कोलकाता | पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों की तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने राज्य के शीर्ष अधिकारियों को दो-टूक चेतावनी दी है। कोलकाता में पूर्ण पीठ की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया में राज्य प्रशासन का किसी भी तरह का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नबन्ना और चुनाव आयोग के बीच 'आमने-सामने'

सूत्रों के अनुसार, यह तल्खी मंगलवार को उस समय देखने को मिली जब मुख्य चुनाव आयुक्त ने राज्य की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और पुलिस महानिदेशक (DGP) पीयूष पांडेय के साथ बैठक की। CEC ने नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य सचिवालय (नबन्ना) के अधिकारी जिला चुनाव अधिकारियों (DEO) और पुलिस अधीक्षकों के काम में दखल दे रहे हैं।

बैठक में उपस्थित एक अधिकारी के अनुसार CEC ने कहा:

"चुनाव आयोग जानता है कि निष्पक्ष चुनाव कैसे कराए जाते हैं। हमें पता चला है कि आप बीच में हस्तक्षेप कर अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं। इसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कृपया हस्तक्षेप करना बंद करें।"

'नबन्ना' की मीटिंग पर आयोग की आपत्ति

आयोग ने इस बात पर विशेष आपत्ति जताई कि जब सोमवार को पूर्ण पीठ ने जिलाधिकारियों (DMs) के साथ बैठक की, तो उसके तुरंत बाद उन अधिकारियों को 'नबन्ना' तलब कर लिया गया।

देरी का कारण: आयोग ने DMs को जल्दी जाने की अनुमति दी थी ताकि वे अपने जिलों में पहुंचकर आराम कर सकें, लेकिन उन्हें सचिवालय बुलाकर आयोग के साथ हुई चर्चा का ब्यौरा देने को कहा गया।

आयोग का रुख: CEC ने स्पष्ट कहा कि यह दृष्टिकोण सही नहीं है और जिला अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से आयोग के निर्देशों का पालन करने दिया जाना चाहिए।

मतदाता सूची और 'SIR' प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप

चुनाव आयोग को शिकायतें मिली हैं कि 'सदन-सदन पुनरीक्षण' (SIR) अभ्यास के दौरान राज्य के अधिकारियों ने बाधाएं खड़ी कीं:

दस्तावेजों में देरी: करीब 1.5 लाख मतदाताओं के दस्तावेज समय पर अपलोड नहीं किए गए, जिससे उनके नाम 'एडजुडिकेशन' (निर्णय प्रक्रिया) की श्रेणी में फंस गए हैं।

फर्जी दस्तावेज: आरोप है कि कुछ शीर्ष नौकरशाहों के दबाव में अपात्रों के नाम न हटाने के लिए दस्तावेजों की जगह 'खाली पन्ने' और 'अखबार की कतरनें' तक अपलोड कर दी गईं।

क्या होगा मतदाताओं का भविष्य?

एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, यदि राज्य प्रशासन ने हस्तक्षेप न किया होता, तो जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, वे समय रहते अपील कर सकते थे। अब यह अनिश्चित है कि चुनावी रोल में इन लंबित मामलों का निपटारा कब तक होगा। आयोग ने संकेत दिया है कि यदि सुधार नहीं हुआ, तो वह और भी कड़े प्रशासनिक कदम उठा सकता है।