ट्रंप के 'टैरिफ हंटर' के आगे नहीं झुका भारत: अमेरिका के साथ ट्रेड डील में देरी की बड़ी वजह आई सामने, अपनी शर्तों पर अड़ा नई दिल्ली

अमेरिका का दबाव भारत पर पूरी तरह फेल; मजबूत इकॉनमी और बढ़ते निर्यात के दम पर भारत ने अमेरिका से मांगी नो-टैरिफ गारंटी, जल्दबाजी में समझौते से दो टूक इनकार!

13 Jul 2026  |  826

 

 

नई दिल्ली

दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं— भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से प्रस्तावित महत्वाकांक्षी ट्रेड डील (व्यापार समझौते) में हो रही देरी की असली और सबसे बड़ी वजह अब आधिकारिक तौर पर सामने आ गई है। वैश्विक मंच पर भारत ने महाशक्ति अमेरिका को दो टूक संदेश दे दिया है कि व्यापार समझौता तभी होगा जब वह पूरी तरह भारत की शर्तों के अनुरूप होगा। नई दिल्ली किसी भी दबाव में आकर या जल्दबाजी में कोई ऐसा समझौता नहीं करना चाहता जिससे देश के हितों को नुकसान पहुंचे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 'टैरिफ नीति' वाले आक्रामक रुख और दबाव बनाने की रणनीति का भारत पर कोई असर होता नहीं दिख रहा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पहले ही साफ कर चुके हैं कि भारत सिर्फ वही डील साइन करेगा, जिसमें देश और देश के निर्यातकों का सीधा फायदा हो।

क्यों फंसा है पेंच? भारत की अमेरिका के सामने 4 सख्त शर्तें

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले महीने अमेरिकी प्रतिनिधियों का एक उच्च स्तरीय मंडल जैनीसन ग्रीन के नेतृत्व में भारत आया था। इस बैठक में अंतरिम समझौते (Interim Agreement) में फंसे विवादित मुद्दों पर गहन चर्चा हुई, जहाँ भारत ने अपनी चिंताओं को प्रमुखता से रखा। भारत की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

टैरिफ में विशेष रियायत: भारत चाहता है कि अमेरिका की ओर से भारतीय निर्यातकों को चीन और अन्य प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर टैरिफ का लाभ मिले।

एकतरफा फैसलों का विरोध (नो-टैरिफ गारंटी): अमेरिकी प्रशासन के अप्रत्याशित फैसलों और पलटने वाले रवैये को देखते हुए भारत एक लिखित गारंटी चाहता है कि भविष्य में अमेरिका भारत पर कोई अतिरिक्त एकतरफा टैरिफ या मनमाना शुल्क नहीं थोपेगा।

घरेलू हितों की रक्षा: कृषि और भारतीय किसानों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर भारत किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं है।

सेंसिटिव सेक्टर्स का संरक्षण: डेयरी उत्पादों और घरेलू विनिर्माण (Manufacturing) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए भारत अपने पक्ष में सुरक्षा कवच चाहता है।

अमेरिका का 'टैरिफ हंटर' भारत पर क्यों हुआ फेल?

गौरतलब है कि दोनों देशों के बीच 13 फरवरी 2025 से लगातार बैठकों का दौर जारी है। इस दौरान अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने के लिए एक समय 50 फीसदी तक का भारी टैरिफ लगा दिया था, जिसे बाद में भारत की दृढ़ता के आगे झुकते हुए घटाकर 18 फीसदी करना पड़ा। अब अमेरिका अगले महीने फिर से नया टैरिफ लगाने की धमकियां दे रहा है, लेकिन भारत पर यह रणनीति बेअसर है। भारत की इस मजबूती के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

ताबड़तोड़ व्यापार समझौते: पिछले 6 सालों में भारत ने 9 देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) किया है और अब कुल 38 देशों तक भारत के द्विपक्षीय व्यापार समझौतों की पहुंच है, जिनमें ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और यूरोपीय यूनियन (EU) जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

रिकॉर्ड तोड़ निर्यात: चालू वित्त वर्ष (2026) की अप्रैल-जून तिमाही में भारत का माल निर्यात (Goods Export) करीब 15% बढ़ा है।

विकल्पों की मौजूदगी: खाड़ी देशों के साथ भारत का व्यापार पूरी तरह सामान्य और मजबूत है, जिससे भारत की वैश्विक सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) बढ़ गई है।

व्यापार के आंकड़े: भारत का पलड़ा भारी

अमेरिका के दबाव के आगे झुकने की बजाय भारत का अपनी शर्तों पर अड़ना स्वाभाविक है, क्योंकि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार में भारत मुनाफे की स्थिति में है।

व्यापारिक संकेतक (वित्त वर्ष 2025-26)मूल्य (अरब डॉलर में)
अमेरिका को भारत का कुल निर्यात87.3 अरब डॉलर
अमेरिका से भारत का कुल आयात52.9 अरब डॉलर
व्यापार संतुलन (Trade Surplus)भारत के पक्ष में (+34.4 अरब डॉलर)

 

वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत के मजबूत स्टैंड के कारण अमेरिका को 500 अरब डॉलर के कारोबार से लेकर एग्रीकल्चर सेक्टर से जुड़ी अपनी कई शर्तों पर अब तक यू-टर्न लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है। फिलहाल, भारत बिना किसी हड़बड़ी के इस डील को पूरी तरह देश के आर्थिक हितों के अनुकूल बनाने में जुटा है।

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