विशेष संवाददाता
भोपाल: मध्य प्रदेश की सरकारी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की एक बेहद डरावनी और जर्जर तस्वीर सामने आई है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा ऑल इंडिया परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट ने राज्य के स्वास्थ्य ढांचे के दावों की पोल खोलकर रख दी है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में मानसिक रोग के मरीजों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में दवाओं की किल्लत, उपकरणों का अभाव और डॉक्टरों व पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी बनी हुई है।
राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बीमारियां, लेकिन सुविधाएं शून्य
कैग रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश की कुल आबादी का 13.9% हिस्सा किसी न किसी मानसिक विकार से जूझ रहा है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 10.7% है। यानी राज्य में हर 100 में से लगभग 14 लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
इस गंभीर स्थिति के बावजूद इलाज का ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है:
दवाओं की भारी किल्लत: मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 और राज्य की ड्रग पॉलिसी के तहत मुफ्त दवाओं का बफर स्टॉक रखना अनिवार्य है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में 1 से 36 महीने (3 साल) तक आवश्यक दवाएं उपलब्ध ही नहीं थीं।
स्टाफ का टोटा: राज्य के विभिन्न मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में 13% से 67% तक पद खाली पड़े हैं।
उपकरणों का अभाव: पांच प्रमुख सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 47% से 100% तक चिकित्सा उपकरणों की कमी पाई गई।
रेडियोलॉजिस्ट गायब: वर्ष 2021 से 2024 के दौरान राज्य के दोनों प्रमुख सरकारी मानसिक अस्पतालों में एक भी रेडियोलॉजिस्ट तैनात नहीं था, जिसके चलते मनोचिकित्सकों को स्वयं ही एक्स-रे व अन्य रेडियोलॉजी रिपोर्ट पढ़नी पड़ रही थीं।
कागजों में नियम, ज़मीन पर मानवाधिकारों का हनन
ऑडिट रिपोर्ट में अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की भारी लाचारी को रेखांकित किया गया है:
| मानक/सुविधा | धरातल की स्थिति |
|---|---|
| नाबालिग मरीजों की व्यवस्था | किसी भी निरीक्षण केंद्र में बच्चों/नाबालिगों के लिए अलग वार्ड नहीं। |
| मरीजों का भोजन बजट | इंदौर व ग्वालियर के अस्पतालों में मरीजों के खाने पर रोजाना मात्र ₹48 और ₹65 खर्च (मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों से बेहद कम)। |
| बुनियादी सुविधाएं | पीने का साफ पानी, स्वच्छ शौचालय और पर्याप्त बिस्तरों का भारी अभाव। |
स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी की विफलता: आधा तंत्र बिना रजिस्ट्रेशन के
कैग ने स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी (SMHA) के निराशाजनक कामकाज पर भी कड़े सवाल खड़े किए हैं। ढाई साल की देरी से गठित यह अथॉरिटी विशेषज्ञों की कमी के चलते जुलाई 2025 तक केवल आंशिक रूप से ही काम कर सकी।
चौंकाने वाला आंकड़ा:
राज्य में संचालित कुल 163 मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में से केवल 82 ही पंजीकृत हैं, जबकि 81 संस्थान बिना किसी वैध रजिस्ट्रेशन के धड़ल्ले से चलाए जा रहे हैं, जो मरीजों की सुरक्षा के साथ बड़ा खिलवाड़ है।





