भोपाल,
देश के सियासी और सामाजिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने समान नागरिक संहिता (MP Uniform Civil Code Bill 2026) के ड्राफ्ट को कैबिनेट में मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में इस पर मुहर लगाई गई। अब इस ऐतिहासिक विधेयक को आज से शुरू हो रहे राज्य विधानसभा के मानसून सत्र के पटल पर रखने की तैयारी है।
सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई की समिति की सिफारिशों पर तैयार इस ड्राफ्ट को आम जनता से मिले 9.58 लाख सुझावों के बाद अंतिम रूप दिया गया है। इस कानून के लागू होने के बाद मध्य प्रदेश में विवाह, तलाक, संपत्ति और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियमों में आमूलचूल बदलाव आएंगे।
लिव-इन रिलेशनशिप: 30 दिन में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य
प्रस्तावित बिल में सबसे ज्यादा चर्चा लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कड़े प्रावधानों की हो रही है:
अनिवार्य पंजीकरण: अब राज्य में लिव-इन में रहने वाले किसी भी बालिग जोड़े को 30 दिनों के भीतर सरकारी पोर्टल पर अपना रजिस्ट्रेशन कराना ही होगा। ऐसा न करने पर कानूनी कार्रवाई होगी।
माता-पिता को सूचना: यदि लिव-इन में रहने वाले पार्टनर की उम्र 21 साल से कम है, तो इसकी सूचना सीधे उनके अभिभावकों (माता-पिता) को दी जाएगी।
शादी छिपाने पर 5 साल की जेल: अगर कोई व्यक्ति अपनी पहली शादी की बात छिपाकर किसी अन्य पार्टनर के साथ लिव-इन में रहता है, तो उसे 5 साल तक की जेल की सजा भुगतनी होगी।
कुप्रथाओं पर चोट: 'निकाह हलाला' और बहुविवाह पर रोक
धार्मिक रीति-रिवाजों की आड़ में होने वाले शोषण को रोकने के लिए बिल में कड़े दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं। कानून बनते ही प्रदेश में बहुविवाह (एक से अधिक शादी) पर पूरी तरह प्रतिबंध लग जाएगा। इसके अलावा ‘निकाह हलाला’ और ‘इद्दत’ जैसी प्रथाओं को गैर-कानूनी घोषित करते हुए दंडनीय अपराध की श्रेणी में डाला गया है। तीन तलाक या किसी धार्मिक पंचायत के जरिए होने वाले मौखिक तलाक पूरी तरह अमान्य होंगे; अब केवल फैमिली कोर्ट के माध्यम से ही कानूनी तलाक मिल सकेगा।
बच्चों के हक में बड़ा बदलाव: हटेगा 'अवैध' शब्द
बाल अधिकारों के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम उठाते हुए कानून से हमेशा के लिए 'अवैध संतान' शब्द को विलोपित किया जा रहा है। अब लिव-इन रिलेशनशिप, सरोगेसी या एआरटी (ART) तकनीक से पैदा होने वाले सभी बच्चों को पूर्ण रूप से वैध माना जाएगा। उन्हें अपने माता-पिता की स्व-अर्जित और पैतृक, दोनों संपत्तियों में कानूनी रूप से विवाहित जोड़ों के बच्चों के बराबर ही पूरा हक मिलेगा।
बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार और वसीयत की आजादी
लैंगिक समानता (Gender Equality) को सुनिश्चित करने के लिए बेटियों और महिलाओं को पिता व पति की संपत्ति में बेटों के बराबर का अधिकार दिया गया है। तलाक की स्थिति में महिलाओं और बच्चों के गुजारा भत्ता (Alimony) के नियमों को बेहद सख्त बनाया गया है। इसके अलावा, सभी धर्मों के नागरिकों को बच्चा गोद लेने का एक समान अधिकार होगा। एक नया प्रावधान यह भी है कि कोई भी व्यक्ति अपनी कमाई की 100% संपत्ति अपनी मर्जी से किसी के भी नाम वसीयत कर सकेगा।
21% आदिवासी आबादी कानून के दायरे से बाहर
मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हुए मोहन यादव सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। राज्य की करीब 21 प्रतिशत आबादी वाले आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) समुदाय को इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है, ताकि उनकी पारंपरिक रूढ़ियों, धार्मिक मान्यताओं और अनूठे संवैधानिक अधिकारों पर आंच न आए।
इस प्रस्तावित कानून को लेकर जहां राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है, वहीं ड्राफ्ट समिति के अनुसार बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने भी खुलकर इस संहिता (UCC) के पक्ष में अपने सुझाव दिए थे। अब सबकी नजरें विधानसभा के मानसून सत्र पर टिकी हैं।





