चंडीगढ़ | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने नागरिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर एक कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बिना किसी वैधानिक आदेश के किसी नागरिक का वाहन रोकना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि यह पद और शक्ति का सीधा दुरुपयोग है। इस मामले में कोर्ट ने मोहाली पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए पीड़ित को 10,000 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

क्या था मामला?

यह मामला 12 जून 2025 का है, जब याचिकाकर्ता विकास की मारुति डिजायर कार डेराबस्सी में एक सड़क दुर्घटना का शिकार हुई थी। पुलिस जांच में पाया गया कि दुर्घटना में किसी की गलती नहीं थी और न ही कोई घायल हुआ था। इसके बावजूद:

विभेदपूर्ण व्यवहार: दूसरे पक्ष को उनकी गाड़ी तुरंत ले जाने दी गई, लेकिन विकास की कार (HR-11-E-4111) को थाने के बाहर खड़ा रहने को मजबूर किया गया।

बिना आदेश जब्ती: रिकॉर्ड के अनुसार, पुलिस ने वाहन को रोकने के लिए कोई भी लिखित या मौखिक आदेश जारी नहीं किया था।

सरकारी दलील को कोर्ट ने बताया 'अविश्वसनीय'

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने अपनी मर्जी से वाहन थाने के बाहर छोड़ा था। जस्टिस जगमोहन बंसल की एकल पीठ ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने वाहन स्वेच्छा से छोड़ा होता, तो उसे हाई कोर्ट के चक्कर काटने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

"12 जून से 28 जुलाई तक बिना किसी वैध आदेश के वाहन को रोके रखना पुलिस की स्पष्ट गलती और शक्तियों का दुरुपयोग है। नागरिक को उसके संपत्ति के अधिकार से वंचित रखना गंभीर मामला है।" – उच्च न्यायालय

न्यायिक हस्तक्षेप के बाद मिली कार

विकास ने न्याय के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर की थी। जब मामला कोर्ट पहुँचा, तब जाकर पुलिस ने कहा कि उन्हें वाहन लौटाने में कोई आपत्ति नहीं है। अंततः 28 जुलाई 2025 को याचिकाकर्ता को अपनी कार वापस मिल सकी।

प्रशासनिक जवाबदेही तय करने का निर्देश

जस्टिस बंसल ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजा देना केवल पीड़ित की राहत नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्यक है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि:

मुआवजा: याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर 10,000 रुपये का भुगतान किया जाए।

जवाबदेही: पुलिस अपनी शक्तियों का उपयोग केवल कानून के दायरे में रहकर ही करे।

यह फैसला उन पुलिस अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो अक्सर कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना नागरिकों को परेशान करते हैं। अदालत के इस रुख से आम जनता में कानून के प्रति विश्वास और सुदृढ़ हुआ है।