सूखे मॉनसून की मार: भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मंडराया संकट, S&P ने दी महंगाई और सुस्ती की चेतावनी

कम बारिश और बढ़ती लागत से दोहरी मार झेल रहे किसान; ट्रैक्टर से लेकर टू-व्हीलर बाजार तक सुस्ती के आसार, जून में करीब 40% कम बरसे बदरा।

10 Jul 2026  |  649

 

 

नई दिल्ली: इस साल कमजोर मॉनसून की बेरुखी भारत के ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था (रूरल इकोनॉमी) के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है। दिग्गज रेटिंग एजेंसी S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी जारी की है कि कम बारिश की वजह से आने वाले महीनों में किसानों की कमाई घट सकती है, खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं और ग्रामीण बाजारों में सामानों की मांग सुस्त पड़ सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इस सीजन में बारिश सामान्य से कम रहती है, तो खेती-किसानी के साथ-साथ खाद-कीटनाशक, ट्रैक्टर, टू-व्हीलर और छोटे कर्ज (माइक्रोफाइनेंस) देने वाली कंपनियों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ेगा। गौरतलब है कि भारत में आज भी लगभग आधी कृषि भूमि सिंचाई के लिए पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है और देश की कुल सालाना बारिश का 70% हिस्सा इसी दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून से आता है।

दोहरी मार झेल रहा है ग्रामीण भारत

S&P की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था इस समय चौतरफा संकट से घिरी है:

सूखा मॉनसून: पर्याप्त बारिश न होने से फसलों की पैदावार घटने की आशंका है, जिससे सीधे तौर पर किसानों की जेब पर असर पड़ेगा।

लागत में भारी उछाल: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के कारण खेती में इस्तेमाल होने वाली जरूरी चीजों— जैसे खाद, बीज और कीटनाशकों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं।

बाजार पर असर: किसानों की कमाई कम होने का सीधा असर ऑटोमोबाइल और एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर पर दिखेगा। गांवों में ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल और रोजमर्रा के सामानों की बिक्री में बड़ी गिरावट आ सकती है।

अनाज-सब्जियां होंगी महंगी, सरकारी खजाने पर बढ़ेगा बोझ

कम पैदावार का सीधा असर आम आदमी की रसोई पर पड़ेगा। अनाज, दलहन और सब्जियों के दाम बढ़ने से देश में खुदरा महंगाई का दबाव फिर से बढ़ सकता है।

एजेंसी ने यह भी आगाह किया कि अगर सूखा लंबा खिंचा, तो सरकार को ग्रामीण राहत योजनाओं (जैसे मनरेगा और किसान राहत पैकेज) पर ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। इससे राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के सरकार के प्रयासों को झटका लग सकता है और सरकारी खजाने पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा।

बारिश के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता, पैदा हुआ बिजली संकट

देश के कई हिस्सों में मॉनसून की देरी से एंट्री के कारण फसलों की बुआई बुरी तरह प्रभावित हुई है।

जून का सूखा: आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जून के महीने में औसत से 39.8% कम बारिश दर्ज की गई थी।

जुलाई में आंशिक सुधार: जुलाई की शुरुआत में पश्चिमी तट पर हुई भारी बारिश से कुल कमी सुधरकर 15.2% पर आ गई है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर आने वाले दिनों में सूखा जारी रहा तो यह अंतर फिर बढ़ जाएगा।

हाइड्रोपावर को झटका: कम बारिश के कारण जलाशयों में पानी कम होने से देश में जलविद्युत (हाइड्रोपावर) से बनने वाली बिजली में 10 से 15% की गिरावट आ सकती है, जिससे बिजली संकट गहरा सकता है।

कृषि मंत्रालय अलर्ट: सरकार ने जारी की 'प्लान-बी' एडवाइजरी

इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने कमर कस ली है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कम बारिश वाले प्रभावित क्षेत्रों के किसानों को विशेष सलाह दी है:

किसान पारंपरिक फसलों के बजाय कम समय में तैयार होने वाली फसलों को प्राथमिकता दें।

ऐसी फसलें चुनें जिनमें पानी की बेहद कम जरूरत हो, जैसे— मक्का, बाजरा और मूंग

संकट वाले जिलों में सिंचाई के वैकल्पिक संसाधनों को दुरुस्त रखने के निर्देश दिए गए हैं।

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