मालदा/कूचबिहार: देश के चुनावी समर में जहाँ राजनीतिक दल अपनी जीत के समीकरण बिठाने में व्यस्त हैं, वहीं पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों—मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर—के लाखों प्रवासी श्रमिकों के लिए इस बार का मतदान महज एक अधिकार नहीं, बल्कि अपनी भारतीय नागरिकता की पहचान को पुख्ता करने की एक अनिवार्य कवायद बन गया है।

वोट न दिया तो 'विदेशी' न करार दिए जाएँ: गहराता डर

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि जारी मतदाता सूची संशोधन (SIR) प्रक्रिया और नाम कटने की आशंका ने प्रवासी श्रमिकों के बीच एक मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा कर दिया है। हैदराबाद में निर्माण कार्य करने वाले मालदा के कादिर शेख कहते हैं, "वोट देने से मुझे कोई आर्थिक लाभ नहीं होगा, लेकिन डर है कि अगर इस बार वोट नहीं दिया, तो भविष्य में मुझे गैर-भारतीय न करार दे दिया जाए।" यह डर इतना गहरा है कि कई श्रमिकों ने ईद पर घर लौटने के बजाय चुनाव के समय लौटने का फैसला किया है ताकि आर्थिक बोझ कम हो।

चार वर्गों में बँटी श्रमिकों की दुविधा

इस चुनावी मौसम में प्रवासी श्रमिकों की स्थिति को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में देखा जा सकता है:

प्रतीक्षारत समूह: वे श्रमिक जो घर आए हुए हैं और मतदान संपन्न होने तक काम पर वापस नहीं जाने का मन बना चुके हैं।

कानूनी उलझन में फंसे: वे श्रमिक जिनका नाम मतदाता सूची में 'अंडर एडजुडिकेशन' (विचाराधीन) श्रेणी में है। मुर्शिदाबाद के सइदुल और मोबीदुल जैसे श्रमिक सप्लीमेंट्री लिस्ट का इंतज़ार कर रहे हैं। यदि नाम नहीं आया, तो उन्हें ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाना पड़ सकता है।

आर्थिक तंगी और प्राथमिकता: वे श्रमिक जो आर्थिक तंगी के कारण ईद पर घर नहीं आ सके, वे अब अपनी पूरी बचत चुनाव के समय घर आने के लिए बचा रहे हैं।

दोहरी छुट्टी की चुनौती: राजस्थान में काम करने वाले नूर इस्लाम जैसे श्रमिक, जिन्हें निजी फर्मों में महीने में दो बार छुट्टी मिलना मुश्किल है। वे वापस काम पर जाकर मतदान के लिए फिर लौटने की योजना बना रहे हैं।

पूर्व एनक्लेव (Enclaves) में सन्नाटा, पर संकल्प मजबूत

कूचबिहार के मशालडांगा जैसे पूर्व बांग्लादेशी एंक्लेव, जो अब भारतीय गाँव हैं, वहाँ इस साल ईद की वह पारंपरिक रौनक नहीं दिखी। दिल्ली में काम करने वाले 26 वर्षीय अब्दुल्ला शेख ने बताया कि उनके गाँव के लगभग 40 युवा इस बार ईद पर घर नहीं आए। उन्होंने तय किया है कि वे सब एक साथ केवल मतदान के समय ही घर लौटेंगे ताकि अपनी नागरिकता के साक्ष्य के रूप में मतदान की प्रक्रिया को सुनिश्चित कर सकें।

एक नजर में मुख्य चुनौतियाँ

चुनौतीप्रभाव
SIR प्रक्रियामतदाता सूची से नाम कटने का व्यापक डर।
यात्रा व्ययमहीने भर में दो बार घर आना आर्थिक रूप से असंभव।
कानूनी स्थिति'विचाराधीन' (Under Adjudication) सूची के कारण काम पर लौटने में हिचकिचाहट।

"हमारे लिए चुनाव अब केवल प्रतिनिधि चुनना नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी पर अपने हक को दर्ज कराना है।" — एक प्रवासी श्रमिक