आवरणकथा- सत्ता संग्राम

भारत की राजनीतिक धरती पर पांच राज्यों का चुनावी संग्राम केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि विचारधाराओं के निर्णायक टकराव का मंच बन चुका है। यह मुकाबला आने वाले वर्षों में देश की दिशा, दशा और लोकतांत्रिक संतुलन को परिभाषित करेगा।

15 Apr 2026  |  29

यह वसंत वेला भारत के राजनैतिक मानचित्र पर केवल ऋतु परिवर्तन का संदेश लेकर नहीं आई है, बल्कि यह उन पांच राज्यों के भाग्य निर्धारण का कालखंड है, जिनकी गूंज दिल्ली के सत्ता-गलियारों को आंदोलित करने वाली है। इस चुनावी दंगल में सभी पक्ष अपनी पूरी सामरिक क्षमता के साथ ताल ठोक रहे हैं। यह मात्र सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि विचारधाराओं का वह घर्षण है जो भविष्य की भारतीय राजनीति की नई दिशा और दशा तय करेगा। इन पांचों राज्यों में सर्वाधिक चर्चा, कौतूहल और विभीषिका का केंद्र 'पश्चिम बंगाल' बना हुआ है। प्रश्न वही है जो पिछले एक दशक से अनुत्तरित है - क्या ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल अपना अजेय दुर्ग बचा पाएगी, या भारतीय जनता पार्टी की केसरिया लहर इस बार गंगा के तटों पर सत्ता का नया इतिहास अंकित करेगी?

पश्चिम बंगाल: गढ़ बचाने और भेदने के तीखे तेवर
पश्चिम बंगाल की राजनीति आज उस मोड़ पर खड़ी है जहां स्मृतियां और महत्वाकांक्षाएं परस्पर टकरा रही हैं। पूरब का यह राज्य भाजपा की अखिल भारतीय चुनावी विजय के रथ के सामने एक सुदृढ़ और दुर्गम प्राचीर बनकर खड़ा है। वर्ष 2011 में जब तीन दशकों के वामपंथी शासन का अवसान हुआ और ममता बनर्जी ने सत्ता की बागडोर संभाली, तब से बंगाल का राजनैतिक परिदृश्य आमूल-चूल परिवर्तित हो चुका है। 2011 में जिस भाजपा का अस्तित्व शून्य सीटों पर सिमटा था, उसका आज मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरना किसी राजनैतिक चमत्कार से कम नहीं है। इस परिवर्तन ने बंगाल के पारंपरिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। कभी राज्य की नियति तय करने वाली वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस आज अपने अस्तित्व और प्रासंगिक होने की अंतिम लड़ाई लड़ रही हैं। अब यह युद्ध द्वि-ध्रुवीय है - तृणमूल कांग्रेस बनाम भाजपा।
294 विधानसभा सीटों के इस विशाल रणांगण में दोनों पक्ष बहुमत के जादुई आंकड़े (148 सीटें) को पार करने के लिए व्याकुल हैं। 2021 का चुनाव इतिहास के पन्नों में तृणमूल की उस अभूतपूर्व विजय के लिए दर्ज है, जहां उसने 215 सीटें जीतकर अपनी जड़ें पुनः गहरी कर ली थीं। उस समय भाजपा 77 सीटों पर थम गई थी, जबकि कांग्रेस और माकपा का खाता तक न खुल पाना भारतीय संसदीय इतिहास की एक विद्रूप घटना थी। किंतु 2026 का परिदृश्य 2016 की तुलना में पूर्णतः भिन्न है। 2016 में जब तृणमूल के पास 211 सीटें थीं, तब कांग्रेस और माकपा क्रमशः 44 और 26 सीटों के साथ एक प्रभावी विपक्ष थे, और भाजपा मात्र 3 सीटों के साथ हाशिये पर थी। आज का यथार्थ यह है कि विपक्ष का अर्थ केवल भाजपा है।
इस महासमर का सबसे रोमांचकारी पक्ष मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रतिपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के बीच का व्यक्तिगत और राजनैतिक द्वंद्व है। शुभेंदु अधिकारी इस बार रणनीतिक आक्रामकता का परिचय देते हुए दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। वे अपनी परंपरागत नंदीग्राम की सीट के साथ-साथ कोलकाता के हृदय स्थल 'भवानीपुर' में ममता बनर्जी को उनके घर में चुनौती दे रहे हैं। यह दृश्य 2021 का विलोम है, जब ममता बनर्जी ने नंदीग्राम जाकर शुभेंदु को ललकारा था और एक अत्यंत सूक्ष्म अंतर से पराजित हुई थीं।
किंतु यह लड़ाई केवल दो चेहरों तक सीमित नहीं है। तृणमूल की ओर से फिरहाद हकीम, ब्रात्य बसु, चंद्रिमा भट्टाचार्य, अरूप राय, सुजीत बोस और शशि पांजा जैसे अनुभवी योद्धा मोर्चा संभाले हुए हैं, तो दूसरी ओर भाजपा ने शंकर घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक लाहिड़ी और नीरज तमांग जिम्बा जैसे प्रखर वक्ताओं और रणनीतिकारों को मैदान में उतारा है। इसके अलावा भाजपा द्वारा 40 स्टार प्रचारकों को भी चुनावी रण में मोर्चा संभालने की जिम्मेदारी दी गई है। पर्दे के पीछे तृणमूल के महासचिव अभिषेक बनर्जी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य संगठन की गोटियाँ सेट करने में अहोरात्र संलग्न हैं।
पिछले कुछ महीनों से ममता बनर्जी निर्वाचन आयोग की 'विशेष सघन पुनरीक्षण' (एसआईआर) मुहिम के विरुद्ध एक प्रचंड प्रतिरोधी स्वर बनकर उभरी हैं। आयोग पर उनके निरंतर प्रहारों और इस मुहिम को लेकर जताई गई चिंताओं ने राज्य के जनमानस में एक संशय की स्थिति उत्पन्न कर दी है। विषय की गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वे स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में अपनी दलीलें रखने पहुंचीं। न्यायालय के हस्तक्षेप के पश्चात भी एसआईआर की स्थिति एक पहेली बनी हुई है। लगभग 90 लाख मतदाता 'संदिग्ध सूची' के अंधकार में हैं और वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़ने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। एसआईआर के मुद्दे को लेकर बीते दिनों मालदा में जिस प्रकार न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाया गया और उग्र प्रदर्शन किये गये तत्पश्चात पुलिस की कार्रवाई ने बंगाल चुनाव की दिशा बदली है। यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि बंगाल की अस्मिता और लोकतांत्रिक शुचिता का प्रश्न बन चुका है।
निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की तिथियों की घोषणा के उपरांत जिस तीव्र गति से मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और कोलकाता पुलिस कमिश्नर सहित 50 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों का स्थानांतरण किया गया, उसे ममता बनर्जी ने भाजपा के अनुकूल 'मैदान तैयार करने' की साजिश करार दिया है। तृणमूल का तर्क है कि असम जैसे राज्यों में आयोग का यह कठोर रवैया अदृश्य रहा, जो उसकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। राज्य में आर.एन. रवि जैसे विवादास्पद राज्यपाल की नियुक्ति ने इस अग्नि में घी का कार्य किया है।
ममता बनर्जी की राजनैतिक दीर्घायु का मुख्य आधार उनकी कल्याणकारी योजनाएं रही हैं। 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं ने ग्रामीण बंगाल की महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच तृणमूल के वोट बैंक को एक अभेद्य दुर्ग में परिवर्तित कर दिया है। हालिया अंतरिम बजट में 'युवा साथी योजना' और लक्ष्मी भंडार की राशि में वृद्धि कर ममता ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। इसके प्रत्युत्तर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी बंगाल यात्राओं के दौरान केंद्र की जन-कल्याणकारी योजनाओं, रोजगार सृजन और समग्र विकास के भाजपाई दृष्टिकोण को जनता के सम्मुख रखा है। यहां लड़ाई 'राज्य बनाम केंद्र' के लाभों की है।
भाजपा के लिए 'घुसपैठ' सदैव एक उर्वर मुद्दा रहा है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने पुनः संकल्प दोहराया है कि वे राज्य की डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) में हो रहे अवांछित परिवर्तनों को रोकने के लिए 'अवैध घुसपैठियों' - विशेषकर बांग्लादेश की सीमाओं से आने वाले तत्वों - को निष्कासित करेंगे। प्रधानमंत्री सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) के माध्यम से मतुआ समुदाय को नागरिकता देने का आश्वासन दे रहे हैं, किंतु धरातल पर दस्तावेजों की कमी के कारण अभी भी संशय के बादल मंडरा रहे हैं। तृणमूल इसे भाजपा की 'विभाजनकारी नौटंकी' बताकर खारिज कर रही है।
यद्यपि तृणमूल ने संसद में 40 प्रतिशत महिला भागीदारी सुनिश्चित कर एक कीर्तिमान स्थापित किया है, किंतु आरजी कर अस्पताल कांड और दक्षिण कोलकाता लॉ कॉलेज जैसी घटनाओं ने राज्य में महिला सुरक्षा के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। भाजपा ने इस संवेदनशील मुद्दे को अपने चुनावी अभियान के केंद्र में रखा है और पीड़ित परिवारों को प्रतिनिधित्व देकर जन-संवेदनाओं को झकझोरने का प्रयास किया है। वहीं, तृणमूल अन्य राज्यों की घटनाओं का हवाला देकर भाजपा को 'मूलतः महिला-विरोधी' प्रमाणित करने में जुटी है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बंगाल के रण का अंतिम और सबसे प्रभावी अस्त्र है। तृणमूल निरंतर भाजपा को 'बाहरी' (बहिरागत) पार्टी के रूप में चित्रित करती है, जो बंगाल के प्रतीकों - रवींद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस - को आत्मसात करने का निष्फल प्रयास कर रही है। ममता का तर्क है कि बंगाल का राष्ट्रवाद भाजपा के 'हिंदुत्व' के सांचे में नहीं समा सकता। दूसरी ओर, भाजपा अब बंगाली मनीषियों और स्वतंत्रता सेनानियों के गौरव गान के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास कर रही है कि वह बंगाल की समृद्ध विरासत की वास्तविक संरक्षक है।
यह लड़ाई केवल सत्ता की नहीं, बल्कि बंगाल की आत्मा को अपने रंग में रंगने की है। जो भी जीते, उसके परिणाम न केवल हावड़ा ब्रिज के उस पार दिखेंगे, बल्कि दिल्ली के रायसीना हिल्स तक महसूस किए जाएंगे।

असम: ब्रह्मपुत्र की लहरों पर महत्वाकांक्षाओं का ज्वार
9 अप्रैल की ऐतिहासिक तिथि ने केवल मतपेटियों को ही नहीं भरा, बल्कि असम के लाखों नागरिकों की सामूहिक आकांक्षाओं और उनके गुप्त निर्णयों को भी विधिक रूप से सील कर दिया है। मतदान केंद्रों पर उमड़ा जनसैलाब और मतदान प्रतिशत के उच्च आंकड़े यह प्रमाणित करते हैं कि जनता ने इस लोकतांत्रिक अनुष्ठान में पूर्ण समर्पण के साथ आहुति दी है। किंतु, वास्तविक विद्रूपता आंकड़ों की प्रचुरता में नहीं, बल्कि उस दिशा में निहित है, जिसे पहचानने में राजनैतिक पंडित भी स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। असम का यह चुनाव अब केवल चुनावी गणित का विषय नहीं रहा, बल्कि यह भावनाओं, क्षेत्रीय अस्मिता और दीर्घकालिक सत्ता-संतुलन का एक जटिल समीकरण बन चुका है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और कांग्रेस के युवा सारथी गौरव गोगोई के मध्य छिड़ा यह संघर्ष अब अपने उस चरमोत्कर्ष पर है, जहां तर्क मौन हो जाते हैं और केवल परिणाम बोलते हैं। निर्वाचन अभियान के दौरान जो प्रखर और तीक्ष्ण प्रहार देखे गए, उन्होंने इस विमर्श को केवल वैचारिक मतभेदों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक 'व्यक्तिगत साख' के महायुद्ध में परिवर्तित कर दिया।
सरमा का आत्मविश्वास उस सांगठनिक सुदृढ़ता पर आधारित है, जिसे भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में असम के दुर्गम अंचलों और विविध समुदायों के भीतर रोपित किया है। इसके विपरीत, गौरव गोगोई की रणनीति 'परिवर्तन की उस अदृश्य लहर' पर टिकी है, जिसके विषय में उनका दावा है कि वह सत्ता की जड़ों को हिलाने के लिए पर्याप्त है। मतदान के पश्चात यह स्पष्ट है कि यह केवल दो व्यक्तियों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह दो भिन्न राजनैतिक दर्शनों के टकराव का अंतिम प्रतिवेदन है।
धरातल से प्राप्त होने वाले संकेत किसी पहेली की भांति उलझे हुए हैं। महानगरीय और शहरी क्षेत्रों में भाजपा का अभेद्य कवच सुरक्षित प्रतीत होता है, जहां विकास और सुदृढ़ नेतृत्व के नारों ने मध्यम वर्ग को सम्मोहित किया है। किंतु, ग्रामीण अंचलों से उठने वाले असंतोष के स्वर और आर्थिक मंदी की आहट ने सत्ताधारी दल की धड़कनें बढ़ा दी हैं। विशेष रूप से अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में जिस प्रकार की राजनैतिक सक्रियता और विपक्षी ध्रुवीकरण देखा गया है, वह किसी बड़े उलटफेर की ओर संकेत कर सकता है। यह अनिश्चितता ही इस चुनाव को एक 'क्लासिक थ्रिलर' (क्लासिक थ्रिलर) का स्वरूप प्रदान कर रही है, जहां कड़े मुकाबले की संभावना ने दोनों पक्षों को सशंकित कर रखा है।
असम के इतिहास में यह एक दुर्लभ संयोग रहा कि इस बार राजनैतिक भविष्य का निर्धारण 'बिहू' के पवित्र पर्व से पूर्व ही संपन्न हो गया। बिहू केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि असमिया प्राण-तत्व की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। उत्सव के उमंग और चुनावी तनाव का यह मिलन जनता के मनोविज्ञान पर एक गहरा प्रभाव डालता है। अब जब मतदान की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है, असम का जनमानस 'उत्सव के आनंद' और 'परिणाम के संशय' के मध्य एक विचित्र मानसिक अवस्था में खड़ा है।
निर्वाचन की घोषणा से ठीक पूर्व सरमा सरकार ने जिस तीव्रता के साथ 'डैमेज कंट्रोल' (क्षति-निवारण) की गोटियाँ बिछाईं, वह किसी सोची-समझी सामरिक योजना का हिस्सा प्रतीत होती है। आर्थिक सहायता की वर्षा, युवाओं के हाथों में नियुक्ति पत्रों का समर्पण और 'रुद्र' जैसे कृत्रिम मेधा (एआई) आधारित डिजिटल अनुप्रयोगों का अनावरण - इन सबके माध्यम से शासन ने अंतिम क्षणों में जनसमर्थन को अपनी ओर मोड़ने का भगीरथ प्रयास किया। अब प्रश्न यह है कि क्या ये 'डिजिटल अस्त्र' और 'तात्कालिक लाभ' मतदाताओं के मन को परिवर्तित करने में सफल रहे, या यह केवल एक भव्य चुनावी प्रबंधन मात्र बनकर रह गया?
कांग्रेस ने इस बार अपनी रणनीति के केंद्र में 'असमिया उप-राष्ट्रीयता' को स्थान दिया और क्षेत्रीय दलों के साथ एक साझा मोर्चा निर्मित किया। किंतु, मतदान के पश्चात सबसे प्रखर प्रश्न यही है कि क्या यह गठबंधन धरातल पर एक 'एकीकृत शक्ति' के रूप में क्रियान्वित हुआ, या यह केवल सत्ता की आकांक्षा में किया गया एक 'अवसरवादी समझौता' था? यदि इस एकजुटता के भीतर अविश्वास की दरारें रहीं, तो विपक्ष के लिए परिणाम अत्यंत पीड़ादायक हो सकते हैं।
मतदान के पश्चात का सबसे रोमांचक पक्ष जनता का वह 'मौन' है, जो किसी भी राजनैतिक विश्लेषण को ध्वस्त करने की सामर्थ्य रखता है। अब न रैलियों का कोलाहल है, न भाषणों की गर्जना और न ही आरोपों की वर्षा। किंतु इस निःशब्द वातावरण के भीतर एक सुस्पष्ट निर्णय सुरक्षित है। क्या जनता ने शासन की निरंतरता और स्थिरता को प्राथमिकता दी है? या फिर इस मौन के पीछे 'सत्ता-परिवर्तन' की वह ज्वाला सुलग रही है जो 4 मई को प्रस्फुटित होगी?
दोनों पक्ष अब अपनी 'पोस्ट-रिजल्ट' (पोस्ट-रिजल्ट) रणनीतियों को अंतिम रूप दे रहे हैं। भाजपा अपने सांगठनिक तंत्र को सतर्क रखे हुए है, तो कांग्रेस और उसके सहयोगी प्रत्येक संदेहास्पद संकेत पर दृष्टि बनाए हुए हैं।
असम का यह निर्णय केवल एक राज्य की सत्ता का निर्धारण नहीं करेगा, बल्कि यह समूचे पूर्वोत्तर भारत के लिए एक 'राजनैतिक प्रकाश-स्तंभ' सिद्ध होगा। यदि भाजपा यहाँ अपनी सत्ता की रक्षा करने में सफल होती है, तो उसका क्षेत्रीय प्रभुत्व एक नए शिखर को स्पर्श करेगा। किंतु, यदि विपक्ष अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करता है, तो यह भारतीय राजनीति में एक नए शक्ति-संतुलन के अभ्युदय का शंखनाद होगा।
मतपेटियां बंद हैं, किंतु राजनीति का वास्तविक द्वार अब खुलने को है। 4 मई 2026 को जब नियति का पिटारा खुलेगा, तब यह स्पष्ट होगा कि असम ने स्थिरता का वरदान दिया है या परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है।

पुदुच्चेरी: फ्रांसीसी झरोखों से झांकता 'डबल' इम्तहान
पुदुच्चेरी के नीले समंदर की लहरें सामान्यतः शांति का संदेश देती हैं, किंतु 9 अप्रैल की संध्या के पश्चात यहाँ का वातावरण एक रहस्यमयी राजनैतिक मंथन का साक्षी बन चुका है। महज 30 सीटों वाली लघु विधानसभा वाला यह केंद्र शासित प्रदेश आज परिणामों की उस देहरी पर खड़ा है, जहाँ पहचान की राजनीति और व्यवस्था के प्रति उपजा रोष एक नया समीकरण गढ़ रहे हैं। प्रारंभिक रुझानों के अनुसार, मतदान का प्रतिशत न केवल संतुलित रहा, बल्कि शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण और अर्ध-शहरी अंचलों में मतदाताओं की सक्रियता ने राजनैतिक पंडितों को विस्मय में डाल दिया है। यह प्रतिमान स्पष्ट करता है कि यह चुनाव केवल 'गठबंधन की गणित' नहीं, बल्कि स्थानीय यथार्थ और जन-संवेदनाओं का एक सघन अधि-वृतांत बन चुका है।
मुख्यमंत्री रंगास्वामी के नेतृत्व वाली एन.आर. कांग्रेस-भाजपा गठबंधन सरकार के लिए यह निर्वाचन केवल सत्ता की रक्षा का उपक्रम नहीं, बल्कि उनके कार्यकाल पर जनता के अंतिम प्रतिवेदन की कसौटी है। 
2021 में जिस 'डबल इंजन' (डबल इंजन) के नैरेटिव ने पुदुच्चेरी को विकास और स्थिरता का स्वप्न दिखाया था, आज वही दावा जन-अदालत में कठघरे में खड़ा है। यद्यपि सरकार ने केंद्र के साथ समन्वय और विकास योजनाओं को अपनी महती उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया, किंतु मतदान के पश्चात उभरने वाले संकेत एक भिन्न ही सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं। कई क्षेत्रों में दर्ज किया गया मौन असंतोष यह इंगित करता है कि विकास के दावों और धरातल की विसंगतियों के मध्य एक अगाध खाई विद्यमान है।
इस निर्वाचन का सबसे सूक्ष्म, किंतु सर्वाधिक विनाशकारी मुद्दा रसोई गैस (एलपीजी) का संकट सिद्ध हुआ है। बढ़ती हुई कीमतें, आपूर्ति की अनियमितता और घरेलू बजट पर पड़ता अतिरिक्त दबाव - इन कारकों ने साधारण मतदाता के भीतर एक ऐसी राजनैतिक ऊष्मा उत्पन्न की है, जिसने बड़े-बड़े विमर्शों को पृष्ठभूमि में धकेल दिया है। विशेषकर महिलाओं और निम्न-मध्यम वर्ग के बीच यह विषय एक निर्णायक कारक बनकर उभरा है। मतदान के पैटर्न (पैटर्न) से यह आभास होता है कि रसोई की यह आंच सत्ताधारी गठबंधन के 'विकास-वाद' को झुलसाने की सामर्थ्य रखती है।
कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन ने इस बार सत्ता पक्ष को एक सुदृढ़ चुनौती देने का भगीरथ प्रयास किया है। 2024 के लोकसभा चुनावों की सफलता ने विपक्षी खेमे में आत्मविश्वास का संचार तो किया, किंतु सीटों के तालमेल और नेतृत्व के प्रश्नों ने उनके भीतर व्याप्त खटास को भी सार्वजनिक कर दिया। विपक्षी खेमा यद्यपि सत्ता-परिवर्तन के प्रति आशावादी है, किंतु यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि क्या उनका आंतरिक असंतुलन परिणामों के समय 'आत्मघाती' सिद्ध होगा? पुदुच्चेरी की प्रबुद्ध जनता ने विपक्ष के इस अंतर्विरोध को किस दृष्टि से देखा है, इसका प्रकटीकरण 4 मई को ही संभव होगा।
पुदुच्चेरी के इस संकुचित चुनावी रणक्षेत्र में 'तमिलार काछि' जैसे लघु दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रभाव इस बार अप्रत्याशित रहा है। जिन सीटों पर कड़े और त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति है, वहां ये सूक्ष्म राजनैतिक इकाइयां 'किंगमेकर' (किंगमेकर) की भूमिका का निर्वाह कर सकती हैं। यह पुदुच्चेरी की विशिष्ट राजनैतिक संस्कृति का ही परिचायक है कि यहाँ छोटे-छोटे समूह भी बड़े अधिष्ठानों के समीकरणों को ध्वस्त करने की सामर्थ्य रखते हैं। पुदुच्चेरी का यह निर्वाचन भारतीय जनता पार्टी के लिए केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारत में उनकी दीर्घकालिक विस्तारवादी रणनीति की एक महत्वपूर्ण 'राजनैतिक प्रयोगशाला' है। यदि यह गठबंधन पुनः सत्ता प्राप्त करने में सफल होता है, तो यह भाजपा के दक्षिणी विस्तार को एक नई ऊर्जा और विधिक मान्यता प्रदान करेगा। इसके विपरीत, यदि परिणाम प्रतिकूल रहे, तो यह उनके 'डबल इंजन' मॉडल पर गंभीर प्रश्नचिन्ह अंकित कर सकता है। पुदुच्चेरी आज एक ऐसे ऐतिहासिक क्षण में खड़ा है, जहाँ सतह पर समंदर की चिर-परिचित शांति है, किंतु गहराई में जनमत का एक प्रचंड तूफ़ान आकार ले रहा है। मतदान के पश्चात का यह अंतराल केवल प्रतीक्षा की घड़ियाँ नहीं हैं, बल्कि यह एक नए राजनैतिक पुनर्संतुलन की प्रस्तावना है। क्या रंगास्वामी का अनुभव और 'डबल इंजन' का आकर्षण जनता की कसौटी पर खरा उतरेगा? या पुदुच्चेरी की जनता एक बार फिर अपनी पुरानी राजनैतिक धाराओं की ओर लौटने का निर्णय सुनाएगी? लहरें मौन हैं, किंतु पुदुच्चेरी की राजनीति में नियति का निर्णय अपना शंखनाद करने को आतुर है।
 

तमिलनाडु: द्रविड़ अस्मिता और राजनैतिक अस्तित्व का महासंग्राम
दक्षिण भारत की राजनीति का हृदय कहा जाने वाला तमिलनाडु आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां प्राचीन द्रविड़ गौरव और आधुनिक राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं का घर्षण एक नई ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है। कुल 234 सीटों के लिए 23 अप्रैल को होने वाला मतदान केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह उस विचारधारात्मक वर्चस्व की लड़ाई है जिसने दशकों से इस राज्य की नियति को गढ़ा है। निर्वाचन की घोषणा से पूर्व ही यहाँ मोर्चेबंदी इस कदर सघन हो चुकी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के 'द्रविड़ नैरेटिव' ने वातावरण को पूर्णतः चुनावी रंग में रंग दिया। मुख्यमंत्री स्टालिन इस चुनाव को 'एनडीए बनाम तमिलनाडु' के युद्ध के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका उद्देश्य अत्यंत स्पष्ट है - मुख्य प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) से उसकी द्रविड़ पहचान छीनकर उसे एक ऐसे गठबंधन के हिस्से के रूप में चित्रित करना, जो कथित रूप से तमिल संस्कृति और संघीय ढांचे के विरुद्ध खड़ा है। राज्यपाल आर.एन. रवि के साथ उनका दीर्घकालिक टकराव और विधानसभा के विधेयकों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गई लड़ाई ने स्टालिन को 'तमिल अधिकारों के रक्षक' के रूप में स्थापित करने में सहायता की है।
इस बार तमिलनाडु के रणांगण में सबसे चर्चित और अनिश्चित तत्व अभिनेता विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) का प्रवेश है। यद्यपि राजनैतिक विश्लेषक उनके वास्तविक चुनावी प्रभाव को लेकर संशय में हैं, किंतु उनकी रैलियों में उमड़ता जनसैलाब पारंपरिक दलों की धड़कनें बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। चर्चाएं तो यहां तक थीं कि भाजपा ने विजय को उप-मुख्यमंत्री पद का प्रलोभन देकर एनडीए में लाने का प्रयास किया, किंतु अपनी स्वतंत्र तमिल पहचान खोने के भय से विजय ने 'एकला चलो' की नीति अपनाई। क्या यह भीड़ वोटों में परिवर्तित होगी या यह केवल एक फिल्मी सितारे के प्रति आकर्षण मात्र है, इसका उत्तर 4 मई के गर्भ में छिपा है।
अन्नाद्रमुक आज अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। जयललिता के अवसान के पश्चात प्रारंभ हुई सत्ता की होड़ ने पार्टी को खंडित कर दिया है। एडप्पादी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) के समक्ष चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि यह सिद्ध करने की भी है कि वरिष्ठ नेताओं के पलायन के उपरांत भी अन्नाद्रमुक ही द्रमुक-विरोधी राजनीति का मुख्य केंद्र है। ओ. पनीरसेल्वम (ओपीएस) का द्रमुक की ओर झुकाव दक्षिण तमिलनाडु के 'मुक्कुलतोर' समुदाय के समीकरणों को बिगाड़ सकता है।
वहीं, भाजपा यहाँ 'लॉन्ग टर्म' (दीर्घकालिक) खेल खेल रही है। के. अन्नामलाई के सांगठनिक प्रयोगों और वर्तमान नेतृत्व के बीच के अंतर्विरोधों के मध्य भाजपा की दृष्टि 2031 के चुनावों पर है। पार्टी का लक्ष्य अन्नाद्रमुक को हाशिये पर धकेलकर तमिलनाडु के मुकाबले को 'द्रमुक बनाम भाजपा' में परिवर्तित करने का है।
 

केरलम: विचारधारा की अंतिम शरणस्थली और अस्तित्व का संकट
केरलम, जिसे 'ईश्वर का अपना देश' कहा जाता है, आज अपनी 16वीं विधानसभा के निर्वाचन के लिए सन्नद्ध है। यहां की राजनीति दशकों से दो ध्रुवों - एलडीएफ (वाम मोर्चा) और यूडीएफ (कांग्रेस नीत गठबंधन) - के बीच झूलती रही है। किंतु पिछले चुनाव में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ ने दोबारा सत्ता में आकर इस चक्र को तोड़ दिया। इस बार का चुनाव न केवल राज्य के लिए, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी राजनीति की प्रासंगिकता के लिए भी निर्णायक है।
पिनराई सरकार ने अपने कार्यकाल में वामपंथ की पारंपरिक जड़ता को त्यागकर विकास और पूंजी निवेश के प्रति एक व्यवहारिक (प्रैग्मेटिक) दृष्टिकोण अपनाया है। बुनियादी ढांचे का विकास और कोविड-19 तथा विनाशकारी बाढ़ के दौरान सरकारी प्रबंधन उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। किंतु, आरोपों के काले बादल भी कम सघन नहीं हैं। सबरीमला में स्वर्ण चोरी, भाई-भतीजावाद और पुलिस तंत्र तथा संघ परिवार के बीच कथित साठगांठ जैसे मुद्दों ने सरकार की छवि को क्षति पहुँचाई है। उच्च शिक्षा के गिरते स्तर के कारण युवाओं का विदेशों की ओर पलायन एक ऐसा घाव है, जिस पर विपक्ष निरंतर प्रहार कर रहा है। 
कांग्रेस के लिए केरलम इस समय देश का सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक आधार है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की वायनाड से संलग्नता यह दर्शाती है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व केरलम को अपनी अंतिम शक्ति के रूप में देख रहा है। एक दशक से सत्ता से बाहर रहने के कारण कांग्रेस संगठन में शिथिलता आई है और गुटबाजी चरम पर है। यदि इस बार भी यूडीएफ विफल रहता है, तो उसके सहयोगी दलों, विशेषकर 'इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग', का मोहभंग हो सकता है, जो कांग्रेस के लिए एक अस्तित्वगत संकट (एक्जिस्टेंशियल क्राइसिस) उत्पन्न कर देगा।
राज्य में भाजपा का वोट शेयर निरंतर बढ़ रहा है, जो कांग्रेस और वामपंथियों के लिए चिंता का विषय है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 11 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई थी, जिससे एनडीए को इस बार कम से कम 3 से 5 सीटें जीतने की आशा है। केरलम की राजनीति में 48 प्रतिशत अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मुस्लिम मतदाताओं का यूडीएफ की ओर झुकाव और ईसाई मतदाताओं के एक वर्ग का भाजपा की ओर बढ़ता रुझान इस बार के नतीजों को अप्रत्याशित बना सकता है।
 

नियति का निर्णय व नए भारत की पदचाप
पश्चिम बंगाल के गंगा तटों से लेकर तमिलनाडु के हिंद महासागर तक फैले इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जा रहे हैं। ये चुनाव केवल राज्यों के मुख्यमंत्री तय नहीं करेंगे, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए एक वैचारिक 'ब्लूप्रिंट' भी तैयार करेंगे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का संघर्ष जहाँ क्षेत्रीय अस्मिता की रक्षा का प्रतीक है, वहीं भाजपा के लिए यह 'अजेय भारत' के स्वप्न की पूर्ति है। असम में हिमंत बिस्वा सरमा की रणनीतिक बिसात पूर्वोत्तर में भगवा ध्वज को स्थायी बनाने की चेष्टा है, तो गौरव गोगोई के लिए यह पिता की विरासत को बचाने का भगीरथ प्रयास है। तमिलनाडु और केरलम में द्रविड़ गौरव और वामपंथी सिद्धांतों की लड़ाई यह तय करेगी कि क्या दक्षिण भारत अभी भी दिल्ली के वैचारिक संवेगों से अछूता रह सकता है। 4 मई 2026 को जब इन चुनावों के परिणाम निकलेंगे, तो राख के नीचे से जो नई राजनैतिक व्यवस्था उभरेगी, वह भारत के संघीय ढांचे, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और लोक-कल्याणकारी नीतियों की नई परिभाषा होगी। यह युद्धों का अंत नहीं, बल्कि एक नए भारत की शुरुआत है, जहाँ जनता का निर्णय ही अंतिम महामंत्र है।