फतेहाबाद। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज विभाग द्वारा खेतों के रास्तों को पक्का करने का अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन यह 'विकास' किसानों के लिए जी का जंजाल बनता जा रहा है। ठेकेदारों की मनमानी और विभागीय अधिकारियों की अनदेखी के कारण करोड़ों की लागत से बन रही सड़कें तकनीकी खामियों की भेंट चढ़ रही हैं।
संकरे हुए रास्ते, बढ़ा दुर्घटनाओं का ग्राफ
नियमों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों के मार्ग सरकारी तौर पर 16 फीट चौड़े होते हैं। इसमें से 10 से 11 फीट चौड़ी सड़क सीसी (CC) या ईंटों से बनाई जाती है। मानक यह कहता है कि सड़क के दोनों ओर बची हुई 3-3 फीट जगह पर मिट्टी की भर्ती कर 'बर्म' (किनारे) बनाए जाएं।
समस्या की मुख्य बिंदु:
ऊंचाई का अंतर: नई सड़कें पुराने कच्चे रास्तों से करीब 1.5 से 2 फीट ऊंची हो गई हैं।
मिट्टी का अभाव: ठेकेदार सिर्फ बीच का रास्ता बनाकर काम समेट रहे हैं, जिससे सड़क के किनारे गहरे गड्ढे बन गए हैं।
क्रॉसिंग में दिक्कत: पहले कच्चे रास्तों पर दो वाहन आसानी से पास हो जाते थे, लेकिन अब बर्म न होने से भारी कृषि यंत्रों या ट्रैक्टर-ट्रॉली को नीचे उतारना नामुमकिन हो गया है।
अवैध कब्जों को मिल रहा बढ़ावा
सड़क के किनारों पर खाली छोड़ी गई जगह का फायदा उठाकर आसपास के खेत मालिकों ने पंचायती जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। इससे भविष्य में रास्तों के और अधिक संकरे होने का खतरा पैदा हो गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार बजट बचाने के चक्कर में मिट्टी की भर्ती नहीं कर रहे हैं और अधिकारी कार्यालयों में बैठकर ही फाइलों पर मुहर लगा रहे हैं।
"हमारे खेतों का मार्ग पक्का तो कर दिया गया, लेकिन बर्म न होने से ट्रैक्टर पलटने का डर बना रहता है। जब तक किनारों पर मिट्टी नहीं डाली जाएगी, इस पक्की सड़क का कोई लाभ नहीं है। विभाग को तुरंत मौके का मुआयना कर ठेकेदार पर कार्रवाई करनी चाहिए।" > — कृष्ण पूनिया, किसान (गांव बड़ोपल)
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें:
पक्की सड़क के दोनों ओर नियमानुसार मिट्टी की भर्ती कर मजबूत बर्म बनाए जाएं।
सड़क के लेवल और किनारों को बराबर किया जाए ताकि वाहन आसानी से पास हो सकें।
लापरवाह ठेकेदारों के भुगतान पर रोक लगाई जाए और गुणवत्ता की जांच हो।
किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो वे विभाग के विरुद्ध मोर्चा खोलने को मजबूर होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर समस्या पर कब संज्ञान लेता है।





