SHANTI: भविष्य का आधार
दिसंबर 2025 का 'शांति अधिनियम' भारत के लिए केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि परमाणु संकोच से परमाणु आत्मविश्वास की ओर महाप्रस्थान है। 'नेट ज़ीरो' के लक्ष्य और एसएमआर तकनीक के संगम से, नई दिल्ली अब वैश्विक परमाणु प्रशासन का नया व्याकरण लिख रही है। क्या यह नीति भारत को ऊर्जा का नया लाइटहाउस बनाएगी?
16 Feb 2026
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जब वैश्विक ऊर्जा विमर्श 'नेट ज़ीरो' और जलवायु न्याय की धुरी पर घूम रहा है, तब भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के व्याकरण को मौलिक रूप से बदलने का साहस दिखाया है। हाल ही में विद्युत मंत्रालय द्वारा जारी 'मसौदा राष्ट्रीय विद्युत नीति 2026' केवल एक रणनीतिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह उस 'शांति' (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India - SHANTI) अधिनियम की तार्किक परिणति है, जिसे दिसंबर 2025 में संसद की स्वीकृति मिली थी। इतिहास गवाह है कि शीत युद्ध के बाद के कालखंड में परमाणु ऊर्जा वैश्विक दक्षिण के लिए एक ऐसा 'मृगतृष्णा' बनी रही, जो पहुँच में होते हुए भी जटिल अंतरराष्ट्रीय नियमों, भारी लागत और दायित्वों के चक्रव्यूह में फँसी थी। किंतु, शांति अधिनियम के माध्यम से नई दिल्ली ने न केवल अपने परमाणु भविष्य की सीमाओं को परिभाषित किया है, बल्कि वैश्विक परमाणु प्रशासन में एक नया 'भारतीय प्रतिमान' भी स्थापित किया है। यह नीति 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता हासिल करने के उस महासंकल्प का ब्लूप्रिंट है, जहाँ राज्य, निजी क्षेत्र और तकनीक का एक अभूतपूर्व संगम दिखाई देता है।
विकासशील देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रसार के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा 'परमाणु दायित्व' का अनिश्चित विन्यास रहा है। भारत का पिछला ढांचा—परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1962 और नागरिक परमाणु क्षति दायित्व अधिनियम 2010—वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं और निवेशकों के लिए एक दुर्गम किला बना हुआ था। 2010 के कानून में आपूर्तिकर्ता पर वैधानिक दायित्व के प्रावधान ने अंतरराष्ट्रीय तकनीक और निजी पूँजी को भारत की दहलीज पर ठिठकने के लिए विवश कर दिया था। शांति अधिनियम ने इस समीकरण को निर्णायक रूप से बदलते हुए आपूर्तिकर्ता के दायित्व को 'वैधानिक' के बजाय 'संविदात्मक' बना दिया है।
यह सुधार भारत को 'परमाणु क्षति के लिए पूरक क्षतिपूर्ति के कन्वेंशन' के वैश्विक मानकों के समकक्ष खड़ा करता है। अधिनियम की धारा 13 के तहत ऑपरेटर के दायित्व को 300 मिलियन विशेष आहरण अधिकार - जो लगभग 430 मिलियन डॉलर के बराबर है—पर सीमित करना और उससे ऊपर के किसी भी अवशिष्ट दायित्व को 'संप्रभु बैकस्टॉप' के रूप में केंद्र सरकार द्वारा वहन करना, निवेशकों के लिए एक पारदर्शी और पूर्वानुमानित वातावरण निर्मित करता है। यह केवल एक कानूनी संशोधन नहीं है, बल्कि उन देशों—जैसे बांग्लादेश, घाना और वियतनाम—के लिए एक वैधानिक खाका भी है जो परमाणु ऊर्जा की आकांक्षा तो रखते हैं लेकिन वित्त पोषण और संप्रभु गारंटी के बोझ तले दबे हैं। भारत ने अपनी इस 'कानूनी प्रयोगशाला' के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि परमाणु ऊर्जा को वैश्विक रूप से संरेखित और विकास-संवेदी नियमों के तहत संचालित किया जा सकता है।
वैश्विक दक्षिण के लिए परमाणु ऊर्जा की दुविधा हमेशा से 'पैमाने' की रही है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में प्रचलित विशालकाय गीगावाट-स्तर के रिएक्टर उन विकासशील देशों के लिए अनुपयुक्त रहे हैं जिनके ग्रिड कमजोर हैं और सार्वजनिक वित्त सीमित है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में वैश्विक बिजली की मांग में 85 प्रतिशत की वृद्धि उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से आएगी। ऐसे में 1,000 मेगावाट के उन विशाल रिएक्टरों की प्रतीक्षा करना, जिन्हें बनाने में 15 वर्ष और 28 बिलियन डॉलर तक की लागत आती है, एक अव्यावहारिक विकल्प बन चुका था।
शांति अधिनियम और नई विद्युत नीति ने इस मिसमैच को पहचानते हुए 'लघु मॉड्यूलर रिएक्टर' और 'भारत स्मॉल रिएक्टर्स' को अपनी रणनीति के केंद्र में रखा है। रूस के 'अकादमिक लोमोनोसोव' जैसे तैरते हुए परमाणु संयंत्रों की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि छोटे रिएक्टर न केवल लचीले होते हैं, बल्कि वे सुदूर औद्योगिक और खनन क्षेत्रों के कमजोर ग्रिडों के लिए संजीवनी का कार्य कर सकते हैं। भारत की रणनीति 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए SMRs को धरातल पर उतारने की है, जिसके लिए 2025-26 के संघीय बजट में 2.1 बिलियन डॉलर का विशेष प्रावधान किया गया है। यह 'मूनशॉट' भारत को एक ऐसी स्थिति में ले जाएगा जहाँ परमाणु ऊर्जा 'मोनोलिथिक' (अखंड) होने के बजाय 'स्केलेबल' और 'फेज्ड' (चरणबद्ध) होगी, जो सौर और पवन ऊर्जा के साथ एक मज़बूत 'फर्म बेसलोड' के रूप में कार्य करेगी।
यद्यपि शांति अधिनियम एक भारतीय कानून है, किंतु इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता भारत की परमाणु साझेदारियों, विशेषकर रूस के साथ उसके संबंधों से अविभाज्य है। ऐतिहासिक रूप से रूस एकमात्र ऐसा बाहरी अभिनेता रहा है जो भारत के पुराने और कठिन नियमों के भीतर भी संचालन करने में सक्षम था, जैसा कि कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र की निरंतरता से स्पष्ट है। हाल ही में गोवा में आयोजित 'इंडिया एनर्जी वीक' के दौरान रोसाटॉम के प्रतिनिधियों ने शांति अधिनियम का स्वागत करते हुए इसे 'मेक इन इंडिया' के लिए एक महान अवसर बताया है।
रूसी मॉडल, जिसमें राज्य समर्थित वित्त पोषण, दीर्घकालिक ईंधन आपूर्ति और पूर्ण जीवन-चक्र सहायता शामिल है, वैश्विक दक्षिण के कई प्रोजेक्ट्स (जैसे बांग्लादेश का रूपपुर संयंत्र) का आधार है। भारत इस मॉडल में 'नियामकीय विश्वसनीयता' और 'मानव पूँजी' का तड़का लगाता है। आईएईए के साथ अपने भारत-विशिष्ट सुरक्षा उपायों के समझौते के तहत, नई दिल्ली ने अपनी 35 नागरिक सुविधाओं को अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए खोल दिया है, जो वैश्विक स्तर पर भारतीय नियामक व्यवस्था में विश्वास को प्रगाढ़ करता है। दशकों से प्रेशराइज्ड हेवी-वॉटर रिएक्टरों के सफल संचालन ने भारत में अनुभवी इंजीनियरों और तकनीशियनों का एक ऐसा विशाल पूल तैयार किया है, जिसकी मेधा अब निर्यात की जा रही है। 2024 में यूएई के 'बराहक' संयंत्र के संचालन और रखरखाव के लिए हुआ समझौता इसी तकनीकी निर्यात का प्रारंभ है।
किंतु, शांति अधिनियम केवल संभावनाओं का द्वार नहीं है, बल्कि यह उत्तरदायित्वों का एक भारी बोझ भी है। ऑपरेटर के दायित्व को सीमित करने और शेष भार संप्रभु (अर्थात करदाता) पर डालने का अर्थ है कि किसी भी बड़ी आपदा की स्थिति में आर्थिक बोझ अंततः जनता की पीठ पर होगा। फुकुशिमा जैसी घटनाओं के बाद का अनुभव बताता है कि मुआवज़े और सफाई का बिल सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। अतः भारत के लिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह इस निवेश-अनुकूल वातावरण के साथ-साथ अपने नियामक तंत्र को इतना सख्त बना सकता है कि 'शून्य-त्रुटि' की संस्कृति विकसित हो सके।
शांति अधिनियम को भारत के परमाणु क्षेत्र में एक अंतिम बिंदु नहीं, बल्कि क्रमिक सुधारों के पहले कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। यह कानून भारत को 'न्यूक्लियर पैरैया' के इतिहास से निकालकर एक 'न्यूक्लियर लाइटहाउस' के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है।
2026 की यह विद्युत नीति और शांति अधिनियम का समन्वय यह उद्घोष है कि भारत अब ऊर्जा के क्षेत्र में 'फॉलोअर' नहीं बल्कि 'ट्रेलब्लेज़र' बनने की ओर अग्रसर है। एक ऐसी दुनिया में जहाँ निर्णय लेने की गति ही एकमात्र प्रतिस्पर्धा है, भारत ने अपनी परमाणु संप्रभुता को आधुनिक बाजार के अर्थशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानकों के साथ संरेखित कर दिया है। यह नीति केवल गीगावाट और मेगावाट की गणना नहीं है, बल्कि यह भविष्य के भारत की उस 'ऊर्जा संक्रांति' का शंखनाद है जहाँ परमाणु ऊर्जा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि विकसित भारत की अनिवार्य नींव होगी।
भविष्य के इतिहासकार शायद शांति अधिनियम को उस क्षण के रूप में दर्ज करेंगे जब भारत ने 'परमाणु संकोच' का त्याग कर 'परमाणु आत्मविश्वास' को अंगीकार किया था। यदि हम अपने एसएमआर को समय पर तैनात कर सके और रूस जैसी शक्तियों के साथ मिलकर वैश्विक दक्षिण को एक व्यवहार्य ऊर्जा मॉडल दे सके, तो भारत का यह 'शांति' प्रयास वैश्विक ऊर्जा कुरुक्षेत्र में एक निर्णायक और प्रकाशमान अध्याय सिद्ध होगा। यह समय न केवल रिएक्टरों के निर्माण का है, बल्कि उस 'विवेक' को संस्थागत बनाने का भी है जो तकनीक को मानवता के सुरक्षित और समृद्ध भविष्य का दास बना सके।
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