आत्मनिर्भर भारत का 'रेयर अर्थ' संकल्प
संगीत के एक पुराने हिट से लेकर आधुनिक तकनीकी युद्ध तक, दुर्लभ मृदा तत्व आज वैश्विक सत्ता-संतुलन का नया आधार बन चुके हैं। चीन के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए भारत अब खनिज संप्रभुता की निर्णायक दौड़ में उतर चुका है।
16 Feb 2026
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सत्तर के दशक के प्रसिद्ध मोटाउन बैंड 'रेयर अर्थ' का 1969 का वह सुपरहिट गीत 'गेट रेडी' आज दशकों बाद वैश्विक भू-राजनीति के गलियारों में एक नई और गंभीर प्रतिध्वनि के साथ गूँज रहा है। संगीत की दुनिया से निकलकर 'दुर्लभ मृदा तत्व' अब आधुनिक सभ्यता की धमनियों में बहने वाला वह 'नया स्वर्ण' बन चुके हैं, जिसके बिना इक्कीसवीं सदी की तकनीकी कल्पना ही असंभव है। चाहे वह इलेक्ट्रिक वाहनों की रफ्तार हो, पवन चक्कियों के विशाल ब्लेड, स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन, पेट्रोलियम शोधन के उत्प्रेरक हों या रक्षा प्रणालियों के लेज़र और बैटरी—इन सत्रह धातुओं का प्रभाव सर्वव्यापी है। वैश्विक प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखला के इस उच्च-दांव वाले कुरुक्षेत्र में, अब भारत के लिए भी 'तैयार' होने का समय आ गया है। यह संघर्ष केवल व्यापार का नहीं, बल्कि चीन के उस एकाधिकार को चुनौती देने का है, जो वर्तमान में विश्व के 90 प्रतिशत REE प्रसंस्करण को अपनी मुट्ठी में कैद किए हुए है। भारत की यह छलांग अपनी आयात निर्भरता की बेड़ियों को काटकर 'खनिज संप्रभुता' की दिशा में एक ऐतिहासिक प्रस्थान है।
अल्गोरिथमिक जंग और चीन का खनिज साम्राज्यवाद
दुर्लभ मृदा तत्व केवल सत्रह धातुओं का समूह नहीं हैं; ये नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम और लैंथेनम जैसे वे तत्व हैं जो स्थायी चुम्बकों के निर्माण के लिए अनिवार्य हैं। भारत के लिए इनकी माँग एक विस्फोट की स्थिति में है। 'फेम' योजना के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों के लक्ष्य और सेमीकंडक्टर मिशनों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि 2030 तक हमारी आवश्यकताएं दोगुनी हो जाएंगी। वर्ष 2025 में चीन द्वारा लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों ने न केवल वैश्विक कीमतों में आग लगा दी, बल्कि भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो क्षेत्रों को एक ऐसे संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया, जैसा 2010 में जापान ने महसूस किया था।
चीन ने अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच चरणों में डिस्प्रोसियम, टेरबियम और यट्रियम जैसे तत्वों पर कड़े नियंत्रण लागू किए। यहाँ तक कि उन उत्पादों के लिए भी अनुमोदन अनिवार्य कर दिया गया जिनमें इन धातुओं की नाममात्र की उपस्थिति (0.1 प्रतिशत) थी। नवंबर और दिसंबर 2025 तक पहुँचते-पहुँचते, बीजिंग ने इन खनिजों के प्रसंस्करण की तकनीक के निर्यात पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। वित्त वर्ष 2024-25 के आँकड़े बताते हैं कि भारत अपने दुर्लभ मृदा चुम्बकों का 93 प्रतिशत हिस्सा चीन से आयात करता रहा है। इस 'खनिज साम्राज्यवाद' के विरुद्ध भारत का अभियान अब केवल एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि 'आत्मनिर्भर भारत' का सबसे महत्वपूर्ण सामरिक परीक्षण बन चुका है।
राष्ट्रीय खनिज मिशन: आत्मनिर्भरता का नया ब्लूप्रिंट
इस संकट का उत्तर देने के लिए भारत सरकार ने 2024 में 'राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन' का शंखनाद किया। 16,300 करोड़ रुपये के परिव्यय वाला यह मिशन 2030-31 तक 18,000 करोड़ रुपये के निवेश को आकर्षित करने का लक्ष्य रखता है। यह मिशन केवल खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्वेषण से लेकर प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण तक की पूरी मूल्य शृंखला को कवर करता है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने राजस्थान में 35 सहित कुल 195 परियोजनाओं के माध्यम से अन्वेषण को तेज कर दिया है। केरल, ओडिशा और तमिलनाडु के तटीय रेत (मोनाज़ाइट) से लेकर विशाखापत्तनम के अंतर्देशीय स्थलों तक, भारत अपनी छिपी हुई संपदा को टटोल रहा है।
भारत की इस यात्रा की जड़ें 'इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड' में निहित हैं, जो 1950 से परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत एक सरकारी एकाधिकार रहा है। लंबे समय तक परमाणु ऊर्जा अधिनियम के प्रतिबंधों के कारण इसका उत्पादन थमा रहा, क्योंकि मोनाज़ाइट को एक परमाणु खनिज माना जाता था। लेकिन आज मुंबई स्थित यह मुख्यालय अलुवा (केरल), चवारा और ओस्कॉम (ओडिशा) जैसी अपनी इकाइयों के माध्यम से सालाना 11,200 मीट्रिक टन प्रसंस्करण की क्षमता के साथ भारत का मुख्य योद्धा बनकर उभरा है।
कानूनी सुधार और निजी क्षेत्र का उदय
इतिहास गवाह है कि बिना नीतिगत साहस के कोई भी सामरिक लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। 'खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2023' ने लिथियम, नाइओबियम और टाइटेनियम जैसे खनिजों को परमाणु श्रेणी से बाहर कर निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खोल दिए। सितंबर 2025 में पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में इन परियोजनाओं को सार्वजनिक सुनवाई से छूट देकर कलीयरेंस की प्रक्रिया को 'फास्ट-ट्रैक' कर दिया।
नवंबर 2025 में 73 अरब रुपये की उस योजना को मंजूरी दी गई, जो सात वर्षों में 6,000 मीट्रिक टन स्थायी चुम्बकों के निर्माण का लक्ष्य रखती है। यह केवल एक सब्सिडी नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र के जोखिम को कम करने और उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने का एक 'रणनीतिक कवच' है। बजट 2026 इस दिशा में और भी गहरे सुधारों की ओर इशारा करता है, जहाँ 'रेयर अर्थ एक्सप्लोरेशन फंड' और कर रियायतों के माध्यम से एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की तैयारी है जहाँ भारत केवल कच्चा माल निर्यातक न रहकर मूल्य शृंखला का अधिपति बने।
सार्वजनिक और निजी दिग्गजों का सामरिक संगम
इस खनिज महासमर में भारत के सार्वजनिक उपक्रम अपनी पुरानी केंचुली त्याग रहे हैं। कोल इंडिया जैसा जीवाश्म ईंधन दिग्गज अब ऑस्ट्रेलिया, रूस और अर्जेंटीना में आरईई खनन साझेदारी की तलाश कर रहा है। इसकी सहायक कंपनी बीसीसीएल ने अपने ओवरसब्सक्राइब हुए आईपीओ से प्राप्त निधि को दुर्लभ धातुओं में निवेश करने के लिए आरक्षित किया है। गुजरात खनिज विकास निगम भी भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र से तकनीक हस्तांतरण प्राप्त कर अंबाडुंगर परियोजना के माध्यम से सालाना 12,000 टन ऑक्साइड उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहा है। वहीं 'खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड' अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में लिथियम और दुर्लभ तत्वों की सुरक्षा के लिए वैश्विक संपत्तियों का अधिग्रहण कर रहा है।
निजी क्षेत्र में भी हलचल तीव्र है। अडानी समूह ने आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में 23,000 करोड़ रुपये के निवेश से एक एकीकृत टाइटेनियम और रेयर अर्थ कॉम्प्लेक्स बनाने का प्रस्ताव दिया है, जो 20,000 रोजगार सृजित करने के साथ-साथ चीन पर निर्भरता को न्यूनतम करेगा। वेदांता समूह ने उत्तर प्रदेश में मोनाज़ाइट ब्लॉक हासिल कर अपनी आत्मनिर्भरता की प्रतिबद्धता को दोहराया है। सज्जन जिंदल के नेतृत्व वाला JSW समूह भी 7,280 करोड़ रुपये की चुम्बक पहल के माध्यम से इस क्षेत्र में अपनी धाक जमा रहा है। यहाँ तक कि महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे वाहन निर्माता भी चीन के प्रतिबंधों के बाद फेराइट सामग्री और हल्के दुर्लभ तत्वों जैसे विकल्पों के माध्यम से स्थानीय विनिर्माण की संभावनाएँ तलाश रहे हैं।
फ्रेंडशोरिंग: कूटनीति और खनिज सुरक्षा का नया गठबंधन
भारत आज चीन के विरुद्ध 'फ्रेंडशोरिंग' की नीति अपना रहा है, जिसका अर्थ है—शत्रु देशों के बजाय विश्वसनीय मित्र देशों से आपूर्ति सुनिश्चित करना। प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच फरवरी 2025 में हुआ 'यू.एस.-इंडिया कॉम्पैक्ट' समझौता इसी दिशा में एक मील का पत्थर है। अमेरिकी एक्सिम बैंक महत्वपूर्ण खनिजों के लिए 100 बिलियन डॉलर तक के निवेश की योजना बना रहा है, जिसमें भारत को प्रसंस्करण हब के रूप में देखा जा रहा है।
ऑस्ट्रेलिया के साथ 'क्रिटिकल मिनरल्स इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप' और कनाडा के साथ त्रिपक्षीय समझौते ने भारत की खनिज सुरक्षा को एक अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा कवच प्रदान किया है। जापान भी इस दौड़ में भारत का साथ दे रहा है, जहाँ टोयोटा की सहायक कंपनी 'टोयोट्सु' भारत में चुम्बक निर्माण संयंत्र स्थापित करने पर विचार कर रही है। यह गठबंधन केवल व्यापार के लिए नहीं, बल्कि 'क्वाड' के उस साझा विज़न के लिए है जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र को चीन के भू-आर्थिक दबाव से मुक्त रखना चाहता है।
चुनौतियों का हिमालय और भविष्य का क्षितिज
उत्साह के इस सैलाब के बावजूद, भारत के सामने चुनौतियों का एक हिमालय खड़ा है। भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ मृदा भंडार (8.52 मिलियन टन) है, लेकिन हमारा उत्पादन वैश्विक आपूर्ति का 1 प्रतिशत भी नहीं है। पुरानी बुनियादी संरचना और खनन क्षमता की सीमाएं हमें पीछे खींच रही हैं। इसके अलावा, तटीय रेत के खनन से होने वाला पर्यावरणीय नुकसान, थोरियम कचरे का सुरक्षित निपटान और स्थानीय विरोध जैसी समस्याएँ इस मार्ग की बाधाएं हैं।
सबसे बड़ी कमी 'डाउनस्ट्रीम' सुविधाओं की है। हम अयस्क निकालने में तो कुशल हैं, लेकिन उन्हें शुद्ध करने, मिश्र धातु बनाने और चुम्बक तैयार करने की तकनीक में अभी भी हम शैशवावस्था में हैं। प्रसंस्करण सुविधाओं के निर्माण में 15 साल तक का समय और भारी पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है, जो निवेशकों को डराती है। भारत की माँग 2030 तक 8,220 मीट्रिक टन तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि वर्तमान उत्पादन मात्र 2,900 टन है।
इंद्रधनुष के अंत में सोने का घड़ा
भारत का दुर्लभ मृदा तत्वों की ओर यह प्रस्थान महज़ खनन की एक कसरत नहीं है; यह भारत का 'पुनः औद्योगीकरण' है। 56 साल पहले 'रेयर अर्थ' बैंड ने अपने गीत 'बोर्न टू वांडर' में कहा था—'मुझे अपने सपने का पीछा करना होगा, जैसे नदी समुद्र की ओर बढ़ती है... मुझे इंद्रधनुष को ढूँढना होगा, क्योंकि वह मेरा इंतज़ार कर रहा है।ट आज भारत के लिए वह इंद्रधनुष खनिज सुरक्षा और तकनीकी संप्रभुता के रूप में खड़ा है।'
2030 तक, यदि भारत अपनी खनिज आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लेता है, तो यह न केवल 30 प्रतिशत ईवी पैठ और रक्षा स्वायत्तता को शक्ति प्रदान करेगा, बल्कि 'चीन-प्लस-वन' की रणनीति को एक खोखले नारे से बदलकर एक वैश्विक वास्तविकता बना देगा। दुर्लभ मृदा तत्वों का यह कुरुक्षेत्र अंततः यह तय करेगा कि आने वाले समय में विश्व की तकनीकी नियति बीजिंग के एल्गोरिदम से लिखी जाएगी या नई दिल्ली के संकल्प से। भारत की खनिज संप्रभुता ही उसके भविष्य के विकास की सबसे उज्ज्वल नक्षत्र सिद्ध होगी।
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