पटना। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव की सियासी तपिश दिन-ब-दिन अपने शबाब पर पहुंच रही है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से जीत का समीकरण साधने में जुटे हैं, लेकिन दशकों से इस सीट पर मजबूत पकड़ बनाए रखने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस बार एक बेहद अनूठी रणनीति तैयार की है।
उपचुनाव के इस रण में बीजेपी प्रदेश नेतृत्व और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (पीके) के बढ़ते सियासी कद को थामने के लिए राजनीतिक बिसात पर बड़ा दांव चला है। इस रणनीति का मूल सार है—'प्यादे से वजीर को मात देना'।
वाजपेयी की पंक्तियों से मिली प्रेरणा: साधारण कार्यकर्ता बनाम पीके
बीजेपी रणनीतिकार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रसिद्ध पंक्तियों “चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर!” को बांकीपुर की जमीन पर चरितार्थ करने में लगे हैं।
2025 के चुनावी मैदान में झटके झेलने के बाद प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर का यह उपचुनाव किसी 'संजीवनी' से कम नहीं है। खुद को मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे पीके के खिलाफ बीजेपी ने अपने एक समर्पित मंडल कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा है। पार्टी की सोच साफ है—एक बेहद साधारण कार्यकर्ता के हाथों प्रशांत किशोर को परास्त कर उनके राजनीतिक मनोबल और आखिरी उम्मीदों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाए।
सम्राट चौधरी का सियासी जवाब
चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर लगातार सम्राट चौधरी को केंद्र में रखकर बांकीपुर की जनता से अपील कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि सम्राट चौधरी को हटाने का संदेश देने के लिए बांकीपुर से उनके प्रत्याशी को हराना जरूरी है।
दूसरी ओर, सम्राट चौधरी और बीजेपी रणनीतिकारों की सोच यह है कि बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर को एक जमीनी कार्यकर्ता से हराकर संदेश दिया जाए कि जनता के बीच जमीनी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है।
'नए ट्रेंड' बनाम 'पारंपरिक गणित' का मुकाबला
प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में एक नया ट्रेंड लाने का प्रयास कर रहे हैं। वे चुनाव को जातीय ध्रुवीकरण से हटाकर व्यवस्थागत कमियों, भ्रष्टाचार, अपराध और विकास के मुद्दों पर लाना चाहते हैं। साथ ही, बांकीपुर के इतिहास को देखें तो यहाँ अमूमन 39 से 42 प्रतिशत ही मतदान होता रहा है। पीके की नजर उस 60 प्रतिशत गैर-मतदान करने वाले वर्ग पर है, जिसे वे बूथ तक खींचना चाहते हैं।
वहीं, बीजेपी अपने आजमाए हुए पारंपरिक और मजबूत फॉर्मूले पर टिकी है:
हिंदुत्व की धार: वैचारिक आधार पर मतदाताओं को एकजुट करना।
जातीय समीकरण: वोट बैंक के बिखराव को रोककर जीत का मार्ग प्रशस्त करना।
बीजेपी का 'विपरीत परिस्थितियों' का बैकअप प्लान
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस दांव में बीजेपी के लिए खोने को कुछ खास नहीं है। यदि नीरज कुमार सिन्हा चुनाव जीतते हैं, तो यह प्रशांत किशोर के राजनीतिक करियर के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा। और यदि नतीजा विपरीत भी रहता है, तो बीजेपी आसानी से तर्क दे सकती है कि पीके को एक साधारण मंडल कार्यकर्ता को हराने में ही पसीने छूट गए। वैसे भी, एक सीट के परिणाम से राज्य के सत्ता समीकरण पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
अब देखना दिलचस्प होगा कि बांकीपुर की जनता प्रशांत किशोर के 'मुद्दों के बदलाव' पर मुहर लगाती है या बीजेपी का यह 'प्यादे से वजीर मारने' का राजनीतिक दांव सफल होता है।





