चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब पुलिस के एक एस पी (SP) रैंक के अधिकारी के विरुद्ध लगे यौन शोषण, मारपीट और जबरन गर्भपात जैसे संगीन आरोपों पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस मामले की जांच तीन सप्ताह के भीतर पूरी की जाए ताकि पीड़िता को समय पर न्याय मिल सके।

मंदिर में शादी का झांसा और 12 साल का उत्पीड़न

यह मामला जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की पीठ के समक्ष आया। याचिकाकर्ता महिला ने आरोप लगाया है कि एक केस के सिलसिले में उसकी मुलाकात उक्त अधिकारी से हुई थी। अधिकारी ने विश्वास में लेकर मंदिर में शादी करने का दावा किया और फिर लगातार उसका यौन शोषण किया।

गंभीर आरोप: महिला का दावा है कि उसे दो बार जबरन गर्भपात के लिए मजबूर किया गया और विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई।

भ्रष्टाचार का मुद्दा: याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग कर अवैध रूप से अकूत संपत्ति अर्जित की है।

देरी पर टिप्पणी: हालांकि शिकायत दर्ज कराने में 12 साल की देरी हुई है, लेकिन हाई कोर्ट ने साफ किया कि इस देरी को जांच में बाधा नहीं बनने दिया जा सकता।

जांच का जिम्मा 'ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' के पास

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि आरोपी अधिकारी के उच्च पद को देखते हुए मामले की गंभीरता को समझा गया है।

मामला अब ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन को सौंप दिया गया है।

वर्तमान में IGP फरीदकोट रेंज इस पूरे प्रकरण की सूक्ष्मता से जांच कर रहे हैं।

अदालत ने निर्देश दिया है कि जांच के बाद एक 'स्पीकिंग और रीजनड ऑर्डर' (तर्कसंगत आदेश) पारित किया जाए, ताकि निर्णय के आधार स्पष्ट हों।

न्याय की उम्मीद: "निष्पक्ष हो प्रक्रिया"

हाई कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषी अधिकारी के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। वहीं, यदि आरोप निराधार निकलते हैं, तो इसकी जानकारी भी नियमानुसार याचिकाकर्ता को दी जानी चाहिए।

"जांच पूरी तरह से पारदर्शी, निष्पक्ष और कानून सम्मत होनी चाहिए। पद का प्रभाव न्याय की प्रक्रिया को बाधित नहीं करना चाहिए।" — पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट