चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने आरक्षण के नियमों और संवैधानिक सिद्धांतों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी महिला केवल विवाह के आधार पर दूसरे राज्य में अपने पति की पिछड़ा वर्ग (BC) श्रेणी के लाभ का दावा नहीं कर सकती। कोर्ट ने दोहराया कि आरक्षण जन्म से जुड़ी एक सामाजिक स्थिति है, जिसे विवाह के जरिए बदला या प्राप्त नहीं किया जा सकता।
संवैधानिक सिद्धांत: जन्म से तय होती है सामाजिक श्रेणी
जस्टिस जगमोहन बंसल की पीठ ने एकता यादव बनाम हरियाणा सरकार मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि:
जाति और आरक्षण से जुड़ी स्थिति व्यक्ति को जन्म से प्राप्त होती है।
केवल विवाह या एक राज्य से दूसरे राज्य में बस जाने मात्र से कोई व्यक्ति वहां की सामाजिक श्रेणी का कानूनी लाभ प्राप्त करने का हकदार नहीं हो जाता।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता एकता यादव, जो मूल रूप से राजस्थान की रहने वाली हैं और वहां ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत आती हैं, ने हरियाणा के रेवाड़ी में विवाह के बाद हरियाणा सरकार से अपने बीसी-बी (BC-B) प्रमाणपत्र को नवीनीकृत (Renew) करने की मांग की थी। जब सरकार ने उनके दावे को खारिज कर दिया, तो उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हरियाणा सरकार का पक्ष और अदालती तर्क
सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने 22 मार्च 2022 की अधिसूचना का हवाला देते हुए बताया कि कोई भी व्यक्ति केवल अपने मूल राज्य की मान्य जाति श्रेणी का लाभ ले सकता है। कोर्ट ने इस दलील को सही मानते हुए निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:
अधिसूचना का पैरा 3(4): किसी अन्य जाति या वर्ग के व्यक्ति से विवाह करने से महिला की अपनी जातीय श्रेणी नहीं बदलती।
पुराने फैसलों का हवाला: अदालत ने 'हरियाणा लोक सेवा आयोग बनाम श्वेता कश्यप' मामले का जिक्र करते हुए कहा कि यदि एक राज्य की महिला दूसरे राज्य के पुरुष से विवाह करती है, तो वह पति के राज्य की आरक्षण नीति का लाभ लेने की पात्र नहीं है।
याचिका खारिज: मूल राज्य ही रहेगा आधार
अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता जन्म से राजस्थान की ओबीसी श्रेणी से संबंधित हैं और उन्हें वहीं के लाभ मिलेंगे। हरियाणा में प्रवास के बाद वह वहां के पिछड़ा वर्ग कोटे का लाभ नहीं ले सकतीं। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने प्रमाणपत्र नवीनीकरण की मांग वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।
महत्वपूर्ण निष्कर्ष: यह फैसला उन हजारों मामलों के लिए एक नजीर साबित होगा जहाँ लोग अंतर्राज्यीय विवाह (Inter-state Marriage) के आधार पर आरक्षण के लाभ की मांग करते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि आरक्षण 'प्रवास' का विषय नहीं, बल्कि 'मूल पहचान' का विषय है।





