लादेश के सियासी इतिहास में सत्ताधारी दल द्वारा मुख्य विपक्षी दल को कमजोर करने या खत्म करने की परंपरा रही है। शेख हसीना की गैर-मौजूदगी में फिलहाल जमात ही देश की मुख्य विपक्षी ताकत बनकर उभर रही है।

सरकार पर लगातार हमलावर हैं जमात प्रमुख

इस संभावित प्रतिबंध और सियासी उठापटक के बीच जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए आरोप लगाया, "हमारी पार्टी को एक सोची-समझी साजिश के तहत चुनाव हरवाया गया, जिसमें यूनुस सरकार भी शामिल थी। जनता के समर्थन के हिसाब से हमें सरकार में होना चाहिए था, लेकिन साजिश रचकर हमें विपक्ष में बैठा दिया गया।"

शफीकुर रहमान अक्सर अपने भाषणों में प्रधानमंत्री की राजनीतिक विरासत संभाल रहे तारिक रहमान को 'शहजादा' कहकर तंज कसते हैं। गौरतलब है कि तारिक रहमान की मां खालिदा जिया बांग्लादेश की प्रधानमंत्री और पिता जियाउर रहमान देश के राष्ट्रपति रह चुके हैं।

निष्कर्ष: बांग्लादेश सरकार के इस कदम से साफ है कि आने वाले दिनों में ढाका की राजनीति में टकराव और बढ़ने वाला है। यदि 1971 के मामलों के आधार पर इन दोनों बड़ी पार्टियों पर प्रतिबंध लगता है, तो बांग्लादेश का सियासी नक्शा पूरी तरह बदल जाएगा।

अन्य खबरें