पटना/नई दिल्ली। देश की राजनीति में इस समय 'परिसीमन बिल' (Delimitation Bill) को लेकर सुगबुगाहट सबसे तेज है। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि यदि सरकार संसद में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटा लेती है, तो आगामी मानसून सत्र में ही इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने का प्रयास किया जा सकता है। यदि यह बिल कानून का रूप लेता है, तो साल 2029 का लोकसभा चुनाव नए परिसीमन के आधार पर कराया जाएगा।
इस बदलाव का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी असर बिहार पर पड़ेगा, जहां लोकसभा सीटों की संख्या में सीधे 50 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है। वर्तमान में बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं, जो बढ़कर 60 हो सकती हैं। सीटों की यह वृद्धि न सिर्फ बिहार का सियासी नक्शा बदल देगी, बल्कि भविष्य में विधानसभा सीटों के बढ़ने का रास्ता भी साफ करेगी।
क्या है परिसीमन और क्यों उठ रही मांग?
'परिसीमन' का सीधा अर्थ है— जनसंख्या के संतुलन के आधार पर लोकसभा या विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण करना।
1971 का आधार: देश में लोकसभा सीटों का मौजूदा ढांचा 1971 की जनगणना पर आधारित है। इसके बाद 84वें संविधान संशोधन के जरिए सीटों की संख्या को साल 2026 तक के लिए फ्रीज (स्थिर) कर दिया गया था।
दक्षिण बनाम उत्तर भारत का पेच: यदि पूरी तरह जनसंख्या को आधार बनाया जाता, तो आबादी नियंत्रित करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटें कम हो जातीं। इसलिए, नए फॉर्मूले के तहत 'यूनिफॉर्म 50% इंक्रीज' (सभी राज्यों में मौजूदा सीटों को 50 फीसदी बढ़ाना) का मॉडल चर्चा में है, जिससे किसी भी राज्य को नुकसान न हो और संतुलन बना रहे।
बिहार में कहां-कहां बढ़ेंगी सीटें? (संभावित क्षेत्रीय नक्शा)
60 सीटें होने की स्थिति में बिहार के अलग-अलग संभागों का भूगोल पूरी तरह बदल जाएगा:
कोसी-सीमांचल बेल्ट: पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज और सहरसा जैसे क्षेत्रों में सघन आबादी को देखते हुए 3 से 4 नई लोकसभा सीटें सृजित हो सकती हैं।
उत्तर बिहार: पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, दरभंगा, मधुबनी और मुजफ्फरपुर जैसे घनी आबादी वाले जिलों का विभाजन होगा। अकेले चंपारण क्षेत्र में अभी की 2 सीटों के बजाय 3 लोकसभा सीटें हो सकती हैं।
भोजपुर-मगध बेल्ट: पटना, गया, आरा और बक्सर बेल्ट में नए निर्वाचन क्षेत्र सामने आएंगे। राजधानी पटना में ही दो की जगह 3 लोकसभा सांसद चुने जा सकेंगे।
सियासी समीकरणों पर असर: जमीन से संसद तक का सफर
सीटों के इस महा-विस्तार से बिहार की पारंपरिक जातिगत और दलीय राजनीति में भारी उथल-पुथल होना तय है:
आरक्षण का नया गणित: नई सीटें बनने से कई पारंपरिक सुरक्षित (Reserved) सीटें सामान्य हो सकती हैं और कुछ सामान्य सीटें आरक्षित श्रेणी में जा सकती हैं। इससे राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवार चयन के पुराने समीकरण पूरी तरह बदलने होंगे।
कार्यकर्ताओं की चमकेगी किस्मत: दोनों प्रमुख गठबंधनों (NDA और महागठबंधन) को 20-20 अतिरिक्त प्रत्याशी उतारने होंगे। इससे पार्टी के भीतर टिकट की मारामारी कम होगी और जमीन पर काम करने वाले कद्दावर कार्यकर्ताओं के लिए संसद पहुंचने की राह आसान होगी।
छोटे दलों के लिए पेचीदा गणित: चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास), जीतन राम मांझी की हम (HAM), उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम और मुकेश सहनी की वीआईपी जैसे छोटे क्षेत्रीय दलों के लिए बड़े भाई की भूमिका वाले दलों से मोलतोल करना और बड़े फलक पर अपनी गोटियां सेट करना एक बड़ी चुनौती होगी।
देश का नया 'पावर सेंटर' बनेगा बिहार
वर्तमान में देश की राजनीति का सबसे बड़ा रास्ता उत्तर प्रदेश (80 सीटें) और महाराष्ट्र (48 सीटें) से होकर गुजरता है। लेकिन 20 नई सीटें प्लस होने के बाद बिहार 60 सांसदों के साथ देश के शीर्ष नीति-निर्धारक राज्यों की कतार में मजबूती से खड़ा हो जाएगा। दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए हर राष्ट्रीय दल के लिए बिहार की अहमियत पहले से कई गुना अधिक हो जाएगी।





