रायपुर:
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच पिछले चार दशकों से चले आ रहे बहुचर्चित महानदी जल विवाद के पटाक्षेप की दिशा में एक बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी हासिल हुई है। केंद्र सरकार की सक्रिय मध्यस्थता में इस जटिल अंतरराज्यीय मुद्दे का स्थायी समाधान ढूंढने पर दोनों राज्यों के बीच सहमति बन गई है।
भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश उपाध्यक्ष एवं सांसद रूपकुमारी चौधरी ने केंद्र की इस पहल का स्वागत करते हुए इसे दोनों राज्यों की जनता और किसानों के हित में एक दूरगामी कदम बताया है।
संवाद से समाधान की ओर कदम
सांसद रूपकुमारी चौधरी ने बताया कि न्यायमूर्ति बेला एस. त्रिवेदी की अध्यक्षता वाले महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के समक्ष दोनों राज्यों द्वारा केंद्र की मध्यस्थता स्वीकार करना संवाद के माध्यम से हल निकालने की दिशा में मील का पत्थर है।
उन्होंने इस संबंध में केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू के प्रयासों की सराहना की। तोखन साहू ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल से वार्ता कर केंद्रीय जल आयोग के माध्यम से एक संयुक्त समिति गठित करने का अनुरोध किया था, जिससे इस वार्ता का मार्ग प्रशस्त हुआ।
मुख्यमंत्रियों की उच्चस्तरीय बैठक से बनेगी बात
सांसद चौधरी ने विश्वास व्यक्त किया कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी के बीच होने वाली आगामी उच्चस्तरीय वार्ता से इस विवाद का सर्वमान्य और न्यायसंगत हल निकलेगा।
"केंद्र सरकार के मार्गदर्शन और दोनों राज्यों में 'डबल इंजन' की सरकार होने के कारण अब इस दशकों पुरानी समस्या का ऐसा हल निकलेगा, जिससे दोनों राज्यों के किसानों का हित पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।" — रूपकुमारी चौधरी, सांसद एवं प्रदेश उपाध्यक्ष, भाजपा
दोनों राज्यों के अपने-अपने दावे
| राज्य | मुख्य पक्ष और दावे |
|---|---|
| छत्तीसगढ़ | महानदी बेसिन के अपने भौगोलिक हिस्से के पानी का उपयोग उसका वैध अधिकार है। राज्य अपनी कृषि, सिंचाई और पेयजल आवश्यकताओं के लिए ही जल का उपयोग कर रहा है, जिससे निचले इलाकों पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। |
| ओडिशा | छत्तीसगढ़ द्वारा ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में अनियोजित बैराज और औद्योगिक परियोजनाएँ बनाने से हीराकुंड बांध में पानी की आवक घट गई है, जिससे राज्य में सिंचाई और पेयजल संकट पैदा हो रहा है। |
महानदी जल विवाद: 1983 से अब तक की टाइमलाइन
1983-1984: तत्कालीन मध्य प्रदेश (अब छत्तीसगढ़) द्वारा ऊपरी बेसिन में बैराज निर्माण शुरू करने पर ओडिशा ने सबसे पहले आपत्ति दर्ज कराई।
2016: ओडिशा सरकार ने आरोप लगाया कि गैर-मानसून सीजन में पानी रोके जाने से हीराकुंड बांध में जलस्तर खतरनाक स्तर तक कम हो रहा है।
2018: सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर केंद्र सरकार ने 'महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण' का गठन किया।
2019-2023: न्यायाधिकरण के समक्ष दोनों राज्यों ने अपने-अपने हाइड्रोलॉजिकल आंकड़े और दावे प्रस्तुत किए, लेकिन मामला कानूनी पेचीदगियों में उलझा रहा।
वर्ष 2026: केंद्र की सक्रिय भूमिका, संयुक्त समिति के गठन और दोनों मुख्यमंत्रियों के बीच सार्थक बातचीत की पहल से विवाद के स्थायी व सर्वमान्य हल की नई उम्मीद जगी है।





