भिलाई/दुर्ग। प्रार्थना सभा की कतार में खड़े वो मासूम कदम, जिनके जूतों के अंगूठे फटे हुए थे या जिनकी चप्पलों की पट्टियाँ टूटी हुई थीं, आज उन पैरों को आगे बढ़ने का एक नया आत्मविश्वास मिल गया है। घर के अभाव और गरीबी ने भले ही इन बच्चों के पैरों से सहूलियतें छीन ली थीं, लेकिन स्कूल जाने की जिद और कुछ बनने का सपना कभी नहीं छीन पाई। दुर्ग जिले के ऐसे ही करीब 16 हजार बच्चों के लिए यह हफ्ता किसी बड़े उत्सव से कम नहीं रहा।

जिले के 72 सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे इन जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए नए जूते वितरित करने का एक अनूठा और संवेदनशील अभियान शुरू हुआ है। नए जूते मिलते ही बच्चों के चेहरों पर जो खिलखिलाहट दिखी, वह यह बयां करने के लिए काफी है कि यह महज किसी वस्तु का वितरण नहीं, बल्कि उनके प्रति सम्मान और अपनत्व का एक अनमोल एहसास है।

शिक्षा मंत्री की अनोखी पहल: वेतन और भत्तों से खर्च करेंगे ₹23 लाख

इस मानवीय पहल की शुरुआत प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने की है। राज्य में एक मंत्री को वेतन और भत्ते मिलाकर करीब ₹1.90 लाख प्रति माह मिलते हैं। इन बच्चों के पैरों में खुशियाँ सजाने के लिए शिक्षा मंत्री अपने वेतन और भत्तों से करीब 23 लाख रुपये खर्च कर रहे हैं।

मंत्री गजेंद्र यादव ने बताया:

"बच्चों के लिए ये जूते एक दुकानदार से उधार पर लिए गए हैं, जिसका भुगतान मैं हर महीने मिलने वाले अपने वेतन और भत्तों से धीरे-धीरे चुका रहा हूँ।"

अभावों के बीच पचपन: मजदूरी करने वाले परिवारों के हैं बच्चे

भिलाई और आस-पास के इन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे बेहद गरीब पृष्ठभूमि से आते हैं। इनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं, जो खेतों, ईंट भट्टों या निर्माण स्थलों पर कड़ा परिश्रम करके परिवार का पेट पालते हैं। ऐसे परिवारों के लिए बच्चों की कॉपियां, किताबें और यूनिफॉर्म जुटाना ही किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता। ऐसे में बच्चों के लिए नए जूते खरीदना अक्सर उनकी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे पीछे छूट जाता था।

जब एक दृश्य ने बदल दी मासूम कदमों की कहानी

इस मुहिम के पीछे एक बेहद संवेदनशील वाकया जुड़ा है। कुछ समय पहले एक रेलवे सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम के दौरान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे। वहाँ उनकी नजर कतार में खड़े बच्चों के पैरों पर पड़ी। कई बच्चे फटे हुए जूते पहने थे, तो कई टूटी चप्पलों में ही आ गए थे।

इस दृश्य ने मंत्री को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने महसूस किया कि शिक्षा केवल किताबों, कॉपियों और चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के आत्मसम्मान और उनके आत्मविश्वास से भी जुड़ी हुई है। इसी सोच ने इस मुहिम को जन्म दिया।

खुद स्कूल पहुंचकर बच्चों को पहना रहे हैं 'आत्मविश्वास'

इस अभियान की सबसे खूबसूरत तस्वीर तब देखने को मिल रही है जब शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव खुद जमीन पर बैठकर, आम नागरिकों की तरह सरकारी स्कूलों में जा रहे हैं और अपने हाथों से इन नन्हे बच्चों को जूते पहना रहे हैं।

शिक्षकों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन और नेतृत्व के इस संवेदनशील रूप ने न केवल बच्चों का हौसला बढ़ाया है, बल्कि समाज के सामने जिम्मेदारी की एक नई मिसाल भी पेश की है। अब ये कदम बिना किसी संकोच के, गर्व के साथ स्कूल के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।