'मर्यादा भंग या रेप की कोशिश?', 'छाती दबाना रेप की कोशिश नहीं', पटना हाईकोर्ट के फैसले पर भड़का सुप्रीम कोर्ट; दिए बड़े निर्देश

न्यायिक असंवेदनशीलता पर शीर्ष अदालत की तल्ख टिप्पणी; पुलिस थानों और अदालतों को विशेष हैंडबुक का पालन करने का आदेश

15 Jul 2026  |  1022

 

 

नई दिल्ली।

यौन अपराधों के मामलों में अदालतों की असंवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। हाल ही में पटना हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले, जिसमें 'महिला की सलवार उतारने और छाती दबाने' को बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं माना गया था, पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में न्यायिक अधिकारियों को अतिरिक्त संवेदनशीलता और कानूनी बारीकियों को समझने की जरूरत है।

शीर्ष अदालत का बड़ा फैसला: वेबसाइटों पर अपलोड होगी 'संवेदनशीलता रिपोर्ट'

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यौन अपराध के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी समिति की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट सहित देश के सभी हाईकोर्ट की वेबसाइटों पर अनिवार्य रूप से अपलोड किया जाए।

यह स्वतः संज्ञान वाला मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 के एक ऐसे ही फैसले से शुरू हुआ था, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि 'पजामे का नाड़ा खींचना और स्तनों को पकड़ना' रेप की कोशिश नहीं माना जाएगा।

वरिष्ठ वकील की दलील और सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि ऐसी असंवेदनशील टिप्पणियां और फैसले समय-समय पर आते रहे हैं। उन्होंने 9 जुलाई को आए पटना हाईकोर्ट के फैसले का विशेष रूप से उल्लेख किया।

इस पर सुनवाई करते हुए बेंच ने कड़े सवाल पूछे:

जजों की रिसर्च पर सवाल: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पटना हाईकोर्ट के आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि न्यायाधीशों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे फैसले से पहले कुछ कानूनी रिसर्च करें। उन्होंने तल्ख लहजे में कहा, "स्टाफ कुछ नहीं कर रहा है।"

हैंडबुक का पालन अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी अदालतें यौन अपराधों से जुड़ी इस विशेष हैंडबुक में दी गई बातों का कड़ाई से पालन करें।

पुलिस को भी निर्देश: राज्य सरकारों को निर्देश दिया गया है कि वे सभी पुलिस स्टेशनों को एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करते समय इस हैंडबुक के दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराएं।

क्या था पटना हाईकोर्ट का विवादित फैसला?

पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने हाल ही में रेप के प्रयास के एक आरोपी की सजा रद्द करते हुए टिप्पणी की थी कि:

"किसी महिला की सलवार उतारना और उसकी छाती दबाना रेप की कोशिश साबित करने के लिए काफी नहीं है। ये हरकतें केवल महिला की मर्यादा भंग करने (आईपीसी की धारा 354) के तहत अपराध मानी जाएंगी।"

क्या था यह पूरा मामला (2008 की घटना):

घटनास्थल: अमरपुर का एक फोटोग्राफी स्टूडियो।

क्या हुआ था: एक पीड़िता अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने गई थी। स्टूडियो संचालक ने पिता को बाहर भेजकर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और लड़की का यौन उत्पीड़न करने की कोशिश की।

ट्रायल कोर्ट का फैसला: कोर्ट ने आरोपी को बलात्कार की कोशिश और बंधक बनाने की धाराओं के तहत दोषी ठहराया था।

हाईकोर्ट का तर्क: हाईकोर्ट ने मेडिकल सबूतों की कमी और जांच अधिकारी से पूछताछ न होने का हवाला देकर बलात्कार की कोशिश के आरोप को खारिज कर दिया और इसे केवल 'छेड़छाड़ व मर्यादा भंग' का मामला माना।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख से यह साफ हो गया है कि यौन अपराधों के मामलों में अब अदालतों को अपनी पुरानी और रूढ़िवादी कानूनी व्याख्याओं को बदलना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले ऐसे अपराधों को तकनीकी खामियों या संकीर्ण परिभाषाओं के चश्मे से नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

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