शिमला: हिमाचल प्रदेश की डगमगाती वित्तीय स्थिति को पटरी पर लाने के लिए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अपने चौथे बजट में एक बेहद कड़ा और साहसिक कदम उठाया है। प्रदेश के खजाने पर बढ़ते भारी दबाव को कम करने के लिए सरकार ने मुख्यमंत्री से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को छोड़कर लगभग सभी अधिकारियों के वेतन में कटौती का ऐतिहासिक निर्णय लिया है।

वेतन कटौती का नया ढांचा: किसने कितना बलिदान दिया?

मुख्यमंत्री ने 'स्वयं से शुरुआत' करते हुए सबसे बड़ी कटौती की घोषणा की है। इस निर्णय के तहत राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में निम्नलिखित कटौती प्रभावी होगी:

मुख्यमंत्री: वेतन में 50% की भारी कटौती।

उपमुख्यमंत्री एवं मंत्री: वेतन में 30% की कटौती।

विधायक एवं बोर्ड/निगम प्रमुख: वेतन में 20% की कटौती।

वरिष्ठ अधिकारी (IAS, IPS, IFS): मुख्य सचिव, डीजीपी और प्रिंसिपल सेक्टरी स्तर के अधिकारियों के वेतन में 30% की कटौती (अगले 6 माह के लिए)।

ग्रुप A और B अधिकारी: वेतन में 3% की कटौती।

राहत की बात: सरकार ने ग्रुप सी (C) और डी (D) के कर्मचारियों को इस कटौती से पूरी तरह बाहर रखा है, ताकि मध्यम और निम्न आय वर्ग के कर्मचारियों पर आर्थिक बोझ न पड़े।

"यह त्याग अस्थायी है": मुख्यमंत्री का आश्वासन

बजट भाषण के दौरान भावुक अपील करते हुए मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि वर्तमान आर्थिक चुनौतियां अत्यंत गंभीर हैं और राज्य को दिवालिया होने से बचाने के लिए यह सामूहिक जिम्मेदारी उठाना आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि:

यह कटौती केवल अस्थायी है।

जैसे ही राज्य की वित्तीय स्थिति में सुधार होगा, इस निर्णय की समीक्षा की जाएगी।

काटा गया वेतन भविष्य में अधिकारियों और प्रतिनिधियों को वापस (Refund) कर दिया जाएगा।

न्यायपालिका से सहयोग की अपील

कार्यपालिका और विधायिका द्वारा उठाए गए इस कदम के बाद, मुख्यमंत्री ने न्यायपालिका से भी इस संकट की घड़ी में स्वेच्छा से सहयोग करने का आह्वान किया है। विधानसभा अध्यक्ष ने भी अपने वेतन में कटौती की सहमति दी, जिसके लिए मुख्यमंत्री ने उनका आभार व्यक्त किया।

एक नजर में कटौती का विवरण

पद/वर्गकटौती का प्रतिशतअवधि
मुख्यमंत्री50%अनिश्चित
मंत्री / उप-मुख्यमंत्री30%अनिश्चित
विधायक / चेयरमैन20%अनिश्चित
वरिष्ठ अफसर (IAS/IPS)30%06 माह
ग्रुप C एवं D कर्मचारी0% (कोई कटौती नहीं)-

निष्कर्ष: राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को एक "नैतिक और जिम्मेदार" मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। सरकार को उम्मीद है कि इस वित्तीय अनुशासन से प्रदेश के खाली होते खजाने को संजीवनी मिलेगी।