भोपाल / ग्वालियर।

मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही कवायद अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। यूसीसी के लिए गठित विशेषज्ञ समिति का ड्राफ्ट अपने अंतिम चरण में है, जिसे आगामी 5 जुलाई तक सार्वजनिक किए जाने की प्रबल संभावना है। इस अंतिम मसौदे में सबसे बड़ा और संवेदनशील केंद्र बिंदु आदिवासी समुदाय और धर्म परिवर्तन कर चुके जनजातीय लोग बने हुए हैं।

धर्मांतरित आदिवासियों पर बड़ा फैसला संभव

समिति के सामने आए विभिन्न सुझावों में यह बात प्रमुखता से उठी है कि जिन आदिवासियों ने धर्म परिवर्तन कर ईसाई, मुस्लिम या अन्य धर्म अपना लिया है, वे अब अपनी पारंपरिक जनजातीय रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्था का पालन नहीं कर रहे हैं। ऐसे में सुझाव देने वाले विशेषज्ञों और नागरिकों का मानना है कि उन्हें यूसीसी से छूट देने के बजाय सामान्य नागरिकों की तरह ही इस संहिता के दायरे में लाया जाना चाहिए। हालांकि, समिति ने इस पर अभी कोई अंतिम मुहर नहीं लगाई है। इसके साथ ही इस बिंदु पर भी गंभीरता से विचार चल रहा है कि क्या मूल आदिवासी समुदाय को यूसीसी अपनाने के लिए स्वैच्छिक विकल्प (ऑप्शन) दिया जाना चाहिए या नहीं।

ग्वालियर बैठक के साथ जन परामर्श प्रक्रिया पूरी

यूसीसी कमेटी की अंतिम जन परामर्श बैठक गुरुवार को ग्वालियर में संपन्न हुई। इसके साथ ही पूरे प्रदेश से आम जनता, कानूनविदों और विभिन्न संगठनों से सुझाव लेने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अब समिति के सदस्य राजधानी भोपाल में बैठकर मिले हुए सभी सुझावों, उनके कानूनी पहलुओं और सामाजिक प्रभावों का विस्तृत अध्ययन (स्टडी) करेंगे। समिति का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा संतुलित ड्राफ्ट तैयार करना है जो भारतीय संविधान के दायरे में हो और समाज के सभी वर्गों के हितों का संरक्षण कर सके।

परंपरा बनाम समानता: विमर्श का दौर जारी

समान नागरिक संहिता को लेकर मध्य प्रदेश में इस वक्त विचारों का मंथन चरम पर है। जहां एक धड़ा इसे देश और राज्य के सभी नागरिकों के लिए समान कानून लागू करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष आदिवासी समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, अनूठी परंपराओं और सदियों पुराने रीति-रिवाजों के सम्मान की वकालत कर रहा है।

आगे क्या?

अब राज्य की जनता से लेकर राजनीतिक गलियारों तक, सभी की नजरें समिति की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं। 5 जुलाई को ड्राफ्ट सामने आने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि मध्य प्रदेश सरकार यूसीसी के तहत आदिवासी समुदाय और धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों के लिए क्या राह चुनती है।