डिजिटल विद्रूपता का नया युग

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस युग में सत्य और मिथ्या की विभाजक रेखा लुप्त हो चुकी है। दुष्प्रचार के इस महाविस्फोट ने भारत को एक ऐसे डिजिटल रणक्षेत्र में धकेल दिया है, जहां हर ध्वनि और दृश्य अब संदेह के गहरे घेरे में है।

15 Apr 2026  |  22

जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) ने दुष्प्रचार की विभीषिका को पंख दे दिए हैं। वह समय अब इतिहास की धुंध में विलीन हो चुका है जब मिथ्या विमर्श गढ़ने के लिए अपार श्रम और पूंजी की आवश्यकता होती थी। आज एआई ने दुष्प्रचार की निर्माण लागत को न्यूनतम कर उसका 'लोकतांत्रिकरण' कर दिया है। यह आलेख उस अंधकारमय परिदृश्य की पड़ताल करता है जहां एआई-संचालित भ्रांतियां हमारे वर्तमान विधिक ढांचे को चुनौती दे रही हैं और एक ऐसे 'एआई शासन मॉडल' (एआई गवर्नेंस मॉडल) की मांग कर रही हैं जो सुरक्षा और अटूट विश्वास की नींव पर खड़ा हो।
'न्यूजगार्ड' की नवीनतम रिपोर्ट एक भयावह सत्य का उद्घाटन करती है। एआई द्वारा संचालित 'न्यूज साइट्स' की संख्या अब 16 भाषाओं में 2,089 को लांघ चुकी है। इन डिजिटल केंद्रों पर मानवीय विवेक की उपस्थिति शून्य है। अगस्त 2025 तक प्रमुख 'चैटबॉट्स' द्वारा मिथ्या सूचनाएं परोसने की दर 35 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पूर्व वर्ष की तुलना में लगभग दोगुनी है।
आंकड़ों का मायाजाल और संशय का वातावरण
परिवर्तन की यह गति अकल्पनीय है। वर्ष 2024 में डिजिटल पटल पर हर पांच मिनट में एक 'डीपफेक' प्रहार अंकित किया गया। जालसाजी की यह तीव्रता केवल आर्थिक क्षति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे 'प्रत्यक्ष प्रमाण' की अवधारणा पर ही प्रश्नचिन्ह लगाती है। वर्तमान विद्रूपता यह है कि किसी घोटाले में आकंठ डूबा राजनेता भी अब स्वयं को बेकसूर सिद्ध करने के लिए किसी भी वास्तविक वीडियो को 'डीपफेक' बताकर सत्य का गला घोंट सकता है।
सितंबर 2025 में बीजिंग स्थित 'गोलेक्सी' कंपनी के लीक हुए दस्तावेजों ने 'स्मार्ट प्रोपेगेंडा सिस्टम' के अस्तित्व को उजागर किया। यह कृत्रिम मानवों की एक ऐसी वाहिनी है जो वास्तविक मनुष्यों की भांति चिंतन करने और समाज को प्रभावित करने में सक्षम है। यह प्रणाली 'एलएलएम ग्रूमिंग' जैसी तकनीक के माध्यम से पक्षपातपूर्ण डेटा का जाल बिछाकर वैश्विक जनमत को दूषित कर रही है।
भारतीय संदर्भ: 47 प्रतिशत का अभिशप्त आंकड़ा
भारत आज एआई जनित दुष्प्रचार का सबसे उर्वर केंद्र बन चुका है। सांख्यिकी के अनुसार, 47 प्रतिशत भारतीय वयस्क एआई 'वॉयस-क्लोनिंग' या डीपफेक घोटालों के पाश में बंध चुके हैं, जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। यह संकट दो स्तरों पर राष्ट्र को पंगु बना रहा है। प्रथम, राष्ट्रीय सुरक्षा - जहां संकट काल में जमीनी यथार्थ को विद्रूप करने के लिए कृत्रिम सामग्री का उपयोग हो रहा है।
पहलगाम: सूचना युद्ध का रक्तरंजित अध्याय
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के उपरांत जो घटित हुआ, वह आधुनिक सूचना युद्ध का एक क्लासिक उदाहरण है। जब समूचा राष्ट्र 26 बलिदानियों के शोक में डूबा था, तब 'टेलीग्राम' और 'एक्स' जैसे प्लेटफॉर्म एआई-रचित भ्रामक बयानों के श्मशान में तब्दील हो गए। डीपफेक वीडियो के माध्यम से वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की छवि का दुरुपयोग किया गया ताकि सांप्रदायिक विद्वेष की अग्नि को प्रज्वलित किया जा सके। यद्यपि प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) ने सात प्रमुख भ्रांतियों की पहचान की, किंतु तब तक जन-विश्वास की अपूरणीय क्षति हो चुकी थी।
अश्लीलता का डिजिटल अस्त्र और विधिक संकट
जनवरी 2026 में 'ग्रोक एआई' के माध्यम से एक महिला की प्रोफाइल छवि को अश्लील डीपफेक में बदलने का प्रकरण सामने आया। 'एक्स' प्लेटफॉर्म की निष्क्रियता और अपराधी के निर्भीक दुस्साहस ने डिजिटल सुरक्षा के दावों की कलई खोल दी। इसके पश्चात, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कड़ा संज्ञान लेते हुए स्पष्ट किया कि यदि प्लेटफॉर्म 'उचित सावधानी' का पालन नहीं करते, तो उन्हें आईटी अधिनियम की धारा 79 के अंतर्गत प्राप्त 'सुरक्षित आश्रय' की विधिक छूट से वंचित कर दिया जाएगा।
समाधान की दिशा: विधिक और तकनीकी सुरक्षा कवच
एआई के इस भस्मासुर को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित रणनीतिक कदम अनिवार्य हैं:
1.        जोखिम वर्गीकरण का स्तरीय ढांचा: राष्ट्रीय सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित करने वाली एआई सामग्री को अनिवार्य अनुपालन  के दायरे में लाया जाना चाहिए।
2.        प्लेटफॉर्म की जवाबदेही: जब कोई प्लेटफॉर्म अपने इंटरफेस में एआई टूल्स (जैसे ग्रोक) को एकीकृत करता है, तो वह केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि निर्माता बन जाता है। ऐसी स्थिति में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के तहत उसकी जवाबदेही पूर्ण होनी चाहिए।
3.        अनिवार्य वॉटरमार्किंग और मेटाडाटा: फरवरी 2026 के संशोधनों के अनुसार, एआई सामग्री के लिए 'मेटाडाटा ट्रेसिंग' अनिवार्य है। वॉटरमार्किंग तकनीक इसे और अधिक प्रखर बनाएगी जिससे दुष्प्रचार के उद्गम तक पहुंचना सरल होगा।
4.        संकटकालीन प्रोटोकॉल: धारा 69-ए के तहत सामग्री को ब्लॉक करने की प्रक्रिया में गति लाना अनिवार्य है। भारत के एआई शासन दिशानिर्देशों द्वारा प्रस्तावित 'एआई सुरक्षा संस्थान' को एआई सामग्री की शिनाख्त के लिए सर्वोच्च प्राधिकारी बनाया जाना चाहिए।
भविष्य की चुनौती
एआई दुष्प्रचार केवल तकनीकी समस्या नहीं है, यह हमारे विवेक और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा है। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम तकनीक को कैसे रोकते हैं, बल्कि यह है कि हम सत्य की पहचान करने वाले संस्थानों को कैसे सुदृढ़ करते हैं। यदि हम आज सचेत नहीं हुए, तो डिजिटल संसार का यह कुहासा हमारे वास्तविक अस्तित्व को भी लील जाएगा। n