यूपी चुनाव में बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक: 2027 नहीं, 2050 तक की सत्ता का ब्लूप्रिंट तैयार; 'जातिवाद' की काट के लिए युवाओं में भरा जाएगा 'राष्ट्रवाद'

मंडल बनाम कमंडल के दौर से आगे निकली राजनीति; विपक्षी खेमे के 'PDA' को बेअसर करने के लिए भाजयुमो को कमान, 'लॉयल वोटर' बनाने का दीर्घकालिक विजन।

13 Jul 2026  |  1184

 

 

लखनऊ

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तारीखें भले ही अभी दूर हों, लेकिन सियासी दलों की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। जहाँ एक तरफ समाजवादी पार्टी अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और राम मंदिर चंदा चोरी जैसे मुद्दों के सहारे मैदान में है, वहीं कांग्रेस पेपर लीक और बसपा दलित-ब्राह्मण गठजोड़ को हवा दे रही है। लेकिन इन सबके बीच, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की चुनावी तैयारी विपक्ष के होश उड़ाने वाली है। बीजेपी केवल 2027 का चुनाव जीतने के लिए रणनीति नहीं बना रही, बल्कि अगले 20-25 सालों तक सत्ता पर अखंड पकड़ बनाए रखने का चक्रव्यूह रच रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले की प्राचीर से तय किए गए 'विकसित भारत 2047' के विजन को ध्यान में रखते हुए, बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में एक बेहद अचूक हथियार को धार देना शुरू कर दिया है, और वह है— 'घोर राष्ट्रवाद'

भाजयुमो को बड़ी जिम्मेदारी: युवाओं के खून में दौड़ेगा राष्ट्रवाद

इस दीर्घकालिक मिशन को जमीन पर उतारने का जिम्मा भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) को सौंपा गया है। भाजयुमो के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष प्रांशु दत्त द्विवेदी ने पद संभालते ही पार्टी के इरादे साफ कर दिए हैं। उन्होंने घोषणा की है कि उनकी मुख्य लड़ाई समाज को बांटने वाले 'जातिवाद' के खिलाफ है।

रणनीति का सार: बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व भली-भांति समझता है कि यदि किसी युवा वोटर को जाति और धर्म के संकीर्ण दायरे से ऊपर उठाकर 'राष्ट्रवाद' के विचार से जोड़ दिया जाए, तो वह जीवनभर के लिए पार्टी का एक निष्ठावान (लॉयल) वोटर बन जाता है। ठीक वैसा ही, जैसा 2010 के दशक तक कांग्रेस के साथ देखा गया था, जहाँ नेहरू-इंदिरा के दौर को देखने वाली पीढ़ी आजीवन कांग्रेस से जुड़ी रही। अब बीजेपी प्रांशु दत्त द्विवेदी जैसे युवा चेहरों के जरिए इसी निरंतरता को नई जनरेशन में स्थापित करना चाहती है।

क्यों जरूरी हुआ राष्ट्रवाद? 'मंडल' और '2024 के नतीजों' का सबक

भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में धर्म (कमंडल) की राजनीति उफान पर होती है, तब-तब विपक्ष उसे काटने के लिए जाति (मंडल) का कार्ड खेलता है।

इतिहास: 1990 के दशक में राम मंदिर रथ यात्रा के जवाब में समाजवादी नेताओं ने मंडल आयोग की राजनीति से धर्म के रथ को रोका था।

ताजा उदाहरण (2024 लोकसभा): भव्य राम मंदिर निर्माण के बावजूद, अखिलेश यादव के 'PDA' (जाति आधारित विभाजन) ने बीजेपी के '400 पार' के नारे को उत्तर प्रदेश में 33 सीटों पर समेट दिया।

इस नतीजों से सबक लेते हुए बीजेपी अब समझ चुकी है कि 'जातिवाद' की सबसे अचूक काट केवल 'राष्ट्रवाद' है, जिसके सामने सारे सामाजिक समीकरण ढह जाते हैं। (जैसा कि 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद देखा गया था, जब बीजेपी ने अकेले दम पर 303 सीटें जीती थीं)।

सवालों को 'देश की बदनामी' से जोड़ने का नया नैरेटिव

राष्ट्रवाद को चुनावी विमर्श के केंद्र में रखने के लिए बीजेपी ने एक नया और आक्रामक नैरेटिव (कथानक) सेट किया है। अब सरकार या उसकी नीतियों पर उठने वाले हर सवाल को सीधे राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है:

नीतियों पर सवाल: यदि कोई सरकार की आर्थिक या सामाजिक नीतियों पर सवाल उठाता है, तो उसे 'देश को बदनाम करने वाला' करार दे दिया जाता है।

घोटाले और बुनियादी ढांचे पर विपक्ष का घेराव: चाहे अयोध्या में चंदा चोरी का आरोप हो या महाराष्ट्र में नए पुल के गिरने की घटना, बीजेपी के नेता इसे 'वैश्विक मंच पर भारत की छवि खराब करने की विपक्षी साजिश' के रूप में पेश करते हैं।

वैश्विक डंका: रैलियों में पीएम मोदी के विदेशी दौरों और वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते प्रभाव को सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर भुनाया जाता है।

निष्कर्ष: जहाँ एक ओर अखिलेश यादव (PDA), तेजस्वी यादव (MY) और राहुल गांधी (ओबीसी व दलित विमर्श) जैसे विपक्षी नेता तात्कालिक लाभ वाले जातिगत मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं, वहीं बीजेपी 'राष्ट्रवाद' के जरिए भविष्य की ऐसी पीढ़ी तैयार कर रही है जो हर चुनावी हार-जीत से परे, स्थायी रूप से भगवा खेमे के साथ खड़ी रहे।

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