मुजफ्फराबाद/इस्लामाबाद
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoJK) में पिछले 40 दिनों से प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के खिलाफ एक ऐसा अभूतपूर्व विद्रोह चल रहा है, जिसकी कल्पना न तो पाकिस्तानी हुक्मरानों ने की थी और न ही खुफिया एजेंसी ISI ने। यह PoJK के 78 साल के इतिहास का सबसे लंबा और आक्रामक आंदोलन बन चुका है। पाकिस्तानी रेंजर्स की बर्बरता, गोलियों की बौछार और 74 प्रदर्शनकारियों की जान जाने के बाद भी यह जन-विद्रोह थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस बगावत ने इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी (सैन्य मुख्यालय) तक हड़कंप मचा दिया है।
आतंकियों से हुई पाक सेना की तुलना, गूंज रहे अलगाव के नारे
बीती 9 जून से शुरू हुआ यह आंदोलन अब पूरी तरह से 'आजादी और अलगाव' के विद्रोह में बदल चुका है। बच्चे, बूढ़े और महिलाएं—पीओके का हर नागरिक आज पाकिस्तानी सेना के खिलाफ सड़क पर ताल ठोक रहा है। प्रदर्शनकारी खुलेआम पाकिस्तानी सेना की तुलना आतंकी संगठनों से कर रहे हैं। शुरुआत में यह प्रदर्शन सस्ते आटे, चौबीस घंटे बिजली और बुनियादी हकों के लिए शुरू हुआ था, जो अब पाकिस्तान से पूरी तरह अलग होने की मांग में तब्दील हो गया है।
विद्रोह की मुख्य वजहें: श्रीनगर से तुलना और संसाधनों की लूट
PoJK के नागरिकों में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
आटे की आसमान छूती कीमतें: पीओके में जनता दाने-दाने को मोहताज है। यहाँ एक किलो आटे की कीमत ₹178 तक पहुंच चुकी है, जबकि भारत के श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) में आटा महज ₹30-40 किलो मिल रहा है। जनता अब आटे की सही कीमत और उचित वितरण के लिए सख्त कानून की मांग कर रही है।
बिजली हमारी, ऐश पाकिस्तान की: पीओके में 3,029 मेगावाट क्षमता के 4 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट चल रहे हैं। लेकिन, पाकिस्तान इनका 95% हिस्सा नेशनल ग्रिड के जरिए अपने शहरों में ले जाता है। पीओके को उसकी 400 मेगावाट की जरूरत के बदले सिर्फ 151 मेगावाट बिजली दी जा रही है, जिससे पूरा इलाका अंधेरे में डूबा है।
अंधेरे में 78 साल: पिछले 78 सालों में पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का सिर्फ शोषण किया है। यहाँ न तो कोई रेलवे लाइन बिछाई गई और न ही कोई एयरपोर्ट बनाया गया। अब जनता इंटरनेशनल एयरपोर्ट और रेल कनेक्टिविटी की मांग कर रही है।
ISI के 'आतंकी कोटे' को खत्म करने की मांग
प्रदर्शनकारियों की एक प्रमुख मांग पाकिस्तान में बसे कथित शरणार्थियों के नाम पर आरक्षित 12 विधानसभा सीटों की व्यवस्था को तुरंत समाप्त करने की है। आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल ISI हिजबुल मुजाहिद्दीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे प्रतिबंधित संगठनों के आतंकियों को पीओके की संसद में पहुंचाने और कठपुतली सरकारें गिराने के लिए करती है। साथ ही, स्थानीय नौकरियों में बाहरी पाकिस्तानियों की एंट्री पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की जा रही है।
मुजफ्फराबाद कूच और पाकिस्तान का 'धोखा'
बीती 15 जुलाई को पीओके के कोने-कोने से ढाई लाख से ज्यादा लोग राजधानी मुजफ्फराबाद कूच के लिए इकट्ठा हुए थे। इस विशाल जनसैलाब को देखकर घबराए बिलावल भुट्टो ने पूर्व पीएम राजा परवेज अशरफ को मध्यस्थता के लिए भेजा। वहीं, सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने अपने खास दूत और पाकिस्तान ओवरसीज फाउंडेशन के प्रमुख कमर रजा को प्रदर्शनकारियों को शांत करने के लिए भेजा था।
कमर रजा ने मुनीर का हवाला देकर मांगों को मानने के लिए कुछ समय मांगा, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान सरकार को 21 जुलाई तक का अल्टीमेटम देते हुए कूच टाल दिया। हालांकि, हमेशा की तरह पाकिस्तान का धोखेबाज चेहरा फिर सामने आया, जब कमर रजा ने 24 घंटे के भीतर अपने बयान से पलटते हुए कह दिया कि उन्हें आसिम मुनीर ने नहीं भेजा था। इस धोखे के बाद 21 जुलाई को अल्टीमेटम खत्म होते ही पीओके में स्थिति बेहद विस्फोटक होने की आशंका है।