कटक: ओड़िशा उच्च न्यायालय ने पुरी के विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा निर्देश जारी किया है। अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट आदेश दिया है कि आगामी तीन महीनों के भीतर मंदिर के स्वर्ण आभूषणों और बहुमूल्य रत्नों की सूची (इनवेंटरी) का मिलान कार्य पूर्ण किया जाए।

मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति मुराहरी श्री रमन की पीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा:

"इस मामले में कोई भी शिथिलता स्वीकार्य नहीं है। राज्य का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वह त्वरित कार्रवाई करे।"

न्यायालय के मुख्य निर्देश:

तीन महीने में ऑडिट: वर्तमान में निकाले गए रत्नों की सूची का मिलान 1978 के आधिकारिक रिकॉर्ड के साथ किया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हर एक वस्तु सुरक्षित है।

जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो: साल 2018 में रत्न भंडार की चाबियों के "रहस्यमयी ढंग से गायब" होने की जांच के लिए गठित रघुबीर दास आयोग की रिपोर्ट को आगामी बजट सत्र के दौरान विधानसभा के पटल पर रखा जाए।

समय सीमा विस्तार से इनकार: सरकार द्वारा अतिरिक्त समय की मांग को कोर्ट ने खारिज करते हुए कहा कि भारत के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक की संपदा के मामले में राज्य सरकार किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरत सकती।

रत्न भंडार: आस्था और अकूत संपदा का केंद्र

गर्भगृह के समीप स्थित रत्न भंडार मंदिर की सबसे मूल्यवान संपत्ति मानी जाती है। आखिरी बार साल 1978 (13 मई से 23 जुलाई) के बीच इसकी सूची बनाई गई थी। उस समय दोनों कक्षों में:

सोना: लगभग 128.380 किलोग्राम (454 वस्तुएं)

चांदी: लगभग 221.530 किलोग्राम (293 वस्तुएं) पाई गई थीं। जुलाई 2024 में मरम्मत और ऑडिट के उद्देश्य से इन गहनों को सुरक्षित रूप से बाहर निकाला गया था।

क्यों बढ़ा विवाद?

जून 2018 में रत्न भंडार की चाबियों के गायब होने की खबर ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया था। तत्कालीन नवीन पटनायक सरकार ने इसकी जांच के लिए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रघुबीर दास की नियुक्ति की थी। नवंबर 2018 में रिपोर्ट सौंपे जाने के बावजूद इसे सार्वजनिक नहीं किया गया, जिसे लेकर न्यायालय ने अब सख्त रुख अपनाया है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार से 'तत्परता' दिखाने की उम्मीद जताई है, ताकि सदियों से चली आ रही इस पवित्र विरासत की शुचिता और सुरक्षा पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे।