छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद): बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए और मनमाने ढंग से संपत्तियों को जमींदोज करने की प्रवृत्ति पर बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने बेहद तल्ख रुख अपनाया है। सोमवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सिद्धेश्वर थोंब्रे की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने छत्रपति संभाजीनगर नगर निगम (CSMC) की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। अदालत ने साफ शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि महाराष्ट्र में 'बुलडोजर संस्कृति' के लिए कोई जगह नहीं है।

"हर कोई घर बनाने का खर्च नहीं उठा सकता"

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के पार्षद मतीन पटेल और स्थानीय निवासी हनीफ खान द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट बेहद संवेदनशील नजर आया। नगर निगम की मनमानी पर नाराजगी जाहिर करते हुए पीठ ने कहा:

"एक अदद घर बनाना कोई आसान काम नहीं होता। हर कोई आपकी या हमारी तरह आसानी से घर बनाने का खर्च नहीं उठा सकता। महाराष्ट्र में इस 'बुलडोजर संस्कृति' को पैर मत पसारने दीजिए। यह उत्तर प्रदेश या बिहार नहीं है।"

नियमों की सरेआम धज्जियां, तोड़ने से पहले नोटिस तक नहीं

हाई कोर्ट ने जांच में पाया कि नगर निगम ने इस डिमोलिशन ड्राइव के दौरान सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा तय किए गए अनिवार्य सुरक्षा दिशानिर्देशों का खुलेआम उल्लंघन किया।

15 दिन के नोटिस का उल्लंघन: देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के नियमों के अनुसार किसी भी निर्माण को ढहाने से पहले 15 दिन की पूर्व नोटिस अवधि देना अनिवार्य है, जिसका इस मामले में पालन नहीं किया गया।

अवैध हिस्से की पहचान नहीं: कोर्ट ने सवाल उठाया कि पूरी इमारत को मलबे में तब्दील करने से पहले क्या निगम ने उसके केवल विशिष्ट 'अवैध' हिस्से की पहचान की थी? कोर्ट ने टिप्पणी की कि अधिकारियों को पहले बारीकी से यह देखना चाहिए था कि घर का कौन सा हिस्सा नियमों के खिलाफ बना है, न कि पूरे आशियाने को उजाड़ देना चाहिए था।

निगम की दलील पर बिफरी अदालत, 15 जून को अगली सुनवाई

सुनवाई के दौरान तब माहौल और गरमा गया जब छत्रपति संभाजीनगर नगर निगम (CSMC) की तरफ से पेश हुए सहायक सरकारी वकील संभाजी टोपे ने यह अजीबोगरीब तर्क दिया कि चूंकि इमारतें पहले ही गिराई जा चुकी हैं, इसलिए अब इन याचिकाओं का कोई औचित्य (बेमानी) नहीं रह गया है। उन्होंने याचिकाकर्ताओं को निचली दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) जाने की सलाह दी। इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 15 जून तय की है।

क्या था पूरा विवाद?

गौरतलब है कि नगर निकाय ने बीते 13 मई को एआईएमआईएम पार्षद मतीन पटेल के आवास और कार्यालय पर बुलडोजर चला दिया था। इसके साथ ही एक अन्य मकान को भी ध्वस्त कर दिया गया था, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) का एक कर्मचारी कर रहा था जो किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तारी से बच रहा था। बिना नोटिस के रातों-रात की गई इस बड़ी कार्रवाई के बाद से ही इलाके में भारी राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया था, जो अब हाई कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद और गहरा गया है।