नई दिल्ली: भारत में अब शादी सिर्फ एक सामाजिक या पारिवारिक रस्म नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के जनसांख्यिकीय (Demographic) भविष्य को तय करने वाला सबसे बड़ा कारक बनकर उभरी है। पढ़ाई, करियर, आर्थिक आत्मनिर्भरता और बदलती जीवनशैली के कारण आज के युवा पहले के मुकाबले कहीं अधिक उम्र में शादी का फैसला ले रहे हैं। इस बदलाव का सीधा और गहरा असर अब देश की आबादी के ढांचे पर दिखने लगा है—देश में बच्चों की संख्या तेजी से घट रही है, जबकि कामकाजी उम्र के लोगों और बुजुर्गों का अनुपात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
आंकड़ों की नजर में: कैसा है नया जनसांख्यिकीय ढांचा?
हाल ही में सामने आए आंकड़े संकेत देते हैं कि भारत तेजी से एक ऐसे दौर की ओर बढ़ रहा है जहां जन्म दर बेहद सीमित होगी और बुजुर्गों की आबादी का बोझ बढ़ेगा:
बच्चों की आबादी में गिरावट: देश में 14 साल तक की उम्र के बच्चों की आबादी में 24% की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
बढ़ती कामकाजी आबादी: 15 से 59 वर्ष की कामकाजी आबादी बढ़कर अब कुल जनसंख्या का 66.4% हो गई है।
बुजुर्गों की हिस्सेदारी: 60 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गों की आबादी का अनुपात बढ़कर 9.7% तक पहुंच चुका है।
पांच दशकों में आधी रह गई जन्म दर
'सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम' (SRS Bulletin 2024) के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि भारत की जन्म दर पिछले पांच दशकों में लगभग आधी रह गई है।
| वर्ष | जन्म दर (प्रति 1,000 आबादी पर) |
|---|---|
| 1971 | 36.9 |
| 2024 | 18.3 |
यह गिरावट साफ दर्शाती है कि देश में जनसंख्या तो बढ़ रही है, लेकिन उसकी रफ्तार बेहद धीमी हो चुकी है। इसका सीधा संबंध महिलाओं की बढ़ती साक्षरता, शहरीकरण और देर से विवाह के फैसलों से है।
देर से शादी और छोटे होते परिवार
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) पर आधारित शोध बताते हैं कि जो महिलाएं 21 वर्ष या उससे अधिक उम्र में शादी करती हैं, उनके बच्चों की संख्या उन महिलाओं की तुलना में काफी कम होती है जिनकी शादी कम उम्र में हो जाती है। महिलाएं जब आर्थिक रूप से सशक्त और शिक्षित होती हैं, तो वे शादी और मातृत्व में देरी का विकल्प चुनती हैं, जिससे अंततः कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) में कमी आती है।
वर्तमान में देश में महिलाओं की पहली शादी की औसत उम्र करीब 19 साल हो चुकी है, जबकि महानगरीय और शहरी राज्यों में यह आंकड़ा 22 से 25 साल के पार जा चुका है।
देर से मातृत्व: खुशहाल जीवन के साथ स्वास्थ्य संबंधी जोखिम
बढ़ती उम्र में मां बनने से महिलाओं को अपने करियर को संवारने का पूरा मौका तो मिल रहा है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से इसके कुछ गंभीर जोखिम भी हैं।
1.48 लाख से अधिक विवाहित महिलाओं पर किए गए एक विस्तृत शोध के अनुसार, 35 वर्ष या उससे अधिक उम्र में गर्भधारण करने वाली महिलाओं में निम्नलिखित चुनौतियां देखी गई हैं:
गर्भपात (Miscarriage) का खतरा: सामान्य की तुलना में 43% अधिक।
कम वजन के बच्चे (Low Birth Weight): होने की आशंका 15% अधिक।
गर्भनिरोधक की अपूर्ण आवश्यकता (Unmet Need): करीब दोगुनी (98% अधिक)।
अन्य जोखिम: बांझपन (Infertility), गर्भधारण में जटिलताएं और बच्चे में डाउन सिंड्रोम जैसी आनुवंशिक (Genetic) समस्याओं की संभावना बढ़ जाती है।
(नोट: राहत की बात यह है कि इस शोध में एनीमिया और देर से मातृत्व के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया है।)
भविष्य का भारत: अवसर या चुनौती?
आने वाले वर्षों में यदि यही ट्रेंड जारी रहा, तो स्कूलों में दाखिले कम होंगे, जिससे शिक्षा क्षेत्र प्रभावित होगा। वहीं दूसरी ओर, बुजुर्गों की बढ़ती संख्या के कारण स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर भारी दबाव बनेगा।
वर्तमान में भारत के पास अपनी विशाल कामकाजी आबादी (66.4%) के रूप में 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकीय लाभांश) का एक सुनहरा अवसर है। लेकिन यदि इस युवा आबादी को समय रहते पर्याप्त रोजगार, कौशल और सही नीतियां नहीं मिलीं, तो यह जनसांख्यिकीय अवसर आने वाले समय में एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती में तब्दील हो सकता है।