ढाका। पड़ोसी देश बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भी राजनीतिक अस्थिरता और लोकतंत्र पर संकट के बादल गहराते जा रहे हैं। मोहम्मद यूनुस के बाद अब देश की कमान संभाल रहे तारिक रहमान पर भी आजाद आवाज को कुचलने और तानाशाही रवैया अपनाने के आरोप लगने लगे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा समाचार एजेंसी 'रॉयटर्स' को दिए इंटरव्यू में बांग्लादेश वापस लौटने की हुंकार क्या भरी, ढाका से लेकर लंदन तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। येन-केन-प्रकारेण सत्ता में आए प्रधानमंत्री तारिक रहमान की कुर्सी डगमगाने लगी है और इसी बौखलाहट में सरकार ने मीडिया का मुंह बंद करने के लिए एक सख्त सेंसरशिप आदेश जारी कर दिया है।
शेख हसीना के बयानों पर पूरी तरह रोक
बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार ने देश के सभी मीडिया संस्थानों को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का कोई भी बयान, भाषण या इंटरव्यू छापने और प्रसारित करने से पूरी तरह रोक दिया है। शुक्रवार देर रात जारी एक आधिकारिक बयान में सरकार ने सभी प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, ऑनलाइन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को चेतावनी दी है कि वे अदालत के पुराने आदेशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें।
정부 (सरकार) का तर्क है कि वर्ष 2024 में 'इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल' (ICT) ने शेख हसीना के बयानों के प्रसारण पर रोक लगाई थी। इसके अलावा बांग्लादेशी कानून के तहत किसी भी ऐसे व्यक्ति के इंटरव्यू या ऑडियो-वीडियो संदेश पर प्रतिबंध है, जिसे अदालत ने दोषी ठहराया हो और जो फरार घोषित हो।
रॉयटर्स के इंटरव्यू से बढ़ी सरकार की धड़कनें
यह पूरा विवाद तब भड़का जब रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में शेख हसीना ने निर्वासित जीवन छोड़कर स्वदेश वापसी का खुला ऐलान किया। इस इंटरव्यू को बांग्लादेश के कई प्रमुख अखबारों और चैनलों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। हसीना के इस कदम ने तारिक रहमान सरकार की धड़कनें बढ़ा दी हैं, जिसके तुरंत बाद सरकार को मीडिया के लिए यह नई गाइडलाइन जारी करनी पड़ी।
"हसीना अब भी बांग्लादेश की सबसे प्रभावशाली नेता"
लंदन में रहने वाले वरिष्ठ बांग्लादेशी पत्रकार सैयद बदरुल अहसान ने शेख हसीना के हालिया बयान पर बड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश लौटने का संकल्प दिखाता है कि हसीना आज भी देश की सबसे ताकतवर और प्रभावशाली राजनीतिक शख्सियत हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि शेख हसीना स्वदेश लौटती हैं, तो उनकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी वर्तमान सरकार और देश की होनी चाहिए।
लगातार मंडराता रहा है जान का खतरा
वरिष्ठ विश्लेषकों ने याद दिलाया कि शेख हसीना का राजनीतिक जीवन हमेशा कांटों भरा रहा है और वे कई बार जानलेवा हमलों का सामना कर चुकी हैं।
वर्ष 1988: चटगांव में उन पर बेहद घातक हमला हुआ था।
वर्ष 2004: ढाका में एक राजनीतिक रैली के दौरान उन पर भीषण ग्रेनेड हमला किया गया था, जिसमें वे बाल-बाल बची थीं।
हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद सत्ता से बेदखल हुईं शेख हसीना की संभावित वापसी को लेकर बांग्लादेश में कानूनी और राजनीतिक घमासान चरम पर पहुंच गया है। सरकार जहां इसे अदालती आदेशों का अनुपालन बता रही है, वहीं आलोचक इसे लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटने की कोशिश करार दे रहे हैं।