अमेरिकी सीनेट का 'बंकर-बस्टर' दांव: रूसी तेल खरीदने पर भारत समेत 5 देशों पर लग सकता है 100% टैरिफ

दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अंतिम ड्रीम प्रोजेक्ट को रिपब्लिकन-डेमोक्रेट्स की हरी झंडी; ऊर्जा सुरक्षा और द्विपक्षीय व्यापार के बीच संतुलन की बड़ी चुनौती

15 Jul 2026  |  1079

अमेरिकी सीनेट का 'बंकर-बस्टर' दांव: रूसी तेल खरीदने पर भारत समेत 5 देशों पर लग सकता है 100% टैरिफ

 

वॉशिंगटन/नई दिल्ली।

यूक्रेन युद्ध के वित्तपोषण (फाइनेंसिंग) को रोकने के लिए अमेरिकी संसद (सीनेट) ने एक बेहद आक्रामक और रणनीतिक कदम उठाया है। सीनेट में दोनों प्रमुख दलों—रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक—के सांसदों ने एक सुर में 'सेंक्शिनिंग रशिया एक्ट 2026' (Sanctioning Russia Act of 2026) का संशोधित मसौदा पेश किया है। इस कड़े विधेयक के तहत रूस से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की भारी खरीद जारी रखने वाले देशों पर अधिकतम 100 फीसदी तक दंडात्मक टैरिफ (शुल्क) लगाने का प्रस्ताव है। इस नए कानून की जद में आने वाले शीर्ष पांच खरीदार देशों की सूची में भारत का नाम भी प्रमुखता से शामिल है।

यह पूरा घटनाक्रम अमेरिकी राजनीति के कद्दावर दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल की महीनों की कोशिशों का नतीजा है, जिसे अब आगे बढ़ाया जा रहा है।

शीर्ष 5 तेल खरीदार देशों पर सीधा निशाना

अमेरिकी सीनेटरों का मुख्य लक्ष्य रूस की आर्थिक रीढ़ यानी उसके ऊर्जा क्षेत्र को पूरी तरह से पंगु बनाना है। संशोधित विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक:

लक्षित देश: रूस से कच्चे तेल का सबसे ज्यादा आयात करने वाले भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% तक का भारी आयात शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है।

गैस आयात पर भी नजर: रूसी प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देश (चीन, फ्रांस, बेल्जियम, जापान और हंगरी) भी इसके दायरे में आएंगे। हालांकि, 15% से कम गैस आयात करने वाले और निर्भरता घटाने वाले देशों को इसमें कुछ रियायत दी गई है।

हर 180 दिन में समीक्षा: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) हर 6 महीने में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों की सूची और उन पर लागू होने वाली टैरिफ दरों की समीक्षा करेगा।

500% से घटकर 100% हुआ टैरिफ: व्हाइट हाउस से मिला वीटो का अधिकार

शुरुआती प्रस्तावों में रूस से व्यापार करने वाले देशों पर 500% तक का एकमुश्त (ब्लैकेट) टैरिफ लगाने की तैयारी थी। लेकिन वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन हासिल करने के लिए इसमें कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं:

संशोधित बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह विशेष विवेकाधीन अधिकार (Waiver Authority) दिया गया है कि वे राष्ट्रीय हितों या विशेष भू-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किसी भी देश को इन प्रतिबंधों से छूट दे सकते हैं। इसके अलावा, इस बिल के जरिए रूस के 'शैडो फ्लीट' (बिना बीमा और गुप्त रूप से तेल ढोने वाले टैंकरों) पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने का कड़ा प्रावधान है।

भारत के सामने 'ऊर्जा राष्ट्रवाद' और 'वैश्विक संतुलन' की अग्निपरीक्षा

साल 2022 में रूस-यूक्रेन संघर्ष छिड़ने के बाद से भारत ने पश्चिमी देशों के दबावों को दरकिनार करते हुए लगातार रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया है, जिसे भारत ने हमेशा अपनी घरेलू ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रास्फीति (महंगाई) को नियंत्रित रखने के लिए अनिवार्य बताया है।

नीतिगत स्वायत्तता: नई दिल्ली का स्टैंड हमेशा से साफ रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद नीतियां किसी तीसरे देश के निर्देशों से नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय और आर्थिक हितों से संचालित होती हैं।

आगे की राह और कूटनीतिक चुनौती: चूंकि यह अभी सीनेट में पेश किया गया एक विधेयक है, इसलिए इसे अंतिम रूप से कानून बनने के लिए अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) से पारित होना और राष्ट्रपति के अंतिम हस्ताक्षर जैसी लंबी संवैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।

अगर यह बिल कानून का रूप लेता है, तो भारत के लिए रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक-ऊर्जा संबंधों को बचाए रखना और साथ ही अमेरिका के साथ अपने विशाल द्विपक्षीय व्यापारिक व सामरिक गठजोड़ में संतुलन साध पाना आने वाले समय में कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगी।

 

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