कोलंबो।
श्रीलंका में विकास और निवेश के नाम पर चीनी कंपनियों द्वारा की जा रही 'खुली लूट' का एक और बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कर्ज के जाल में फंसाकर श्रीलंका से 99 साल की लीज पर लिए गए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हंबनटोटा पोर्ट (Hambantota Port) का संचालन करने वाली चीनी कंपनी पर अब भारी टैक्स चोरी का आरोप लगा है।
एक आरटीआई (RTI) के जरिए सामने आए आधिकारिक दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि पोर्ट का संचालन करने वाली चीनी कंपनी ने स्थानीय नगर निगम को करोड़ों रुपये का असेसमेंट टैक्स (मूल्यांकन कर) नहीं चुकाया है। इस खुलासे के बाद श्रीलंका में चीनी निवेश और उसकी नीयत को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है।
क्या है चीनी कंपनी का पूरा 'खेल'?
हंबनटोटा पोर्ट का संचालन 'हंबनटोटा इंटरनेशनल पोर्ट ग्रुप' नाम की एक चीनी कंपनी करती है। 'टाइम्स एशियन' की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि 31 दिसंबर 2025 तक इस पोर्ट की प्रॉपर्टी पर कुल बकाया टैक्स की रकम 12.59 करोड़ श्रीलंकाई रुपये (125 मिलियन) से अधिक हो चुकी है। इस भारी-भरकम राशि में टैक्स के साथ-साथ वारंट चार्ज और जुर्माने का ब्याज भी शामिल है।
इससे पहले, जब यह बकाया राशि लगभग 8.52 करोड़ श्रीलंकाई रुपये थी और दो तिमाहियों से इसका भुगतान नहीं किया गया था, तब हंबनटोटा म्युनिसिपल काउंसिल (नगर निगम) ने कड़ा रुख अपनाया था।
नगर निगम का 'रेड नोटिस'
नगर निगम ने चीनी पोर्ट मैनेजमेंट को एक 'रेड नोटिस' जारी कर साफ चेतावनी दी थी कि यदि तुरंत टैक्स का भुगतान नहीं किया गया, तो श्रीलंकाई म्युनिसिपल कानून के तहत पोर्ट की प्रॉपर्टी को जब्त कर लिया जाएगा।
कार्रवाई से बचने के लिए कोर्ट पहुंची चीनी कंपनी
टैक्स चुकाने के बजाय चीनी कंपनी ने नगर निगम के इस रेड नोटिस को अदालत में चुनौती दे दी। कंपनी कानूनी दांव-पेंच का सहारा लेकर कोर्ट से एक अंतरिम आदेश (Stay Order) हासिल करने में सफल रही। इस आदेश ने नगर पालिका को उस जगह को कमर्शियल कोर्ट के तौर पर वर्गीकृत करने और संपत्ति जब्त करने की दंडात्मक कार्रवाई करने से फिलहाल रोक दिया है।
इस कानूनी लड़ाई को मजबूती से लड़ने के लिए हंबनटोटा नगर पालिका ने अब एक प्राइवेट लॉ फर्म को हायर किया है, जिसे म्युनिसिपल फंड से 10 लाख श्रीलंकाई रुपये की फीस का भुगतान भी किया जा चुका है।
निवेश के नाम पर 'लूट' का वैश्विक उदाहरण
हंबनटोटा पोर्ट का यह नया विवाद चीन की 'डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी' (कर्ज जाल कूटनीति) का जीता-जागता सबूत माना जा रहा है।
कैसे हुआ कब्जा: इस बंदरगाह का निर्माण चीनी कर्ज से हुआ था, लेकिन जब श्रीलंका इस भारी कर्ज की किस्तें चुकाने में पूरी तरह असमर्थ हो गया, तो चीन ने चालाकी से इस पोर्ट का संचालन और नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया।
संकट में छोड़ा साथ: अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि चीन छोटे देशों को पहले भारी कर्ज देता है और फिर उनकी रणनीतिक संपत्तियों पर कब्जा कर लेता है। श्रीलंका के हालिया गंभीर आर्थिक संकट के दौरान भी चीन ने मदद करने के बजाय पूरी तरह दूरी बना ली थी, जिससे श्रीलंकाई जनता में चीन के प्रति भारी आक्रोश है।
निष्कर्ष: स्थानीय स्तर पर टैक्स चोरी का यह मामला दर्शाता है कि चीनी कंपनियां न केवल श्रीलंका की संप्रभुता और संपत्तियों पर एकाधिकार जमा रही हैं, बल्कि वहां के स्थानीय नियमों और टैक्स व्यवस्था को भी ठेंगा दिखा रही हैं। कोर्ट में चल रहा यह मामला अब श्रीलंका और चीन के बीच एक नया राजनयिक तनाव बन सकता है।