उदयपुर। राजस्थान का खूबसूरत मेवाड़-वागड़ क्षेत्र इन दिनों अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराधियों के रडार पर है। उदयपुर रेंज में पिछले दो वर्षों के दौरान साइबर ठगों ने अपनी अदृश्य उंगलियों से ऐसी 'डिजिटल डकैती' डाली है कि पुलिस से लेकर आम जनता तक के होश उड़े हुए हैं। कंबोडिया में बैठे एक संगठित अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट ने महज दो साल में 232 वारदातों को अंजाम देकर लोगों की गाढ़ी कमाई के ₹36 करोड़ 58 लाख 7 हजार 501 पार कर दिए हैं।
पुलिस तफ्तीश में सामने आया है कि यह नेटवर्क फर्जी सिम कार्ड, किराये के बैंक खातों (म्यूल अकाउंट्स) और विदेशी सर्वरों के जरिए भारत में करोड़ों रुपए की साइबर लूट को अंजाम दे रहा है।
कंबोडिया कनेक्शन: कुछ ही मिनटों में विदेशों में गायब हो जाती है रकम
इस अंतरराष्ट्रीय ठगी के आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। ठगों के नेटवर्क की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करोड़ों की ठगी के सामने पुलिस अब तक केवल 10 फीसदी यानी करीब ₹3.60 करोड़ ही रिकवर कर सकी है।
2025 में: साइबर ठगी के 100 गंभीर मामले दर्ज हुए।
2026 में (अब तक): ग्राफ तेजी से बढ़ा और 132 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, ठगी की रकम चंद मिनटों के भीतर कई लेयर्स (खातों) और क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) के जरिए विदेशों में ट्रांसफर कर दी जाती है, जिससे इसकी ट्रैकिंग बेहद जटिल हो जाती है।
'डिजिटल अरेस्ट' का खौफ: बुजुर्ग बने आसान शिकार
इस साल जनवरी में सामने आए दो बड़े मामलों ने सुरक्षा एजेंसियों को हिलाकर रख दिया। ठगों ने खुद को जांच अधिकारी बताकर बुजुर्गों को स्क्रीन के पीछे 'कैद' किया और करोड़ों की चपत लगा दी:
मामला 1: सुखेर निवासी 68 वर्षीय भरत व्यास को 'डिजिटल अरेस्ट' का भय दिखाकर ₹67.90 लाख ठग लिए गए।
मामला 2: फतहपुरा निवासी 65 वर्षीय शशि जैन से इसी तरह डरा-धमकाकर ₹71 लाख की वसूली की गई।
जब तकनीकी जांच की गई, तो दोनों ही मामलों के आईपी एड्रेस (IP Address) कंबोडिया से जुड़े मिले, जिसने इस अंतरराष्ट्रीय रैकेट की पुष्टि की।
गरीबों के खाते और छात्रों की बेबसी बन रही 'हथियार'
जांच में एक और चौंकाने वाला ट्रेंड सामने आया है। कंबोडियाई गैंग सीधे तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों, मजदूरों और कॉलेज के छात्रों को निशाना बना रहा है। उन्हें चंद रुपयों के कमीशन का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए जाते हैं, जिन्हें तकनीकी भाषा में ‘म्यूल खाते’ (Mule Accounts) कहा जाता है।
ठगी की रकम सबसे पहले इन्हीं खातों में आती है और तुरंत क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स पर ट्रांसफर कर दी जाती है। नतीजा यह होता है कि पुलिस की रडार पर स्थानीय गरीब और छात्र आ जाते हैं, जबकि असली मास्टरमाइंड सात समंदर पार सुरक्षित बैठे रहते हैं।
आईजी की दो टूक: "कोई भी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तार नहीं करती"
उदयपुर रेंज के आईजी गौरव श्रीवास्तव ने आमजन से बेहद सतर्क रहने की अपील की है। उन्होंने सुरक्षा के लिए मुख्य बातें साझा की हैं:
डरे नहीं, फोन काटें: सीबीआई (CBI), ईडी (ED), पुलिस या कोई भी न्यायिक एजेंसी कभी भी वीडियो कॉल पर पूछताछ या 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती। ऐसा कॉल आते ही तुरंत डिस्कनेक्ट करें।
गोल्डन ऑवर में शिकायत: ठगी का शिकार होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करें या राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं। समय रहते सूचना देने पर रकम फ्रीज होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।





